दक्षिण एशिया और मध्य एशिया की भू-राजनीति एक बार फिर तेजी से बदलती नजर आ रही है। लंबे समय तक पाकिस्तान को अपना सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार मानने वाला चीन अब उसी पाकिस्तान से दूरी बनाता दिखाई दे रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान में लगातार बढ़ते आतंकी हमले, अस्थिर सुरक्षा हालात और चीनी नागरिकों तथा निवेश की सुरक्षा को लेकर पैदा हुई गंभीर चिंताएं हैं। इन हालातों के बीच चीन ने एक वैकल्पिक रास्ते की ओर कदम बढ़ा दिए हैं, जो सीधे अफगानिस्तान से जुड़ता है और पाकिस्तान को पूरी तरह दरकिनार करता है। यह रास्ता है वाखान कॉरिडोर, जिसे सक्रिय करने को लेकर चीन और अफगानिस्तान में काबिज तालिबान के बीच उच्चस्तरीय बातचीत हो चुकी है।

यह फैसला केवल एक भौगोलिक या व्यापारिक बदलाव नहीं है, बल्कि इसके पीछे चीन की सुरक्षा, आर्थिक हित और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का भविष्य जुड़ा हुआ है। साथ ही यह कदम पाकिस्तान के लिए एक बड़े रणनीतिक झटके के रूप में देखा जा रहा है।
पाकिस्तान में आतंकी हमले और चीन की बढ़ती बेचैनी
पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान आतंकी हमलों की लगातार मार झेल रहा है। इन हमलों का असर सिर्फ स्थानीय हालात तक सीमित नहीं रहा, बल्कि विदेशी निवेशकों और खास तौर पर चीन की चिंताओं को भी गहरा करता गया। पाकिस्तान में चीन के अरबों डॉलर के निवेश, विशेष रूप से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा, लंबे समय से बीजिंग की प्राथमिकताओं में रहा है। लेकिन हालिया समय में चीनी इंजीनियरों, मजदूरों और परियोजनाओं पर हमलों ने चीन को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या पाकिस्तान अब उसकी सुरक्षा अपेक्षाओं पर खरा उतर पा रहा है।
चीन की नजर में समस्या सिर्फ आतंकी हमलों की संख्या नहीं है, बल्कि पाकिस्तान की कानून-व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति भी है। बार-बार यह आरोप सामने आए हैं कि पाकिस्तान अपने देश में मौजूद चीनी नागरिकों और संपत्तियों की सुरक्षा करने में विफल रहा है। यही वजह है कि बीजिंग अब वैकल्पिक रास्तों और नए साझेदारों की तलाश में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
वाखान कॉरिडोर: पाकिस्तान को बायपास करने का नया रास्ता
वाखान कॉरिडोर अफगानिस्तान के बदाख्शान प्रांत में स्थित जमीन की एक पतली लेकिन रणनीतिक रूप से बेहद अहम पट्टी है। यह कॉरिडोर एक तरफ अफगानिस्तान को चीन के शिनजियांग प्रांत से जोड़ता है, तो दूसरी तरफ यह पाकिस्तान के गिलगित-बल्तिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्रों के करीब स्थित है। इस कॉरिडोर की खास बात यह है कि इसके जरिए चीन सीधे अफगानिस्तान से संपर्क स्थापित कर सकता है, बिना पाकिस्तान की भूमि पर निर्भर हुए।
भूगोल की दृष्टि से यह इलाका दुर्गम जरूर है, लेकिन रणनीतिक तौर पर इसकी अहमियत असाधारण है। वाखान कॉरिडोर की पूर्वी सीमा लगभग 75 किलोमीटर लंबी है, जो सीधे चीन के शिनजियांग प्रांत से सटी हुई है। कुल मिलाकर यह कॉरिडोर करीब 350 किलोमीटर लंबा है और अलग-अलग हिस्सों में इसकी चौड़ाई 20 से 60 किलोमीटर के बीच बदलती रहती है। इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 10,300 वर्ग किलोमीटर है।
ऐतिहासिक सिल्क रूट और आधुनिक रणनीति
वाखान कॉरिडोर कोई नया नाम नहीं है। इतिहास में यह इलाका प्राचीन सिल्क रूट का हिस्सा रहा है, जो अफगानिस्तान के रास्ते चीन को मध्य एशिया, यूरोप और दक्षिण एशिया से जोड़ता था। व्यापार, संस्कृति और विचारों का आदान-प्रदान इसी रास्ते से हुआ करता था। अब सदियों बाद चीन उसी ऐतिहासिक मार्ग को आधुनिक रणनीतिक और आर्थिक जरूरतों के हिसाब से फिर से जीवित करने की तैयारी में है।
आज के दौर में जब बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत चीन दुनिया भर में संपर्क और व्यापार के नए मार्ग विकसित कर रहा है, तब वाखान कॉरिडोर उसे पाकिस्तान पर निर्भरता कम करने का अवसर देता है। यह कॉरिडोर न सिर्फ अफगानिस्तान बल्कि ईरान के चाबहार बंदरगाह तक पहुंच के लिए भी एक संभावित वैकल्पिक मार्ग बन सकता है।
बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव और सुरक्षा का पुनर्मूल्यांकन
चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव उसकी वैश्विक रणनीति का सबसे अहम स्तंभ माना जाता है। इसके तहत चीन एशिया, अफ्रीका और यूरोप में बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों, सड़कों और रेलवे नेटवर्क का विस्तार कर रहा है। पाकिस्तान में सीपीईसी इसी पहल का एक प्रमुख हिस्सा रहा है। लेकिन पाकिस्तान में बिगड़ते सुरक्षा हालात ने इस पूरे प्रोजेक्ट की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बीजिंग अब अपने फ्लैगशिप प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा स्थिति का नए सिरे से आकलन कर रहा है। चीन को यह डर सताने लगा है कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो पाकिस्तान में किया गया उसका भारी निवेश खतरे में पड़ सकता है। यही वजह है कि चीन ने न सिर्फ नए रास्तों की तलाश शुरू की है, बल्कि पाकिस्तान में सीपीईसी से जुड़े कुछ प्रोजेक्ट्स में निवेश को भी कम कर दिया है।
तालिबान और चीन: मजबूरी में साझेदारी
अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता स्थापित होने के बाद से देश की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और सीमित विदेशी मान्यता के चलते अफगानिस्तान को बड़े निवेश की सख्त जरूरत है। ऐसे में चीन तालिबान के लिए एक अहम संभावित साझेदार बनकर उभरा है।
तालिबान को चीन के निवेश, तकनीकी सहयोग और व्यापारिक संपर्क की आवश्यकता है, जबकि चीन को एक सुरक्षित और स्थिर मार्ग चाहिए, जो पाकिस्तान के जोखिमों से मुक्त हो। इसी साझा जरूरत ने दोनों पक्षों को वाखान कॉरिडोर को लेकर करीब ला दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तालिबान ने ईस्ट तुर्कमेनिस्तान से जुड़े विद्रोही गुटों की आपत्तियों के बावजूद चीन से संपर्क बढ़ाने का फैसला किया है, ताकि आर्थिक लाभ हासिल किया जा सके।
हाई लेवल बातचीत और भविष्य की दिशा
चीन और तालिबान के बीच वाखान कॉरिडोर को सक्रिय करने को लेकर हाल ही में उच्चस्तरीय बैठक हुई है। इस बातचीत का मकसद सिर्फ एक सड़क या व्यापार मार्ग खोलना नहीं है, बल्कि एक दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी की नींव रखना है। चीन इस कॉरिडोर के जरिए न केवल व्यापारिक संपर्क बढ़ाना चाहता है, बल्कि क्षेत्र में अपनी रणनीतिक मौजूदगी को भी मजबूत करना चाहता है।
इस पहल के जरिए चीन पाकिस्तान को साफ संदेश दे रहा है कि उसकी प्राथमिकता अब केवल पारंपरिक साझेदारों तक सीमित नहीं है। अगर सुरक्षा और स्थिरता नहीं मिली, तो वह विकल्प तलाशने से पीछे नहीं हटेगा।
पाकिस्तान के लिए बड़ा झटका
चीन का यह कदम पाकिस्तान के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। लंबे समय से पाकिस्तान चीन को अपना सबसे भरोसेमंद दोस्त बताता आया है। लेकिन अब जब चीन खुले तौर पर पाकिस्तान को बायपास करने की योजना बना रहा है, तो यह इस रिश्ते में आई दरार को साफ तौर पर दिखाता है।
पाकिस्तान के लिए चिंता की बात यह भी है कि अगर वाखान कॉरिडोर पूरी तरह सक्रिय हो गया, तो क्षेत्रीय व्यापार और रणनीतिक महत्व में उसकी भूमिका कमजोर पड़ सकती है। साथ ही चीन के निवेश में कमी और वैकल्पिक मार्गों की तलाश पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर भी असर डाल सकती है।
क्षेत्रीय भू-राजनीति पर असर
वाखान कॉरिडोर के सक्रिय होने से सिर्फ चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की भू-राजनीति प्रभावित होगी। मध्य एशिया, दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया के बीच नए समीकरण बन सकते हैं। ईरान का चाबहार बंदरगाह भी इस पूरे परिदृश्य में अहम भूमिका निभा सकता है, क्योंकि यह कॉरिडोर अफगानिस्तान के जरिए वहां तक पहुंच का रास्ता खोल सकता है।
इसके अलावा, यह कदम चीन को मध्य एशिया और यूरोप से जोड़ने वाले मार्गों में अधिक लचीलापन और सुरक्षा प्रदान कर सकता है। वहीं पाकिस्तान के लिए यह एक चेतावनी भी है कि केवल रणनीतिक साझेदारी के भरोसे सुरक्षा और स्थिरता की अनदेखी नहीं की जा सकती।
