भारत में रक्षा तकनीक का क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। आधुनिक युद्ध केवल हथियारों की ताकत से नहीं, बल्कि तकनीक, सूचना और नवाचार से लड़े जा रहे हैं। बीते कुछ वर्षों में ड्रोन तकनीक ने सैन्य रणनीति की परिभाषा ही बदल दी है। निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने, दुर्गम इलाकों में सामग्री पहुंचाने और सटीक हमलों में ड्रोन अब एक अनिवार्य साधन बन चुके हैं। इसी पृष्ठभूमि में इंदौर स्थित देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा विकसित किया गया एक अनोखा ड्रोन देश की रक्षा तकनीक में नई उम्मीद बनकर उभरा है।

विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला से सीमा तक की सोच
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग एवं टेक्नोलॉजी संस्थान के छात्र अमोघ द्विवेदी और पार्थ तिवारी ने जिस ड्रोन को विकसित किया है, वह केवल एक शैक्षणिक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि भविष्य की सैन्य जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार की गई तकनीक है। इस ड्रोन को ‘फ्रीक्वेंसी हापिंग कामिकाजा ड्रोन’ नाम दिया गया है। यह नाम ही इसकी खासियत को दर्शाता है, क्योंकि यह ड्रोन एक ही फ्रीक्वेंसी पर निर्भर नहीं रहता।
क्यों जरूरी थी मल्टी-फ्रीक्वेंसी तकनीक
आज के समय में अधिकतर ड्रोन सिंगल फ्रीक्वेंसी पर संचालित होते हैं। युद्ध या सुरक्षा अभियानों के दौरान दुश्मन सबसे पहले उसी फ्रीक्वेंसी को जाम करने या ब्लॉक करने की कोशिश करता है। जैसे ही फ्रीक्वेंसी ब्लॉक होती है, ड्रोन का नियंत्रण टूट जाता है और वह निष्क्रिय होकर गिर सकता है। यही ड्रोन तकनीक की सबसे बड़ी कमजोरी मानी जाती रही है।
इसी चुनौती को समझते हुए डीएवीवी के इन छात्रों ने मल्टी-फ्रीक्वेंसी हापिंग सिस्टम पर काम शुरू किया। इस तकनीक में ड्रोन एक ही समय में कई फ्रीक्वेंसी पर काम करता है और जरूरत पड़ने पर बेहद तेजी से एक फ्रीक्वेंसी से दूसरी फ्रीक्वेंसी पर शिफ्ट हो जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि दुश्मन यदि एक या दो फ्रीक्वेंसी ब्लॉक भी कर दे, तो भी ड्रोन का संचालन बाधित नहीं होता।
कामिकाजा ड्रोन की अवधारणा
कामिकाजा ड्रोन का मतलब ऐसे ड्रोन से है, जिन्हें वापसी के लिए नहीं, बल्कि मिशन को पूरा करने के लिए डिजाइन किया जाता है। तकनीकी भाषा में इन्हें लाइटरिंग म्यूनिशन कहा जाता है। इनका मुख्य उद्देश्य लक्ष्य तक पहुंचना होता है, चाहे उसके लिए ड्रोन को खुद नष्ट क्यों न होना पड़े।
डीएवीवी के छात्रों द्वारा विकसित यह ड्रोन दुश्मन क्षेत्र में घुसकर निगरानी करने, आवश्यक सामग्री गिराने या विस्फोटक ले जाने में सक्षम है। यह विशेष रूप से उन परिस्थितियों में उपयोगी साबित हो सकता है, जहां पारंपरिक ड्रोन फ्रीक्वेंसी ब्लॉकिंग के कारण असफल हो जाते हैं।
दो वर्षों की मेहनत का परिणाम
अमोघ द्विवेदी और पार्थ तिवारी के अनुसार, वे पिछले दो वर्षों से ड्रोन तकनीक पर गहन शोध कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने ड्रोन की मौजूदा सीमाओं और युद्धक्षेत्र में आने वाली तकनीकी चुनौतियों का गहराई से अध्ययन किया। इसी रिसर्च के दौरान सेना की एक तकनीकी टीम की ओर से उन्हें मल्टी-फ्रीक्वेंसी ड्रोन विकसित करने का टास्क मिला।
यह टास्क उनके लिए एक बड़ी जिम्मेदारी के साथ-साथ अवसर भी था। करीब डेढ़ साल तक लगातार रिसर्च, डिजाइन, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और हार्डवेयर इंटीग्रेशन के बाद उन्होंने इस ड्रोन का प्रोटोटाइप तैयार किया।
प्रयोगशाला से वास्तविक परीक्षण तक
ड्रोन का पहला परीक्षण विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में किया गया। वहां इसके फ्रीक्वेंसी हापिंग सिस्टम, उड़ान क्षमता और नियंत्रण प्रणाली को परखा गया। प्रारंभिक परीक्षण सफल रहने के बाद ड्रोन को वास्तविक परिस्थितियों में टेस्ट करने की तैयारी की गई।
इसके बाद सेना के अधिकारियों के समक्ष इस ड्रोन का परीक्षण किया गया। विभिन्न परिस्थितियों में ड्रोन को उड़ाया गया, फ्रीक्वेंसी ब्लॉकिंग के सिमुलेशन किए गए और यह देखा गया कि ड्रोन किस तरह खुद को वैकल्पिक फ्रीक्वेंसी पर शिफ्ट करता है। परीक्षणों में ड्रोन ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया, जिससे यह साबित हुआ कि यह तकनीक व्यावहारिक रूप से उपयोगी हो सकती है।
भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए क्यों अहम है यह नवाचार
भारत की भौगोलिक स्थिति और सुरक्षा चुनौतियां बेहद जटिल हैं। सीमावर्ती इलाकों में दुश्मन की निगरानी, घुसपैठ रोकने और आपात परिस्थितियों में तेजी से प्रतिक्रिया देने के लिए भरोसेमंद ड्रोन तकनीक की जरूरत है। मल्टी-फ्रीक्वेंसी कामिकाजा ड्रोन ऐसी ही जरूरतों को पूरा कर सकता है।
यह ड्रोन न केवल निगरानी में मदद करेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर सीमित मात्रा में विस्फोटक या अन्य सामग्री पहुंचाने में भी सक्षम होगा। सबसे बड़ी बात यह है कि फ्रीक्वेंसी ब्लॉकिंग के बावजूद इसका ऑपरेशन जारी रह सकता है, जो इसे मौजूदा ड्रोन तकनीक से अलग और ज्यादा प्रभावी बनाता है।
युवाओं की सोच, देश की ताकत
इस परियोजना ने यह साबित कर दिया है कि अगर युवाओं को सही मार्गदर्शन और अवसर मिले, तो वे वैश्विक स्तर की तकनीक विकसित कर सकते हैं। विश्वविद्यालय स्तर पर किया गया यह नवाचार भविष्य में बड़े रक्षा प्रोजेक्ट्स का आधार बन सकता है।
अमोघ और पार्थ का यह प्रयास केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह देश के लिए भी गर्व की बात है। इससे यह संदेश जाता है कि भारतीय विश्वविद्यालयों में भी उच्च स्तरीय रक्षा अनुसंधान संभव है।
पेटेंट की दिशा में कदम
इस नवाचार की मौलिकता और संभावनाओं को देखते हुए छात्रों ने इस ड्रोन तकनीक के लिए पेटेंट आवेदन भी किया है। पेटेंट मिलने के बाद यह तकनीक व्यावसायिक और सैन्य स्तर पर विकसित की जा सकेगी। इससे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भी एक मजबूत कदम माना जा सकता है।
भविष्य की संभावनाएं
आने वाले समय में इस ड्रोन को और अधिक उन्नत बनाया जा सकता है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बेहतर सेंसर और लंबी रेंज की क्षमताएं जोड़ी जा सकती हैं। इससे यह ड्रोन न केवल सैन्य, बल्कि आपदा प्रबंधन और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भी उपयोगी साबित हो सकता है।
निष्कर्ष
डीएवीवी के छात्रों द्वारा विकसित मल्टी-फ्रीक्वेंसी कामिकाजा ड्रोन यह दिखाता है कि भारत की युवा प्रतिभा देश की रक्षा जरूरतों को समझती है और उनके समाधान खोजने में सक्षम है। यह नवाचार केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि देश के भविष्य की सुरक्षा के लिए एक मजबूत आधार है। आने वाले वर्षों में ऐसे प्रयास भारत को ड्रोन तकनीक के क्षेत्र में वैश्विक मंच पर स्थापित कर सकते हैं।
