भारत में सर्दियों का मौसम हर साल दिसंबर से फरवरी तक अपना प्रभाव दिखाता है। इस दौरान न केवल पहाड़ी इलाके बल्कि मैदानी क्षेत्र भी ठंड के एहसास में डूब जाते हैं। हाल ही में दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में तापमान इतना गिरा है कि यह कई लोकप्रिय हिल स्टेशनों जैसे शिमला और देहरादून से भी कम आंका गया है। यह मौसम विज्ञानियों और आम लोगों दोनों के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है।

शिमला, हिमाचल प्रदेश की राजधानी, और देहरादून, उत्तराखंड का प्रमुख हिल स्टेशन, भारत के सर्दियों में ठंडे स्थलों के रूप में प्रसिद्ध हैं। आमतौर पर इन क्षेत्रों में न्यूनतम तापमान कम दर्ज होता है। लेकिन जनवरी 2026 के पहले हफ्तों में दिल्ली-एनसीआर जैसे मैदानी इलाक़ों ने रिकॉर्ड ठंड दर्ज की। 13 जनवरी को दिल्ली का न्यूनतम तापमान 3 डिग्री सेल्सियस था, जबकि हरियाणा के कुछ हिस्सों में यह 1.5 डिग्री और पंजाब में शून्य डिग्री तक गिर गया। गुड़गांव और नोएडा में तापमान शून्य डिग्री तक पहुंचा, जबकि शिमला में 6.6 डिग्री और देहरादून में 6.5 डिग्री दर्ज हुआ।
यह पहली बार नहीं है जब मैदानी इलाकों का तापमान पहाड़ी इलाक़ों की तुलना में कम दर्ज हुआ हो। मौसम विशेषज्ञ इसे एक सामान्य मौसमी घटना बताते हैं।
क्यों मैदानी क्षेत्र ठंड में पहाड़ी इलाक़ों से आगे
भारतीय मौसम विभाग के वैज्ञानिक नरेश कुमार ने बताया कि इस मौसम में शुष्क उत्तर-पश्चिमी हवाएं हिमालय से उत्तर-पूर्वी मैदानी इलाकों की ओर बढ़ती हैं। इन हवाओं की वजह से तापमान तेज़ी से गिरता है। इस बार वेस्टर्न डिस्टरबेंस सक्रिय था, जिसके कारण पहाड़ी इलाक़ों में बादल बने रहे और “हीट ट्रैप” की स्थिति बनी। इससे रात के समय वहां तापमान ज्यादा नीचे नहीं गिरा।
वहीं दिल्ली-एनसीआर और आसपास के मैदानी क्षेत्रों में आसमान पूरी तरह साफ़ था। साफ़ आसमान में दिन की गर्मी रात को तेज़ी से निकल जाती है और हवा के साथ तापमान तेजी से नीचे चला जाता है। इसे मौसम विज्ञान में रेडिएशनल कूलिंग कहते हैं। आसान शब्दों में कहें तो, रात के समय गर्मी टिक नहीं पाती और ठंड अधिक महसूस होती है।
इस तरह की स्थिति तब और भी गहरी होती है जब रात को ठंडी हवाएं चलती हैं। मैदानी इलाक़ों में हवा की गति और साफ़ आसमान मिलकर तापमान को और अधिक कम कर देते हैं। यही कारण है कि कई बार दिल्ली-एनसीआर जैसी जगहों की ठंड शिमला और देहरादून से भी ज्यादा महसूस होती है।
मौसम विभाग के आंकड़े और ऑरेंज अलर्ट
13 जनवरी 2026 को भारतीय मौसम विभाग ने गुड़गांव का न्यूनतम तापमान शून्य डिग्री दर्ज किया। इसी दौरान दिल्ली-एनसीआर में भी काफी ठंड रही। विभाग ने अगले दो-तीन दिनों के लिए शीतलहर और अत्यधिक ठंड की चेतावनी जारी की। विशेषकर हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, झारखंड और ओडिशा में शीतलहर की संभावना बनी रही।
मौसम वैज्ञानिक नरेश कुमार ने बताया कि पिछले दो दिनों से पंजाब, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में कड़ाके की ठंड पड़ रही है। इन इलाक़ों में सुबह का तापमान सामान्य से दो डिग्री या उससे भी कम दर्ज हुआ। 14 जनवरी की सुबह दिल्ली-एनसीआर में ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया था। तापमान चार डिग्री से नीचे रहने का अनुमान था।
वेस्टर्न डिस्टरबेंस और तापमान में बदलाव
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 48 घंटों के बाद एक वेस्टर्न डिस्टरबेंस आएगा। इसके प्रभाव से हवाओं की दिशा बदल जाएगी और तापमान में वृद्धि होगी। नतीजतन, 16 जनवरी तक मैदानी इलाक़ों में ठंड का स्तर सामान्य होने लगेगा।
वहीं पश्चिमी हिमालय के कुछ क्षेत्रों में 16 से 20 जनवरी के बीच बर्फबारी और बारिश का अनुमान है। मैदानी इलाक़ों जैसे पंजाब, हरियाणा, उत्तरी राजस्थान और उत्तर प्रदेश में भी 18 जनवरी के बाद बारिश की संभावना बनी रहेगी।
शीतलहर और ठंड के मापदंड
भारत के मौसम विभाग के अनुसार, शीतलहर का प्रभाव सबसे अधिक पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख़, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना में होता है।
जब मैदानी इलाक़ों में न्यूनतम तापमान 10 डिग्री सेल्सियस या उससे कम और पहाड़ी इलाक़ों में शून्य या उससे कम दर्ज किया जाता है, तब इसे शीतलहर कहा जाता है। अधिकतम तापमान 10 डिग्री से कम हो और सामान्य से 4.5–6.5 डिग्री कम हो तो इसे “कोल्ड डे” कहा जाता है। यदि अधिकतम तापमान सामान्य से 6.5 डिग्री से ज्यादा कम हो, तो इसे “सीवियर कोल्ड” या अत्यधिक ठंड कहा जाता है।
ठंड का असर और तैयारी
शीतलहर और अत्यधिक ठंड का प्रभाव सिर्फ़ तापमान पर ही नहीं बल्कि जीवनशैली और स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों को ठंड से बचाव के लिए गर्म कपड़े पहनने, पर्याप्त आहार लेने और रात को सुरक्षित स्थान पर रहने की सलाह दी जाती है।
इस ठंड के दौरान लोगों को सुबह जल्दी न निकलने, वाहन संचालन में सावधानी और बिजली उपकरणों के सही उपयोग पर ध्यान देने की आवश्यकता है। ठंड और कोल्ड वेदर के कारण कई बार सड़कें और सार्वजनिक यातायात प्रभावित हो सकते हैं।
