मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से एक बार फिर मानव और वन्यजीव संघर्ष की बेहद दुखद और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। चौरई क्षेत्र के किशनपुर गांव में एक किसान की उस समय दर्दनाक मौत हो गई, जब वह रोजमर्रा के काम के लिए अपने खेत में पंप चालू करने पहुंचा था। यह घटना न केवल एक परिवार के लिए अपूरणीय क्षति बन गई, बल्कि पूरे इलाके में डर और असुरक्षा का माहौल भी छोड़ गई है।

ग्रामीण जीवन में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि जीवन की दिनचर्या का अहम हिस्सा होती है। किसान सुबह-सुबह खेतों की ओर निकलते हैं, सिंचाई की व्यवस्था देखते हैं और अपनी फसल की देखभाल करते हैं। लेकिन किशनपुर गांव में बुधवार की सुबह यही सामान्य दिनचर्या एक भयानक हादसे में बदल गई।
सुबह की शांति को चीरता भयावह हमला
किशनपुर गांव में बुधवार की सुबह सामान्य थी। खेतों के आसपास हल्की हलचल थी और किसान अपने-अपने काम में लगे हुए थे। इसी दौरान बलराम डेहरिया, जो अपने परिवार की आजीविका के लिए खेती पर निर्भर थे, खेत में लगे पंप को चालू करने के लिए घर से निकले। यह काम वह रोज करते थे और कभी किसी खतरे की आशंका नहीं थी।
लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग थीं। खेत के पास झाड़ियों और जंगल की ओर से अचानक एक बाघ निकल आया। किसी को संभलने या प्रतिक्रिया देने का मौका तक नहीं मिला। बाघ ने सीधे बलराम डेहरिया पर हमला कर दिया। हमले की तीव्रता इतनी भयावह थी कि किसान मौके पर ही गंभीर रूप से घायल हो गए।
कुछ ही पलों में बुझ गया जीवन का दीप
बाघ के हमले में बलराम डेहरिया को गंभीर चोटें आईं। आसपास मौजूद लोगों को जब तक घटना की जानकारी मिली और वे मदद के लिए दौड़े, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। किसान की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। खेत में फैली खून से सनी मिट्टी और टूटे हुए सामान इस दर्दनाक घटना की गवाही दे रहे थे।
मृतक की पहचान बलराम डेहरिया, पिता फकीरा डेहरिया के रूप में हुई है। वह अपने परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य थे। उनकी असमय मौत से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। घर में कोहराम मच गया और गांव में शोक की लहर दौड़ गई।
शव के पास बैठा टूटा हुआ परिवार
घटना के बाद जब ग्रामीण मौके पर पहुंचे, तो खेत में किसान का शव पड़ा था और उसके पास शोक में डूबा परिवार बैठा था। परिजनों की आंखों में आंसू थे और चेहरों पर विश्वास करना मुश्किल सा सन्नाटा। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि रोजमर्रा का साधारण काम इतनी बड़ी त्रासदी में कैसे बदल गया।
ग्रामीणों ने बताया कि बलराम मेहनती और शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। गांव में उनकी पहचान एक सीधे-सादे किसान के रूप में थी, जो अपने परिवार और खेती में ही जीवन बिताते थे। उनकी मौत से गांव ने अपना एक जिम्मेदार सदस्य खो दिया है।
सूचना मिलते ही प्रशासन और वन विभाग हरकत में
घटना की जानकारी मिलते ही स्थानीय प्रशासन और वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची। पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और आवश्यक कार्रवाई शुरू की। वन विभाग ने क्षेत्र की घेराबंदी कर दी, ताकि बाघ की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके और किसी अन्य ग्रामीण को नुकसान न पहुंचे।
वन अधिकारियों ने ग्रामीणों से अपील की कि वे फिलहाल अकेले खेतों या जंगल की ओर न जाएं। खासतौर पर सुबह और शाम के समय अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है।
इलाके में फैली दहशत, ग्रामीणों में डर
इस घटना के बाद किशनपुर और आसपास के गांवों में भय का माहौल है। लोग अपने घरों से बाहर निकलने में डर महसूस कर रहे हैं। खेतों में काम करने वाले किसान असमंजस में हैं कि अपनी फसल की देखभाल कैसे करें।
ग्रामीणों का कहना है कि हाल के वर्षों में क्षेत्र में बाघों की आवाजाही बढ़ी है। पहले जंगल तक सीमित रहने वाले वन्यजीव अब खेतों और रिहायशी इलाकों के करीब नजर आने लगे हैं। इससे मानव और वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
बफर जोन में बढ़ता संघर्ष
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार किशनपुर क्षेत्र वन क्षेत्र के बफर जोन में आता है। यह वह इलाका होता है, जहां जंगल और मानव बस्तियों की सीमा आपस में मिलती है। ऐसे क्षेत्रों में मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव की आशंका अधिक रहती है।
हाल के दिनों में इस इलाके में बाघ की गतिविधियां लगातार देखी जा रही थीं। इसके बावजूद, किसान अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए खेतों में जाने को मजबूर हैं। यही मजबूरी कई बार जानलेवा साबित हो जाती है।
बाघ की निगरानी तेज, अलर्ट जारी
घटना के बाद वन विभाग ने पूरे क्षेत्र में अलर्ट जारी कर दिया है। बाघ की निगरानी के लिए विशेष टीमें तैनात की गई हैं। उसके मूवमेंट पर नजर रखने के लिए कैमरा ट्रैप और गश्त बढ़ाई गई है।
वन अधिकारियों का कहना है कि प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान न पहुंचे। साथ ही, बाघ को जंगल की सीमा के भीतर सुरक्षित तरीके से वापस लाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
परिवार के लिए अपूरणीय क्षति
बलराम डेहरिया की मौत उनके परिवार के लिए सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि पूरे जीवन की दिशा बदल देने वाली घटना है। वह परिवार के मुख्य सहारा थे। खेती से होने वाली आय पर ही घर चलता था।
परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। पत्नी, बच्चे और बुजुर्ग माता-पिता के सामने अब भविष्य की चिंता खड़ी हो गई है। गांव के लोग परिवार को सांत्वना देने पहुंच रहे हैं, लेकिन यह दर्द किसी के शब्दों से कम होने वाला नहीं है।
शासन की ओर से सहायता की प्रक्रिया शुरू
वन विभाग और प्रशासन ने बताया कि मृतक किसान के परिजनों को शासन की ओर से नियमानुसार आर्थिक सहायता दिलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। मानव–वन्यजीव संघर्ष में जान गंवाने वाले परिवारों के लिए निर्धारित मुआवजा राशि प्रदान की जाती है।
हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि आर्थिक सहायता दुख की भरपाई नहीं कर सकती। उनका मानना है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए स्थायी और प्रभावी समाधान की जरूरत है।
मानव और वन्यजीव संघर्ष: एक गंभीर चुनौती
छिंदवाड़ा सहित मध्य प्रदेश के कई जिलों में मानव और वन्यजीव संघर्ष एक गंभीर समस्या बन चुका है। जंगलों के आसपास रहने वाले ग्रामीण अक्सर इस खतरे के साये में जीते हैं। खेती, लकड़ी इकट्ठा करना या मवेशियों को चराने जैसे काम उन्हें जंगल के करीब ले जाते हैं, जहां खतरा हर समय मौजूद रहता है।
वन्यजीव संरक्षण जरूरी है, लेकिन साथ ही मानव जीवन की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
ग्रामीणों की मांग, सुरक्षा के ठोस इंतजाम
घटना के बाद ग्रामीणों ने प्रशासन और वन विभाग से मांग की है कि क्षेत्र में सुरक्षा के ठोस इंतजाम किए जाएं। उनका कहना है कि सिर्फ अलर्ट जारी करना या गश्त बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। खेतों और गांवों के आसपास बाड़बंदी, रोशनी की व्यवस्था और समय पर चेतावनी प्रणाली जैसे उपाय किए जाने चाहिए।
ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि बाघ की मौजूदगी पहले से पता थी, तो उन्हें पहले ही सतर्क किया जाना चाहिए था।
निष्कर्ष: एक जान, कई सवाल
किशनपुर में किसान की मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि मानव और वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए अब तक किए गए प्रयास कितने पर्याप्त हैं। एक मेहनतकश किसान की जान चली गई, एक परिवार उजड़ गया और एक गांव डर के साये में जीने को मजबूर हो गया।
यह घटना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी त्रासदियां दोहराती रहेंगी। जरूरत है ऐसे समाधान की, जो जंगल और इंसान दोनों को सुरक्षित रख सके।
