दक्षिण भारत के प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक नगर तिरुपति में आयोजित विज्ञान सम्मेलन ने इस बार केवल तकनीकी विषयों तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना, पौराणिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच सेतु बनाने का प्रयास भी किया। इस सम्मेलन में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का एक अलग ही रूप देखने को मिला। आमतौर पर सूचना प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नवाचार के पक्षधर माने जाने वाले नायडू ने इस मंच से भारतीय महाकाव्यों और सांस्कृतिक विरासत की महत्ता को रेखांकित किया।

मुख्यमंत्री नायडू ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की सभ्यता केवल आधुनिक तकनीक से नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से संचित ज्ञान, कथाओं और मूल्यों से निर्मित हुई है। उन्होंने हनुमान और अर्जुन जैसे पौराणिक पात्रों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय ग्रंथों में वर्णित शक्ति, बुद्धि और रणनीति आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हो सकती है।
हनुमान और अर्जुन: शक्ति और विवेक के प्रतीक
अपने भाषण के दौरान मुख्यमंत्री नायडू ने कहा कि हनुमान को केवल एक पौराणिक चरित्र के रूप में नहीं, बल्कि अनुशासन, भक्ति, बल और निस्वार्थ सेवा के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि आधुनिक संदर्भ में तुलना की जाए, तो हनुमान की शक्ति किसी भी काल्पनिक सुपरहीरो से कहीं अधिक प्रेरणादायक है, क्योंकि उनकी ताकत केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और नैतिक भी थी।
इसी तरह अर्जुन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि महाभारत का यह महान योद्धा केवल युद्ध कौशल के लिए नहीं जाना जाता, बल्कि उसकी एकाग्रता, रणनीतिक सोच और धर्म के प्रति निष्ठा उसे अद्वितीय बनाती है। नायडू ने कहा कि अर्जुन की तुलना आधुनिक काल के काल्पनिक नायकों से करना भारतीय विरासत की गहराई को कम करके आंकना होगा।
विज्ञान और धर्म के बीच संवाद की जरूरत
सम्मेलन के दौरान यह बात बार-बार उभरकर सामने आई कि विज्ञान और धर्म को आमतौर पर एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखा जाता है, जबकि वास्तव में दोनों का उद्देश्य मानव जीवन को बेहतर बनाना है। मुख्यमंत्री नायडू ने कहा कि भारतीय परंपरा में विज्ञान और आध्यात्म हमेशा साथ-साथ चले हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में खगोल विज्ञान, गणित, चिकित्सा और प्रकृति विज्ञान से जुड़ा गहरा ज्ञान मौजूद है, जिसे आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने और आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, बच्चों और युवाओं को केवल आधुनिक तकनीक सिखाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक जड़ों से भी जोड़ा जाना चाहिए।
बच्चों और युवाओं के लिए सांस्कृतिक शिक्षा पर जोर
मुख्यमंत्री नायडू ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि आज की पीढ़ी वैश्विक संस्कृति और तकनीकी प्रगति से तो जुड़ रही है, लेकिन भारतीय महाकाव्यों और सांस्कृतिक विरासत से उसका संपर्क धीरे-धीरे कमजोर हो रहा है। उन्होंने कहा कि रामायण और महाभारत जैसी कथाएं केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि जीवन प्रबंधन, नैतिकता और नेतृत्व की शिक्षा देती हैं।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बकासुर और कंस जैसे पात्रों की कहानियों के माध्यम से बच्चों को अच्छे और बुरे के बीच अंतर समझाया जा सकता है। इसी तरह राम और कृष्ण जैसे चरित्र आदर्श नेतृत्व और करुणा का संदेश देते हैं।
तिरुपति विज्ञान सम्मेलन का महत्व
26 से 29 दिसंबर तक आयोजित इस विज्ञान सम्मेलन में देशभर से वैज्ञानिक, शिक्षाविद, तकनीकी विशेषज्ञ और नीति निर्माता शामिल हुए। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भविष्य की तकनीकों, जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग और डेटा साइंस पर चर्चा करना था, लेकिन इसके साथ-साथ भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भ में देखने का प्रयास भी किया गया।
इस मंच पर मुख्यमंत्री नायडू का संबोधन इस बात का संकेत था कि आने वाले समय में तकनीकी विकास के साथ सांस्कृतिक चेतना को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए।
IT प्रेमी नेता का नया अवतार
चंद्रबाबू नायडू को देश में आईटी क्रांति के अग्रदूतों में गिना जाता है। हैदराबाद और आंध्र प्रदेश को तकनीकी हब के रूप में विकसित करने में उनकी भूमिका को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है। ऐसे में विज्ञान सम्मेलन में उनका सांस्कृतिक और पौराणिक संदर्भों से भरा भाषण कई लोगों के लिए चौंकाने वाला भी था।
नायडू ने स्पष्ट किया कि तकनीक और संस्कृति के बीच संतुलन बनाए बिना किसी भी समाज का समग्र विकास संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि भारत को वैश्विक स्तर पर नेतृत्व करना है, तो उसे अपनी पहचान और विरासत के साथ आगे बढ़ना होगा।
भारतीय महाकाव्य और आधुनिक नेतृत्व
मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में यह भी कहा कि महाभारत और रामायण केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि नेतृत्व, रणनीति और संकट प्रबंधन की जीवंत पाठशालाएं हैं। अर्जुन का संशय और कृष्ण का मार्गदर्शन आज के मैनेजमेंट सिद्धांतों से कहीं अधिक गहरा है।
उन्होंने कहा कि यदि आधुनिक शिक्षा प्रणाली में इन ग्रंथों की कहानियों को वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण से शामिल किया जाए, तो यह युवाओं के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
निष्कर्ष: परंपरा और प्रगति का संतुलन
तिरुपति विज्ञान सम्मेलन में मुख्यमंत्री नायडू का संबोधन इस बात का प्रतीक था कि भारत की ताकत उसकी विविधता और गहरी सांस्कृतिक जड़ों में निहित है। विज्ञान और तकनीक के साथ-साथ यदि सांस्कृतिक चेतना को भी समान महत्व दिया जाए, तो भारत न केवल तकनीकी महाशक्ति बनेगा, बल्कि नैतिक और मानवीय मूल्यों में भी अग्रणी रहेगा।
harigeet pravaah के अनुसार, यह विचारधारा आने वाले समय में शिक्षा और नीति निर्माण की दिशा तय कर सकती है।
