दक्षिण एशिया के समुद्री क्षेत्र में इस समय एक गहरी बेचैनी फैली हुई है। कुछ ही दिनों पहले श्रीलंका में भारी तबाही मचाने वाला चक्रवात दितवाह अब भारत की ओर बढ़ रहा है। मौसम के बदलते तेवर और गहरे समुद्री दबाव की हलचल ने पूरे दक्षिण भारत का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। मौसम विशेषज्ञ लगातार स्थिति पर नजर रख रहे हैं, वहीं तटीय इलाकों में लोग भी हवाओं की आवाज में आने वाले तूफान की परछाईं तलाशने लगे हैं।

चक्रवातों की दुनिया में हर तूफान की अपनी एक अलग कहानी होती है। दितवाह की कहानी भी ऐसी ही है, जो धीमी चाल से आगे बढ़ते हुए किसी अनजान यात्री की तरह समुद्र की सतह पर खतरे की एक लकीर खींच रहा है। इसकी रफ्तार तेज नहीं है, पर इसका प्रभाव अत्यंत घातक साबित हो रहा है। श्रीलंका में बाढ़, भूस्खलन और मूसलाधार बारिश से हुई तबाही ने इसकी शक्ति का अंदाजा पहले ही दे दिया है। अब भारत के तटीय राज्य, विशेषकर तमिलनाडु, पुडुचेरी और दक्षिण आंध्र प्रदेश, इसके प्रभाव के लिए तैयार किए जा रहे हैं।
दक्षिण भारत के मौसम में बदलाव की शुरुआत
चेन्नई और उसके आसपास के क्षेत्रों में सुबह से ही मौसम का मिजाज बदलने लगा। आकाश के रंग ने गहरा ग्रे रूप ले लिया। बादलों का फैलाव ऐसा था जैसे वे किसी बड़े घटनाक्रम की प्रस्तावना कर रहे हों। धीरे-धीरे बारिश की बूंदें गिरनी शुरू हुईं, जो इस बात का संकेत थीं कि चक्रवात भले दूर हो, उसका असर अब भारतीय तटों पर महसूस होना शुरू हो चुका है।
दक्षिण-पश्चिम बंगाल की खाड़ी में इस समय समुद्री धाराएं अनिश्चित दिशा में उछाल मार रही हैं। IMD ने बताया कि चक्रवात दितवाह की रफ्तार शुरू में जितनी थी, अब उससे काफी कम हो चुकी है। पिछले 15 घंटों में इसने केवल 70 किलोमीटर का सफर तय किया और इसकी गति 3 किलोमीटर प्रति घंटे रह गई है। इसकी धीमी रफ्तार ही इसकी गंभीरता का कारण बन रही है, क्योंकि यह लंबे समय तक समुद्र के ऊपर सक्रिय रहा है और इसमें भारी जलराशि और तूफानी ऊर्जा जमा हो चुकी है।
चक्रवात की अगली चाल: मौसम वैज्ञानिकों की चेतावनी
मौसम विभाग ने जानकारी दी है कि चक्रवात 30 नवंबर को तमिलनाडु तट के समानांतर उत्तर-उत्तर पश्चिम की दिशा में बढ़ेगा। तट से सटे इलाकों में इसके कारण तेज हवाएं, तीव्र बारिश और समुद्री उफान देखने को मिल सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी अनुमान लगाया है कि भारत की तटरेखा तक पहुंचते-पहुंचते यह चक्रवात धीरे-धीरे कमजोर होकर एक गहरे दबाव (डीप डिप्रेशन) में बदल जाएगा।
लेकिन यह बदलाव खतरे को कम नहीं करता, क्योंकि कमजोर पड़ने के बाद भी यह भारी जलवृष्टि, तेज हवाओं और समुद्री तटीय इलाकों में जलभराव जैसी स्थितियां पैदा कर सकता है। चेन्नई से लगभग 470 किलोमीटर दक्षिण में मौजूद यह तूफान अभी भी समुद्र में अपनी शक्ति संजो रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि शनिवार से हवाओं की गति अचानक बढ़ सकती है। तटीय क्षेत्रों में 70 से 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली हवाएं चल सकती हैं। डेल्टा क्षेत्रों में, जहां खेतों में फसलें लहलहा रही हैं, वहां इन हवाओं की गति 90 किलोमीटर प्रति घंटे तक पहुंचने की आशंका है। पुडुचेरी और कराईकल जैसे तटीय शहरों को भी तेज हवाओं और भारी बारिश का सामना करना पड़ सकता है।
IMD ने जारी किया अलर्ट: सावधानी ही सुरक्षा
भारतीय मौसम विभाग ने तमिलनाडु के उत्तरी जिलों के लिए रेड अलर्ट जारी किया है, जहां एक या दो स्थानों पर 20 सेंटीमीटर से अधिक बारिश होने की संभावना है। चेन्नई और आसपास के जिलों के लिए ऑरेंज अलर्ट लगाया गया है, जिसमें 12 से 20 सेंटीमीटर के बीच भारी से अत्यधिक भारी बारिश का अनुमान शामिल है। मौसम विभाग ने बताया कि शनिवार और रविवार को रायलसीमा और दक्षिण आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी भीषण बारिश की संभावना है।
आंध्र प्रदेश सरकार ने भी आपात तैयारी शुरू कर दी है। तटीय जिलों में कंट्रोल रूम स्थापित किए गए हैं और राज्य आपदा प्रतिक्रिया बल (SDRF) को तैनात किया गया है ताकि किसी भी आपात स्थिति का तुरंत सामना किया जा सके।
श्रीलंका में तबाही और भारत की मदद के प्रयास
चक्रवात दितवाह ने श्रीलंका में जो विध्वंस मचाया है, उसने पूरे क्षेत्र को झकझोर दिया। वहां 123 से अधिक लोगों की जान चली गई है। हजारों घर बाढ़ के पानी में बह गए और कई गांवों में भूस्खलन के कारण लोग मलबे में दब गए। लगभग 3.73 लाख लोग इस आपदा से प्रभावित हुए हैं और 43 हजार से ज्यादा लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है।
इस भीषण आपदा में भारत ने तेजी दिखाते हुए अपने पड़ोसी देश की सहायता के लिए ऑपरेशन सागर बंधु की शुरुआत की। इस मानवीय अभियान के तहत राहत सामग्री की पहली खेप भारत के आधुनिक नेवी एयरक्राफ्ट कैरियर INS विक्रांत और फ्रंटलाइन युद्धपोत INS उदयगिरी से भेजी गई है। राहत सामग्री में खाद्यान्न, पानी, दवाइयां और आपदा प्रबंधन उपकरण शामिल हैं।
भारत का यह कदम दर्शाता है कि समुद्री पड़ोसी देशों के बीच आपसी सहयोग कितना महत्वपूर्ण है। समुद्री तूफान सीमाओं को नहीं पहचानते, इसलिए इनसे निपटने की तैयारी में भी हर देश को मिलकर काम करना होता है।
दक्षिण भारत के लोगों में बढ़ती चिंता और तैयारियां
चेन्नई, तटीय तमिलनाडु और पुडुचेरी के लोग चक्रवातों की प्रकृति से अनजान नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में इन राज्यों ने कई शक्तिशाली तूफानों का सामना किया है, जिनमें वरदा और नीवार जैसे चक्रवात शामिल हैं। लेकिन हर नया चक्रवात एक नया भय लेकर आता है, क्योंकि हर तूफान का स्वभाव अलग होता है।
लोगों ने घरों की खिड़कियां मजबूत की हैं, पानी-भोजन का स्टॉक तैयार किया है और समुद्र के पास रहने वाले परिवार सुरक्षित स्थानों की ओर रवाना हो रहे हैं। प्रशासन ने भी स्कूलों को बंद रखने और तटीय इलाकों में मछुआरों को समुद्र में न जाने की सलाह दी है।
समुद्र का रंग बदल चुका है। लहरें ऊंची होने लगी हैं और तट से टकराते समय उनकी आवाज पहले से अधिक तीव्र सुनाई देती है। यह सब इस बात का संकेत है कि चक्रवात अभी भले दूर हो, पर उसका असर तटीय धरती को छूने ही वाला है।
मौसम विशेषज्ञों की चेतावनी और वैज्ञानिक विश्लेषण
रीजनल वेदर फोरकास्टिंग सेंटर के निदेशक पी सेंथमराई कन्नन ने कहा कि इस चक्रवात की खासियत इसकी धीमी गति है। धीरे बढ़ने वाले चक्रवात समुद्र में अधिक ऊर्जा संग्रहित कर लेते हैं। यही कारण है कि बारिश की मात्रा अधिक होती है और बादलों की घनत्व संख्या भी काफी रहती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार चक्रवात कमजोर पड़कर भीषण बारिश का कारण बन सकते हैं, क्योंकि उनमें कम दबाव वाला क्षेत्र लंबे समय तक सक्रिय रहता है। हवा की दिशा में अचानक बदलाव, समुद्र का गर्म होना और जलवाष्प का अत्यधिक घनत्व इसे और सक्रिय बनाए रखता है।
तटीय राज्य क्यों रहते हैं सबसे अधिक खतरे में
भारत की लंबी समुद्री सीमा और बंगाल की खाड़ी की भौगोलिक स्थिति इसे चक्रवातों के लिए खास तौर पर संवेदनशील बनाती है। बंगाल की खाड़ी दुनिया के उन समुद्री क्षेत्रों में से एक है, जहां चक्रवात बनने की गतिविधि सर्वाधिक होती है। समुद्र की गहराई, जल का तापमान और वाष्पीकरण की तीव्रता इस प्रक्रिया को और तेज कर देती है।
तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के तट तूफानों के प्राकृतिक मार्ग पर पड़ते हैं, इसलिए यहां हर वर्ष उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की संख्या बढ़ जाती है। यह बदलते मौसम का संकेत भी है, जहां जलवायु परिवर्तन ने चक्रवातों की आवृत्ति और तीव्रता दोनों में वृद्धि कर दी है।
सरकारी एजेंसियों की तैयारियां और राहत योजनाएं
तटीय राज्यों में प्रशासन ने पहले ही एहतियाती कदम उठाना शुरू कर दिया है। निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित आश्रयों में भेजा जा रहा है। बिजली विभाग को आपातकालीन स्थिति के लिए तैयार रहने के निर्देश दिए गए हैं। जलभराव और बाढ़ से निपटने के लिए नगर निकायों को पंपिंग स्टेशन सक्रिय करने के आदेश दिए गए हैं।
स्वास्थ्य विभाग ने अस्पतालों में अतिरिक्त स्टाफ और दवाइयों का इंतजाम किया है। राहत शिविरों में पीने के पानी और भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है।
चक्रवात आने से पहले तैयारी ही नुकसान को कम कर सकती है। यही कारण है कि मौसम विभाग अलर्ट जारी करने के साथ-साथ लोगों को भी सावधानी बरतने की सलाह दे रहा है।
समुद्र की बेचैनी और लहरों की गर्जना
तमिलनाडु के तट पर इस समय समुद्र असामान्य रूप से उफान मार रहा है। रात होते ही लहरों की गर्जना और तेज हो जाती है। लगता है मानो समुद्र अपने भीतर कोई बड़ा रहस्य छिपाए बैठा हो, जो धीरे-धीरे धरती पर प्रकट होने वाला है।
मछुआरों के जाल किनारे पड़े हुए हैं। नावें तट पर बांध दी गई हैं। तट के पास लगी रोशनियां हल्की-हल्की कांपती हैं, जैसे खुद मौसम भी डर गया हो।
उधर ग्रामीण इलाकों में लोग अपने घरों के बाहर खड़े होकर आसमान का मिजाज देखते रहते हैं। हवा में गीली मिट्टी की गंध है और वातावरण में एक बेचैनी है, जो आने वाले समय का संकेत दे रही है।
भारत के लिए यह चेतावनी क्यों जरूरी है
चक्रवात दितवाह का भारत पर सीधा प्रभाव भले थोड़ा कमजोर दिखाई दे, लेकिन बारिश, बाढ़ और तेज हवाएं बड़ी तबाही ला सकती हैं। पिछले वर्षों में देश ने देखा है कि कमजोर चक्रवात भी कई स्थानों पर भारी विनाश का कारण बन जाते हैं।
सड़कों पर पानी भरना, पेड़ों का गिरना, बिजली गुल होना, ट्रेनों और फ्लाइट्स का प्रभावित होना, ये सब ऐसी स्थितियां हैं, जिनका सामना दक्षिण भारत को आने वाले दो दिनों में करना पड़ सकता है।
मौसम विभाग ने स्पष्ट किया है कि यह एक व्यापक वर्षा प्रणाली बनेगा, जो कई राज्यों में प्रभाव दिखाएगा। इसलिए हर नागरिक, विशेषकर तटीय क्षेत्रों के लोग, अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करें और सरकारी निर्देशों का पालन करें।
समुद्री पड़ोसी देशों में सहयोग की मिसाल
भारत और श्रीलंका के बीच इस समय जो मानवीय सहयोग चल रहा है, वह इस बात का उदाहरण है कि प्राकृतिक आपदाएं देशों की सीमाओं को नहीं मानतीं। जब श्रीलंका में 3 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए, तो भारत ने तुरंत मदद भेजकर यह संदेश दिया कि पड़ोसी सिर्फ भौगोलिक रूप से जुड़े नहीं होते, बल्कि मानवता के बंधन से भी जुड़े होते हैं।
चक्रवात का भविष्य: कब होगा असर खत्म
मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 30 नवंबर तक चक्रवात दितवाह भारतीय तटों के पास पहुंचकर कमजोर पड़ जाएगा। लेकिन इसका असर बारिश, समुद्री उफान और तेज हवाओं के रूप में अभी लंबा चलेगा। दक्षिण भारत में अगले तीन दिनों तक असामान्य मौसम रह सकता है और कई जिलों में सामान्य जीवन प्रभावित होने की संभावना है।
लेकिन राहत की बात यह है कि प्रशासन पूरी तैयारी में है। अनुभव, तकनीक और समय पर चेतावनी ने भारत को अन्य देशों की तुलना में चक्रवातों का मुकाबला करने में अधिक सक्षम बना दिया है।
फिलहाल, दक्षिण भारत एक कठिन समय की तैयारी कर रहा है और यह उम्मीद की जा रही है कि यह चुनौती भी संयम, सतर्कता और मिलजुलकर प्रयास से पार की जाएगी।
