किसी भी सभ्य समाज में इंसानी जान की कीमत एक समान मानी जानी चाहिए, लेकिन जब हादसों के बाद मिलने वाले मुआवजे पर नजर डाली जाती है, तो यह धारणा बिखरती नजर आती है। मध्य प्रदेश में हाल ही में सामने आए दो अलग-अलग हादसों ने सरकार की मुआवजा नीति को कठघरे में खड़ा कर दिया है। एक तरफ दूषित पानी से फैली बीमारी के कारण 23 लोगों की मौत हुई, जहां प्रत्येक मृतक के परिजन को 2 लाख रुपये की राहत राशि दी गई, वहीं दूसरी ओर इससे पहले हुए हादसों में मुआवजे की राशि कहीं अधिक रही।

इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में गंदे पानी से हुई मौतों के बाद मुआवजे को लेकर जनता में गहरी नाराजगी है। लोग सवाल कर रहे हैं कि आखिर इंसानी जान की कीमत तय करने के लिए सरकार के पास कोई स्पष्ट नियम क्यों नहीं है।
भागीरथपुरा की त्रासदी: गंदे पानी से गई 23 जानें
भागीरथपुरा इलाके में लंबे समय से दूषित पानी की समस्या बनी हुई थी। स्थानीय लोग कई बार शिकायत कर चुके थे कि नलों से आ रहा पानी बदबूदार है और उसका रंग भी सामान्य नहीं है। इसके बावजूद समय रहते कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। नतीजा यह हुआ कि जलजनित बीमारी ने पूरे इलाके को अपनी चपेट में ले लिया।
धीरे-धीरे हालात इतने बिगड़ गए कि 23 लोगों की मौत हो गई। यह कोई अचानक हुआ हादसा नहीं था, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा था। बीमारी फैलने के बाद स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन हरकत में आया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
मुआवजा घोषित, लेकिन सवाल बरकरार
प्रदेश सरकार ने मृतकों के परिजनों को 2-2 लाख रुपये की राहत राशि देने की घोषणा की। कागजों पर यह फैसला संवेदनशील लग सकता है, लेकिन जब इसकी तुलना पहले हुए हादसों से की जाती है, तो यह राशि बेहद कम नजर आती है।
लोग पूछ रहे हैं कि क्या गंदे पानी से हुई मौत किसी हादसे से कम गंभीर है। क्या बीमारी से मरने वालों की जान की कीमत कम आंकी जानी चाहिए।
बावड़ी हादसा और मुआवजे का फर्क
इंदौर में इससे पहले बेलेश्वर महादेव मंदिर की बावड़ी हादसे ने पूरे देश को झकझोर दिया था। धार्मिक आयोजन के दौरान अचानक बावड़ी की छत धंस गई और कई लोग उसमें गिर गए। इस हादसे में 7 लोगों की जान चली गई।
उस समय सरकार ने मृतकों के परिजनों को कहीं ज्यादा मुआवजा दिया था। यह फैसला तत्काल लिया गया और इसमें कोई देरी नहीं हुई। यही वजह है कि अब भागीरथपुरा के पीड़ित परिवार खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं।
हादसे अलग, लेकिन जान तो एक जैसी
कानूनी और नैतिक दृष्टि से देखा जाए तो हादसे की प्रकृति चाहे जैसी हो, इंसानी जान की कीमत एक समान होनी चाहिए। लेकिन व्यवहार में ऐसा होता नजर नहीं आता।
जहां बड़े हादसे या चर्चित घटनाएं होती हैं, वहां मुआवजा ज्यादा होता है, जबकि धीमी मौत देने वाली घटनाओं में राहत राशि कम रखी जाती है। यह सोच न केवल पीड़ित परिवारों के लिए अपमानजनक है, बल्कि समाज में असमानता की भावना भी पैदा करती है।
मुआवजा नीति की खामियां
प्रदेश में मुआवजा तय करने के लिए कोई स्पष्ट और स्थायी नीति नहीं है। हर घटना के बाद अलग-अलग तरीके से फैसला लिया जाता है। यह निर्णय अक्सर घटना की मीडिया कवरेज, राजनीतिक दबाव और जन आक्रोश पर निर्भर करता है।
यही वजह है कि कभी 2 लाख तो कभी 5 लाख और कभी इससे भी ज्यादा मुआवजा घोषित किया जाता है। इस असंगति ने सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पीड़ित परिवारों की पीड़ा
भागीरथपुरा में जिन परिवारों ने अपनों को खोया है, उनके लिए 2 लाख रुपये न तो आर्थिक नुकसान की भरपाई कर सकते हैं और न ही भावनात्मक क्षति को कम कर सकते हैं।
कई परिवार ऐसे हैं, जहां मृतक ही घर का एकमात्र कमाने वाला था। अब उन परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में राहत राशि केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है।
प्रशासनिक जिम्मेदारी से बचने का तरीका
विशेषज्ञों का मानना है कि कम मुआवजा देकर सरकार अक्सर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करती है। अगर मुआवजा ज्यादा होगा, तो लापरवाही की जिम्मेदारी भी तय करनी पड़ेगी।
भागीरथपुरा मामले में भी यही सवाल उठ रहा है कि दूषित पानी की शिकायतों को समय रहते क्यों नहीं सुना गया। अगर पहले ही कार्रवाई होती, तो 23 जानें बचाई जा सकती थीं।
समाज में बढ़ता अविश्वास
जब सरकार मुआवजे में भेदभाव करती है, तो आम लोगों का भरोसा सिस्टम से उठने लगता है। लोगों को लगता है कि उनकी जान की कोई कीमत नहीं है।
यह अविश्वास लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। क्योंकि जब नागरिक खुद को असुरक्षित और उपेक्षित महसूस करते हैं, तो वे व्यवस्था से दूरी बनाने लगते हैं।
मुआवजा नहीं, रोकथाम जरूरी
हादसों के बाद मुआवजा देना जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है ऐसी घटनाओं को रोकना। गंदे पानी की समस्या कोई नई नहीं है। हर साल बारिश के मौसम में जलजनित बीमारियां फैलती हैं और जानें जाती हैं।
अगर समय रहते पाइपलाइन, टंकियों और जल आपूर्ति व्यवस्था की जांच की जाए, तो ऐसी मौतों को रोका जा सकता है।
एक समान नीति की जरूरत
अब समय आ गया है कि सरकार मुआवजा तय करने के लिए एक समान नीति बनाए। हादसा चाहे किसी भी तरह का हो, इंसानी जान की कीमत एक ही होनी चाहिए।
इससे न केवल पीड़ित परिवारों को न्याय का एहसास होगा, बल्कि प्रशासन भी ज्यादा जिम्मेदार बनेगा।
निष्कर्ष: जान की कीमत आंकड़ों में नहीं
भागीरथपुरा की त्रासदी ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हमारे सिस्टम में इंसानी जान की कीमत अब भी तय नहीं है। जब तक मुआवजा नीति में समानता और पारदर्शिता नहीं आएगी, तब तक ऐसे सवाल उठते रहेंगे।
यह सिर्फ मुआवजे की बात नहीं, बल्कि उस संवेदनशीलता की परीक्षा है, जिससे सरकार अपने नागरिकों को देखती है।
