चीन और पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अक्सर “ऑल वेदर फ्रेंड” कहा जाता रहा है। दशकों से दोनों देश रणनीतिक, सैन्य और आर्थिक साझेदारी की मिसाल पेश करते आए हैं। लेकिन बीते कुछ समय से इस रिश्ते में ऐसी दरारें उभर रही हैं, जिन्हें अब सार्वजनिक रूप से नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है। बीजिंग में पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार की हालिया यात्रा इसी बदलते समीकरण का स्पष्ट संकेत बनकर सामने आई है।

पाकिस्तान की ओर से यह यात्रा चीन के साथ रिश्तों को मजबूत करने और आपसी मतभेदों को सुलझाने के उद्देश्य से की गई थी। इशाक डार ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी समेत कई शीर्ष नेताओं से मुलाकातें कीं। इन बैठकों से इस्लामाबाद को उम्मीद थी कि बीजिंग का भरोसा दोबारा मजबूत होगा और अटके हुए मुद्दों पर सहमति बनेगी। लेकिन बातचीत का लहजा पाकिस्तान की उम्मीदों से अलग और कहीं अधिक सख्त नजर आया।
चीन ने स्पष्ट शब्दों में पाकिस्तान को याद दिलाया कि दोस्ती सिर्फ बयानबाजी से नहीं चलती, बल्कि वादों को जमीन पर उतारने से ही मजबूत होती है। बीजिंग ने इशाक डार के सामने उन सभी मुद्दों को एक बार फिर रखा, जिन पर लंबे समय से असंतोष बना हुआ है। इनमें चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की धीमी प्रगति, चीनी निवेश और नागरिकों की सुरक्षा, पाकिस्तान में अमेरिका की बढ़ती दखल और क्षेत्रीय अस्थिरता जैसे गंभीर विषय शामिल रहे।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा, जिसे सीपीईसी के नाम से जाना जाता है, दोनों देशों के रिश्तों की रीढ़ माना जाता है। इसे चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का सबसे अहम और फ्लैगशिप प्रोजेक्ट कहा गया था। करीब ग्यारह साल पहले शुरू हुए इस प्रोजेक्ट से न केवल पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिलने की उम्मीद थी, बल्कि चीन को भी अरब सागर तक सीधी पहुंच मिलनी थी। लेकिन एक दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद सीपीईसी से जुड़े कई अहम प्रोजेक्ट आज भी अधूरे हैं।
बीजिंग में हुई बातचीत के दौरान चीनी अधिकारियों ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि सीपीईसी की मुख्य संपत्तियां अब तक पूरी तरह ऑपरेशनल नहीं हो सकी हैं। ग्वादर पोर्ट, जिसे इस पूरे कॉरिडोर की नींव माना जाता है, अभी भी अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहा है। ग्वादर को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाली सड़क और मोटरवे परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं, जिससे लॉजिस्टिक्स और व्यापारिक गतिविधियों पर सीधा असर पड़ रहा है।
ग्वादर इंटरनेशनल एयरपोर्ट को भी बड़े सपनों के साथ विकसित किया गया था, लेकिन यात्रियों और कार्गो ट्रैफिक के मामले में यह उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया है। सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण न तो अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस खुलकर आगे आ रही हैं और न ही व्यापारिक गतिविधियों में तेजी आ पा रही है। चीन का मानना है कि इन सब वजहों से सीपीईसी का आर्थिक मॉडल कमजोर पड़ रहा है।
सुरक्षा का मुद्दा इस पूरी बातचीत का सबसे संवेदनशील पहलू रहा। पाकिस्तान में बीते कुछ वर्षों में चीनी नागरिकों, इंजीनियरों और परियोजनाओं पर हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं। खासतौर पर बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे क्षेत्रों में चीनी कर्मियों को निशाना बनाया गया है। इन हमलों ने बीजिंग की चिंता को कई गुना बढ़ा दिया है।
बलूचिस्तान में सक्रिय अलगाववादी और उग्रवादी समूह लंबे समय से सीपीईसी का विरोध करते रहे हैं। उनका आरोप है कि इन परियोजनाओं से स्थानीय आबादी को लाभ नहीं मिल रहा और संसाधनों का दोहन किया जा रहा है। इस असंतोष ने हिंसक रूप ले लिया है, जिसका सीधा असर चीनी निवेश और नागरिकों की सुरक्षा पर पड़ा है।
बीजिंग ने इशाक डार को यह साफ संदेश दिया कि अगर पाकिस्तान अपने क्षेत्र में काम कर रहे चीनी नागरिकों और परियोजनाओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता, तो निवेशकों का भरोसा डगमगाना तय है। चीन ने दो-टूक कहा कि पाकिस्तान को अपने किए गए वादों से पीछे हटने की कोई गुंजाइश नहीं है।
इसके अलावा अमेरिका की पाकिस्तान में बढ़ती भूमिका भी चीन के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। बीजिंग को आशंका है कि इस्लामाबाद का वाशिंगटन के करीब जाना क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है। चीन-पाकिस्तान संबंधों की पारंपरिक गहराई के बीच अमेरिका की सक्रियता ने बीजिंग को सतर्क कर दिया है।
इशाक डार के लिए यह बातचीत आसान नहीं रही। जहां एक ओर उन्हें चीन को भरोसा दिलाने की कोशिश करनी पड़ी, वहीं दूसरी ओर उन्हें यह भी समझना पड़ा कि बीजिंग अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट होने वाला नहीं है। चीन की यह सख्ती इस बात का संकेत है कि वह अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों के मामले में कोई समझौता नहीं करना चाहता।
इस पूरे घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक अहम संदेश दिया है। दोस्ती चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो, अगर वादे पूरे नहीं होते और जमीन पर हालात बिगड़ते हैं, तो तनाव पैदा होना तय है। चीन और पाकिस्तान के रिश्तों में आई यह तल्खी आने वाले समय में क्षेत्रीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
