मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा शहर में परासिया रोड पर गुरुवार की दोपहर जो दृश्य सामने आया, उसने आम लोगों को ही नहीं बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा कर दिया। जिस इलाके को शहर का संवेदनशील और सुरक्षित क्षेत्र माना जाता है, वहीं सरेआम युवकों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया। यह घटना सांसद निवास और कार्यालय से कुछ ही दूरी पर घटी, जिसने सुरक्षा इंतजामों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

बीच सड़क पर हुई इस हिंसक झड़प का वीडियो जैसे ही सामने आया, सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया। वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह युवकों के दो गुट एक-दूसरे पर बेल्ट और बल्लों से हमला कर रहे हैं। सिर, हाथ और पैरों पर किए गए वार इतने बेरहम थे कि देखने वालों की रूह कांप उठी।
ट्रैफिक के बीच खुलेआम मारपीट
घटना के समय सड़क पर सामान्य ट्रैफिक चल रहा था। दोपहिया वाहन, कारें और राहगीर सब कुछ अचानक थम सा गया। लोग डर और हैरानी के बीच यह सब देख रहे थे, लेकिन किसी में आगे बढ़कर रोकने की हिम्मत नहीं हुई। हमलावरों को न पुलिस का डर था और न ही किसी बड़े परिणाम का।
करीब दस मिनट तक यह हिंसा चलती रही। युवक एक-दूसरे को सड़क के एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ाते रहे। कई बार ऐसा लगा मानो कोई गंभीर हादसा हो जाएगा, लेकिन हमलावरों की आक्रामकता कम नहीं हुई।
पुरानी रंजिश से भड़की आग
प्राथमिक जांच में सामने आया कि यह झगड़ा अचानक नहीं हुआ था। इसके पीछे पुरानी रंजिश और क्षेत्र में वर्चस्व की लड़ाई बताई जा रही है। बताया गया कि शराब दुकान के पास स्थित एक मैदान से शराब पीकर निकले कुछ युवकों की दूसरे गुट से कहासुनी हो गई। पहले यह बहस तक सीमित थी, लेकिन जल्द ही मामला हिंसक टकराव में बदल गया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दोनों गुट पहले से एक-दूसरे से नाराज थे। जैसे ही मौका मिला, गुस्सा खुलकर सामने आ गया। कुछ लोग बीच-बचाव करने की कोशिश करते दिखे, लेकिन हमलावर इतने उग्र थे कि किसी की एक नहीं सुनी।
वीडियो ने खोली पोल
घटना के समय पुलिस को इसकी कोई जानकारी नहीं थी। इलाके में कोई गश्ती दल मौजूद नहीं था। अगर वीडियो सामने नहीं आता, तो शायद यह मामला भी कई अन्य घटनाओं की तरह दब जाता। लेकिन वीडियो के वायरल होते ही प्रशासन की नींद टूटी।
सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाए कि सांसद निवास के इतने पास ऐसी गुंडागर्दी कैसे हो सकती है। कई लोगों ने इसे कानून व्यवस्था की खुली नाकामी बताया। वीडियो ने यह भी दिखा दिया कि अपराधियों में पुलिस का डर किस हद तक खत्म हो चुका है।
पुलिस की कार्रवाई और हिरासत
वीडियो फुटेज के आधार पर पुलिस ने पहचान की प्रक्रिया शुरू की। शुरुआती जांच में दो आरोपियों को हिरासत में लिया गया है। पुलिस का कहना है कि अन्य लोगों की पहचान भी की जा रही है और जल्द ही सभी दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह की घटनाओं को किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किया गया है और गश्त बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।
आम लोगों में डर और नाराजगी
इस घटना के बाद स्थानीय लोगों में भय का माहौल है। दुकानदारों का कहना है कि दिनदहाड़े इस तरह की हिंसा ने व्यापार और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित किया है। कई लोगों ने कहा कि अगर सांसद निवास के पास यह हाल है, तो बाकी शहर का क्या होगा।
स्थानीय निवासियों का मानना है कि शराब, बेरोजगारी और आपसी रंजिशें इस तरह की घटनाओं को जन्म दे रही हैं। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, बल्कि जड़ से समस्या को खत्म करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
कानून व्यवस्था पर उठते सवाल
यह घटना सिर्फ एक सड़क झगड़े तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक समस्या की ओर इशारा करती है, जहां अपराधियों को कानून का भय नहीं रह गया है। जब सार्वजनिक स्थानों पर खुलेआम हिंसा होने लगे और लोग तमाशबीन बनकर खड़े रहें, तो यह समाज और प्रशासन दोनों के लिए चेतावनी होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी घटनाओं पर सख्त और त्वरित कार्रवाई जरूरी है, ताकि भविष्य में कोई भी कानून हाथ में लेने की हिम्मत न कर सके।
प्रशासन के लिए चेतावनी
छिंदवाड़ा की यह घटना प्रशासन के लिए एक बड़ा इम्तिहान है। सिर्फ दो आरोपियों को हिरासत में लेना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरी है कि पूरे नेटवर्क की पहचान हो और यह संदेश जाए कि कानून से ऊपर कोई नहीं है।
अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसी घटनाएं दोहराई जा सकती हैं और आम जनता का भरोसा व्यवस्था से उठ सकता है।
निष्कर्ष: सरेआम हिंसा, चुप्पी नहीं चाहिए
परासिया रोड पर हुई यह वारदात यह दिखाती है कि समाज में बढ़ती असहिष्णुता और कानून के प्रति लापरवाही कितनी खतरनाक हो सकती है। यह सिर्फ कुछ युवकों की लड़ाई नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए एक चेतावनी है।
अब जरूरत है कि दोषियों को सख्त सजा मिले और ऐसे माहौल को पनपने से रोका जाए, ताकि सड़कें फिर से सुरक्षित महसूस हो सकें।
