वेनेजुएला पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई ने एक बार फिर दुनिया को यह याद दिला दिया है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रही। इस घटनाक्रम ने न केवल लैटिन अमेरिका को हिलाकर रख दिया, बल्कि एशिया से लेकर यूरोप तक इसकी गूंज सुनाई दी। खास तौर पर चीन की प्रतिक्रिया पर वैश्विक नजरें टिकी रहीं। चीन ने इस हमले को वेनेजुएला की संप्रभुता पर सीधा आघात बताया, अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन का आरोप लगाया और अमेरिका से अपदस्थ राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को रिहा करने की मांग भी की। इसके बावजूद बीजिंग ने अमेरिका से सीधे टकराव का रास्ता नहीं चुना। यही बात आज अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों और रणनीतिक विशेषज्ञों के बीच सबसे बड़ी चर्चा का विषय बनी हुई है।

यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि चीन और अमेरिका पहले से ही व्यापार, तकनीक, ताइवान और दक्षिण चीन सागर जैसे मुद्दों पर आमने-सामने हैं। ऐसे में वेनेजुएला जैसे संवेदनशील मसले पर चीन का संयमित रवैया उसकी दीर्घकालिक रणनीति की ओर इशारा करता है।
अमेरिकी कार्रवाई से चीन को क्यों हुआ सबसे अधिक नुकसान
वेनेजुएला पिछले कई वर्षों से चीन के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण देश रहा है। चीन ने वहां भारी निवेश किया है, खासकर ऊर्जा क्षेत्र में। तेल, खनिज और बुनियादी ढांचे से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स में चीनी कंपनियां सक्रिय हैं। अमेरिकी हमले से न केवल वेनेजुएला की राजनीतिक स्थिरता प्रभावित हुई, बल्कि उन सभी परियोजनाओं पर भी अनिश्चितता का साया मंडराने लगा जिनमें चीन की बड़ी आर्थिक हिस्सेदारी है।
इसी कारण चीन ने तीखे शब्दों में अमेरिका की आलोचना की। बीजिंग की ओर से यह साफ कहा गया कि किसी भी देश की संप्रभुता का इस तरह उल्लंघन करना अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के खिलाफ है। हालांकि, यह नाराजगी केवल बयानों और कूटनीतिक मंचों तक ही सीमित रही।
केवल राजनयिक मोर्चे पर क्यों सक्रिय है चीन
चीन की प्रतिक्रिया को समझने के लिए उसकी विदेश नीति की बुनियादी सोच को समझना जरूरी है। बीजिंग अक्सर यह संदेश देता आया है कि वह किसी भी देश के आंतरिक मामलों में दखल के खिलाफ है। इसी सिद्धांत के तहत उसने वेनेजुएला के मामले में भी अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता की बात को प्रमुखता से उठाया।
चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने नियमित प्रेस ब्रीफिंग में स्पष्ट किया कि बीजिंग वेनेजुएला और क्यूबा जैसे देशों के साथ सहयोग को और मजबूत करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि लैटिन अमेरिकी और कैरेबियाई देश एक-दूसरे का समर्थन करते रहेंगे। इस बयान से साफ था कि चीन इस मुद्दे को सैन्य टकराव के बजाय कूटनीतिक और राजनीतिक समर्थन के जरिए आगे बढ़ाना चाहता है।
संयुक्त राष्ट्र में चीन की भूमिका
वेनेजुएला संकट को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाई गई, जिसने इस मुद्दे को वैश्विक मंच पर ला खड़ा किया। इस बैठक में चीन ने अमेरिका से अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने और निकोलस मादुरो तथा उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस को तुरंत रिहा करने की मांग की। इस आपात सत्र का अनुरोध कोलंबिया की ओर से किया गया था, जिसे चीन और रूस का समर्थन मिला।
यह घटनाक्रम दिखाता है कि चीन वैश्विक संस्थानों के जरिए अपनी बात रखने में विश्वास करता है। वह चाहता है कि अमेरिका की कार्रवाई को एकतरफा आक्रामकता के रूप में दुनिया के सामने लाया जाए, ताकि वैश्विक जनमत उसके पक्ष में बन सके।
लैटिन अमेरिका में चीन की बढ़ती पकड़
पिछले एक दशक में चीन ने लैटिन अमेरिकी देशों के साथ अपने संबंधों को लगातार मजबूत किया है। व्यापार, निवेश और बुनियादी ढांचे के विकास के जरिए उसने इस क्षेत्र में गहरी पैठ बनाई है। वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले के बाद इस क्षेत्र में अमेरिका के प्रति नाराजगी बढ़ी है, जिसे चीन एक अवसर के रूप में देख रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि चीन इस बेचैनी का फायदा उठाकर खुद को एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में पेश कर सकता है। वह यह संदेश देना चाहता है कि जहां अमेरिका सैन्य दबाव और हस्तक्षेप की नीति अपनाता है, वहीं चीन सहयोग, निवेश और सम्मान की बात करता है।
एक्सपर्ट की नजर में चीन की रणनीति
सिंगापुर के नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर डायलन लोह का मानना है कि चीन के पास कई विकल्प हैं, लेकिन वह जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहता। उनके अनुसार, बीजिंग फिलहाल हालात के व्यापक प्रभावों का आकलन कर रहा है और उसके बाद अपनी रणनीति में आवश्यक बदलाव करेगा।
लोह के मुताबिक चीन जानता है कि अमेरिका से सीधा टकराव न केवल आर्थिक रूप से महंगा पड़ सकता है, बल्कि वैश्विक अस्थिरता को भी बढ़ा सकता है। इसलिए वह निंदा और कूटनीतिक दबाव के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है।
ग्लोबल साउथ के नेता के रूप में खुद को स्थापित करने की कोशिश
वेनेजुएला संकट को चीन एक बड़े अवसर के रूप में देख रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, बीजिंग इसे इस बात के सबूत के तौर पर पेश करेगा कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से दूर जा रहा है और अपने हितों के लिए नियमों की अनदेखी कर रहा है। इसके उलट चीन खुद को ग्लोबल साउथ के देशों के हितों की आवाज के रूप में स्थापित करना चाहता है।
विकासशील देशों में पहले से ही यह भावना मौजूद है कि वैश्विक व्यवस्था पश्चिमी देशों के पक्ष में झुकी हुई है। चीन इस असंतोष को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रहा है, ताकि वह खुद को एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत कर सके।
ब्रिक्स और बहुपक्षीय मंचों की अहमियत
चीन की रणनीति में ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंचों की भूमिका भी अहम होती जा रही है। बीजिंग ब्रिक्स को एक ऐसे प्लेटफॉर्म के रूप में देखता है, जहां अमेरिका के प्रभाव को चुनौती दी जा सकती है। वेनेजुएला संकट के बाद चीन की कोशिश होगी कि वह ब्रिक्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाकर विकासशील देशों का समर्थन हासिल करे।
इससे न केवल चीन की राजनीतिक पकड़ मजबूत होगी, बल्कि उसकी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति भी बेहतर होगी।
सीधे टकराव से दूरी क्यों जरूरी है
चीन जानता है कि अमेरिका से सीधा टकराव कई मोर्चों पर उसे नुकसान पहुंचा सकता है। व्यापारिक संबंध, वैश्विक सप्लाई चेन और तकनीकी निर्भरता जैसे मुद्दे उसे सतर्क रहने पर मजबूर करते हैं। इसके अलावा ताइवान और दक्षिण चीन सागर जैसे संवेदनशील मसलों पर पहले से ही तनाव बना हुआ है।
ऐसे में वेनेजुएला को लेकर सैन्य या आक्रामक कदम उठाना चीन के लिए जोखिम भरा हो सकता है। इसलिए वह संतुलन बनाए रखते हुए अपने दीर्घकालिक हितों को साधने की कोशिश कर रहा है।
निष्कर्ष: शांत रणनीति में छुपा बड़ा संदेश
वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले के बाद चीन की प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि वह जल्दबाजी में फैसले लेने के बजाय लंबी दूरी की सोच के साथ आगे बढ़ता है। वह न केवल अपने आर्थिक हितों की रक्षा करना चाहता है, बल्कि वैश्विक राजनीति में खुद को एक जिम्मेदार और प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी काम कर रहा है।
चीन का यह संयमित रवैया आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
