मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से सामने आया एक चौंकाने वाला मामला प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है। चांदामेटा के सिविल अस्पताल में हुए प्रसव के दौरान एक महिला के पेट में कपड़ा भूल जाने का खुलासा तब हुआ, जब प्रसव के कई दिन बाद भी महिला के पेट में असहनीय दर्द बढ़ता गया। शुरुआत में यह दर्द सामान्य माना गया, लेकिन धीरे-धीरे स्थिति बिगड़ने लगी और परिवार ने मजबूर होकर महिला को निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया। वहां की जांच में सच्चाई सामने आई कि प्रसव प्रक्रिया के दौरान महिला के पेट में चिकित्सकीय कपड़ा छूट गया था, जिससे संक्रमण बढ़ता गया और उसकी हालत गंभीर होती चली गई।

यह घटना न केवल चिकित्सा नियमों की घोर अवहेलना है, बल्कि प्रसूताओं की सुरक्षा से छेड़छाड़ जैसा है। स्वास्थ्य सेवाओं में विश्वास रखने वाले लोगों के लिए यह मामला स्तब्ध कर देने वाला है।
प्रसव के 10 दिन बाद खुला मामला
मोरडोगरी क्षेत्र की रहने वाली महिला देविका साहू ने 18 नवंबर को चांदामेटा सिविल अस्पताल में एक बेटी को जन्म दिया था। सामान्य प्रसव के बाद महिला को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। सामान्यतः प्रसव के कुछ दिन बाद तक दर्द रहना आम बात है, लेकिन देविका के दर्द में लगातार बढ़ोतरी होती गई। वह पेट में चुभन जैसा महसूस कर रही थी और संक्रमण के लक्षण भी दिखने लगे थे।
परिवार को जब लगा कि स्थिति सामान्य से अधिक बिगड़ रही है, तब वे देविका को छिंदवाड़ा के एक निजी अस्पताल ले गए। वहां चिकित्सकों ने अल्ट्रासाउंड और अन्य परीक्षण किए, जिनमें अंदरूनी जगह पर एक असामान्य वस्तु दिखी। डॉक्टरों को संदेह हुआ और जब उन्होंने सर्जरी कर जांच की, तो पेट में कपड़ा निकला। इस लापरवाही ने महिला को संक्रमण के खतरे के करीब ला दिया था और समय रहते ऑपरेशन न होता तो स्थिति और भी खतरनाक हो सकती थी।
परिजनों के आरोप और अस्पताल प्रबंधन की भूमिका
महिला के पति कैलाश साहू का कहना है कि उन्होंने प्रसव के समय अस्पताल के कर्मचारियों को चार हजार रुपये दिए थे, जिनमें से तीन हजार रुपये डॉक्टर के लिए मांगे गए थे। परिवार का आरोप है कि आर्थिक लेन-देन के बावजूद महिला को सामान्य और सुरक्षित उपचार नहीं मिला, बल्कि लापरवाही का ऐसा खतरनाक परिणाम भुगतना पड़ा जिसने पूरी परिवार को भयभीत कर दिया।
उधर, अस्पताल के खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. अंकित सहलाम ने इस घटना की जानकारी मिलते ही तत्काल जांच के लिए चार सदस्यीय समिति गठित की। समिति में दो वरिष्ठ महिला चिकित्सकों के साथ बीपीएम और बीसीएम को शामिल किया गया है। समिति को पूरे मामले की जांच कर विस्तृत रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
लेकिन सवाल यहां उठता है कि क्या केवल जांच टीम बनाना ही पर्याप्त है या इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए अस्पताल स्टाफ की जवाबदेही सुनिश्चित करने, चिकित्सा मानकों की निगरानी बढ़ाने और नियमित ऑडिट कराने की जरूरत है।
अस्पतालों में लापरवाही का बढ़ता खतरा
प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए दिन सरकारी अस्पतालों में लापरवाही के मामले सामने आते रहते हैं। कभी नवजातों को गलत तरीके से संभाला जाता है, कभी ऑपरेशन थिएटर में स्वच्छता के मानकों की अनदेखी होती है, और कभी ऐसे उदाहरण सामने आते हैं जो यह बताने के लिए काफी हैं कि आमजन की जिंदगी किस हद तक जोखिम में है।
चांदामेटा अस्पताल की यह घटना भी एक ऐसी ही कड़ी है, जिसने सरकारी अस्पतालों पर भरोसा करने वाले गरीब और साधारण परिवारों को गहरा सदमा दिया है। कई बार इन अस्पतालों में स्टाफ की कमी और उपकरणों की खराबी को वजह बताया जाता है, लेकिन यहां मामला सीधे-सीधे पेशेवर लापरवाही का है, जहां मानव जीवन के साथ खिलवाड़ हुआ।
देविका साहू के पेट में छूटा कपड़ा किसी भी ऑपरेशन या प्रसव प्रक्रिया की बुनियादी सावधानी का उल्लंघन है। चिकित्सा जगत में यह बात स्पष्ट होती है कि ऑपरेशन थेयटर या प्रसव कक्ष में उपयोग होने वाले प्रत्येक सामान की गिनती दो बार की जाती है, एक बार प्रक्रिया से पहले और एक बार बाद में, ताकि कोई भी वस्तु अंदर न छूटे। सवाल है कि इस प्रक्रिया को नजरअंदाज कैसे किया गया।
समुदाय और स्थानीय स्तर पर प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश है। ग्रामीणों का कहना है कि गरीब परिवार अपनी मजबूरी और उम्मीद के कारण सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहते हैं, लेकिन यदि ऐसी घटनाएं बार-बार होती रहीं तो लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं से भरोसा खो देंगे।
कई लोगों ने यह भी कहा कि यह घटना एक चूक नहीं बल्कि एक गंभीर लापरवाही है, जिसके जिम्मेदार व्यक्तियों पर कड़ी कार्रवाई होना आवश्यक है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।
महिला की वर्तमान स्थिति और आगे का उपचार
सर्जरी के बाद महिला की स्थिति में सुधार है, लेकिन संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए उसे लगातार निगरानी में रखा गया है। चिकित्सकों ने बताया कि कपड़ा शरीर में कई दिनों तक रहने से बैक्टीरिया तेज़ी से बढ़ गए थे, जिससे सेप्सिस का खतरा भी था। यदि मामले का समय पर पता नहीं चलता, तो यह महिला की जान भी ले सकता था।
देविका का परिवार अभी भी सदमे में है और मानसिक रूप से बेहद तनावग्रस्त है। परिजन चाहते हैं कि दोषियों पर कार्रवाई हो और उन्हें न्याय मिले।
जांच समिति की जवाबदेही और आगे की कार्यवाही
बीएमओ द्वारा गठित जांच समिति को विस्तृत रिपोर्ट आगामी दिनों में सौंपनी है। रिपोर्ट के आधार पर यह तय होगा कि किस कर्मचारी या डॉक्टर की गलती के कारण यह घटना हुई। हालांकि स्वास्थ्य विभाग की प्रक्रियाओं के अनुसार दोष सिद्ध होने पर संबंधित के खिलाफ निलंबन, पदस्थापना बदलना या सेवा समाप्ति जैसी कठोर कार्रवाई भी की जा सकती है।
लेकिन यह तभी संभव है जब जांच निष्पक्ष और पारदर्शी हो। कई बार जांच समितियां केवल औपचारिकता बनकर रह जाती हैं और कार्रवाई कागज़ों में सीमित रहती है। लोगों की उम्मीद है कि इस बार ऐसा न हो और न्याय सुनिश्चित किया जाए।
यह घटना क्यों महत्वपूर्ण है
प्रसव एक महिला के जीवन का सबसे संवेदनशील चरण होता है। इस दौरान डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे समय में यदि चिकित्सकीय लापरवाही होती है, तो यह केवल महिला के शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित नहीं करती, बल्कि उसकी मानसिक स्थिति, परिवार की आर्थिक स्थिति और उसकी सुरक्षित मातृत्व की पूरी यात्रा को चुनौती देती है।
छिंदवाड़ा के इस मामले ने चिकित्सा संस्थानों की तैयारियों, स्टाफ के प्रशिक्षण और उत्तरदायित्व के गंभीर मुद्दों को उजागर किया है। यह घटना सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं बल्कि एक ऐसी चेतावनी है जो बताती है कि स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने की तत्काल जरूरत है।
