मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में स्थित जुन्नारदेव क्षेत्र का एक सरकारी स्कूल अचानक सुर्खियों में आ गया है। यहां के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के कुछ विद्यार्थियों ने अपने ही स्कूल की एक शिक्षिका तथा छात्रावास अधीक्षक पर गंभीर आरोप लगाए हैं। विद्यार्थियों के अनुसार, उन पर ईसाई धर्म स्वीकार करने का दबाव बनाया जा रहा था। यह आरोप जैसे ही सामने आया, पुलिस प्रशासन, शिक्षा विभाग और सामाजिक संगठनों में हलचल मच गई है।

छात्रों ने न केवल आरोप लगाए, बल्कि सीधे थाने पहुँचकर अपनी शिकायत भी दर्ज कराई। परामर्श और बयान लेने के बाद पुलिस ने इस पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है। छात्रों द्वारा किए गए आरोपों में धार्मिक भावनाओं से छेड़छाड़, दबाव, धमकी और सांस्कृतिक प्रतीकों पर रोक जैसे तत्व शामिल हैं, जो पूरे घटनाक्रम को और भी गंभीर बना देते हैं।
शिकायत की शुरुआत: छात्र पहुंचे थाने, लिखाई रिपोर्ट
मंगलवार को ग्राम पंचायत बिलावर कला के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के कक्षा 10वीं और 12वीं के कई छात्र जुन्नारदेव थाने पहुंचे। उनके चेहरों पर झिझक, असमंजस और तनाव साफ दिख रहा था। छात्रों ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि उनकी शिक्षिका सीमा मैथ्यूज और उनके सहयोगी, छात्रावास अधीक्षक नरेंद्र उईके, उन पर लगातार दबाव डालते हैं कि वे ईसाई धर्म अपनाएँ।
छात्रों ने कहा कि यह दबाव सिर्फ मौखिक नहीं होता, बल्कि कई बार व्यवहारिक रूप से भी महसूस कराया जाता है। शिक्षिका सीमा मैथ्यूज, छात्रों के अनुसार, स्कूल समय के दौरान धार्मिक कथाएं और विचार प्रस्तुत करती थीं और यह बताने की कोशिश करती थीं कि ईसाई धर्म श्रेष्ठ है। छात्रों ने आरोप लगाया कि उन्हें कहा जाता था कि अगर वे इस विचारधारा को नहीं अपनाते, तो उन्हें कक्षा में अपमानित किया जाएगा, तथा टीसी देने जैसी कड़ी कार्रवाई की भी धमकी दी जाती है।
टीका और कलावा को लेकर विवाद—छात्रों का गंभीर दावा
शिकायत में सबसे संवेदनशील मुद्दा छात्रों की धार्मिक पहचान से जुड़े प्रतीकों का था। कई छात्रों ने बताया कि वे हिंदू परंपरा के अनुसार माथे पर टीका लगाते हैं और हाथ में कलावा पहनते हैं। उनका आरोप है कि स्कूल में इन्हीं प्रतीकों को हटाने का दबाव डाला जाता था।
छात्रों ने बताया कि:
- जब वे टीका लगाकर आते, तो टीका मिटाने के लिए बाध्य किया जाता।
- अगर कलावा पहना होता, तो शिक्षिका उसे हटाने को कहतीं, कभी-कभी स्वयं ही जबरन उतार देतीं।
ऐसे व्यवहार ने छात्रों को मानसिक रूप से परेशान कर दिया। वे कहने लगे कि उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे अपनी पहचान छिपाने को मजबूर किए जा रहे हों।
धमकाने का आरोप—टीसी देने की चेतावनी
छात्रों ने पुलिस को बताया कि जब वे विभिन्न धार्मिक गतिविधियों में शामिल होने या किसी भी तरह के दबाव को मानने से मना करते, तो उन्हें स्कूल छोड़ने की धमकी मिलती। कथित तौर पर कहा जाता था कि “अगर आदेश नहीं मानोगे, तो टीसी दे दी जाएगी।”
यह बात छात्रों के लिए बेहद डरावनी थी। कक्षा 10वीं और 12वीं जैसे महत्वपूर्ण वर्षों में किसी भी छात्र के लिए टीसी महत्वपूर्ण परीक्षा की दिशा को प्रभावित कर सकती है। छात्रों के अनुसार, टीसी की धमकी एक बड़ा दबाव बन जाती थी।
शिकायत के बाद विश्व हिंदू परिषद और कन्हान बचाओ मंच की एंट्री
जैसे ही बच्चों ने हिम्मत कर शिकायत दर्ज कराई, मामला तेजी से सामाजिक संगठनों तक पहुँचा। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और कन्हान बचाओ मंच ने विद्यार्थियों की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए जनजातीय कार्य विभाग और कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा।
विहिप के जिला मंत्री नितेश गोलू सूर्यवंशी ने कहा कि यह मामला बेहद संवेदनशील है। यदि स्कूल जैसे पवित्र स्थान में बच्चों पर किसी भी प्रकार के मतांतरण का दबाव बनाया जा रहा है, तो यह न केवल बच्चों के अधिकारों का हनन है, बल्कि शिक्षा प्रणाली के मूल उद्देश्यों के भी विपरीत है।
उन्होंने प्रशासन से मांग की कि शिक्षिका सीमा मैथ्यूज और छात्रावास अधीक्षक नरेंद्र उईके के खिलाफ तुरंत जांच की जाए और यदि आरोप सही पाए जाएँ तो कठोर कार्रवाई हो।
पुलिस की प्रारंभिक प्रतिक्रिया और जांच की शुरुआत
नगर निरीक्षक राकेश सिंह बघेल ने बताया कि पुलिस को शिकायत प्राप्त हो गई है और छात्रों के बयान भी दर्ज कर लिए गए हैं। उन्होंने कहा कि मामला गंभीर है और इसे लेकर पुलिस किसी भी तरह की ढिलाई नहीं बरतेगी।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि:
- छात्रों के बयान
- स्कूल प्रशासन के बयान
- शिक्षिका और अधीक्षक का पक्ष
- स्थानीय समुदाय की प्रतिक्रियाएँ
सभी के आधार पर जांच आगे बढ़ेगी।
पुलिस यह भी पता लगाएगी कि क्या वास्तव में स्कूल परिसर में कोई धार्मिक गतिविधि हो रही थी, या यह किसी तरह के तनाव, गलतफहमी या व्यक्तिगत विवाद का परिणाम है। शिक्षकों और छात्रों के बीच व्यवहारिक संबंध भी इस जांच का एक हिस्सा होंगे।
स्कूल प्रशासन की स्थिति और संभावित चुनौतियाँ
मामले के सामने आते ही स्कूल प्रशासन पर भी कई सवाल उठने लगे हैं। अभी तक स्कूल की ओर से कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों ने गैर-औपचारिक बातचीत में कहा कि पूरे मामले की रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी से मांगी गई है।
स्कूल के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है। अगर आरोप सच हैं, तो यह विद्यालय की साख को गहरा नुकसान पहुँचा सकते हैं। वहीं यदि आरोप गलत पाए जाते हैं, तो छात्रों और शिक्षकों के बीच विश्वास टूटने का खतरा है।
सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलू—छात्र क्यों पहुंचे पुलिस?
किसी भी स्कूल का बच्चा पुलिस थाने जाना पसंद नहीं करता। जब छात्र शिकायत लेकर वहाँ पहुँचते हैं, तो यह स्थिति की गंभीरता दर्शाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि:
- बच्चों ने लंबे समय तक दबाव महसूस किया होगा
- या उन्हें शिक्षा के अधिकार के विपरीत कुछ चलता हुआ प्रतीत हो रहा होगा
- या यह भी संभव है कि कई घटनाएँ एक साथ इकट्ठी होकर एक बड़ा तनाव बन गई हों
धर्म, पहचान, सांस्कृतिक प्रतीक—इन सबका बच्चों की मानसिकता पर गहरा प्रभाव पड़ता है, इसलिए ऐसे आरोपों की जांच बेहद संवेदनशीलता से की जानी चाहिए।
जनजातीय क्षेत्र में शिक्षा और मतांतरण के आरोप—एक पुराना संघर्ष
छिंदवाड़ा और आसपास के जनजातीय इलाकों में कई वर्षों से शिक्षा और धर्म परिवर्तन से जुड़े मुद्दे समय-समय पर सामने आते रहे हैं। ऐसे क्षेत्रों में सामाजिक, धार्मिक और शैक्षणिक हित अक्सर एक-दूसरे से टकराते पाए जाते हैं।
इस तरह की घटनाएँ यह भी बताती हैं कि जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, मजबूत और संवेदनशील बनाने की जरूरत है।
अब आगे क्या?—प्रशासन के सामने बड़ी जिम्मेदारी
यह मामला सिर्फ एक स्कूल का नहीं है। यह बच्चों के अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता, शिक्षा की निष्पक्षता और समाज की संवेदनशीलता से जुड़ा हुआ विषय है। प्रशासन को—
- निष्पक्ष जांच
- स्कूल की आंतरिक प्रक्रियाओं की समीक्षा
- छात्रों की सुरक्षा
- संवेदनशीलता प्रशिक्षण
- साफ-सुथरे वातावरण की गारंटी
जैसे कदम उठाने होंगे।
