बारात की रात जिसे साहिल ने सामान्य दिन की तरह समझा, वह उसकी जिंदगी का अंतिम अध्याय साबित हो गया।
दिल्ली के शाहदरा के एक संकरे मोहल्ले में रहने वाले 14 वर्षीय साहिल अंसारी के घर आज भी दरवाजे की हलचल पर उसकी मां का दिल जोर से धड़क जाता है। निशा अंसारी हर रात नौ बजे के आसपास खुद को यह समझाने की कोशिश करती हैं कि उनका बेटा अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन मन का एक कोना आज भी यही मानता है कि साहिल दरवाजे पर खड़ा होकर हमेशा की तरह कहेगा, अम्मी, दरवाजा खोलो, मैं आ गया।

साहिल उनके लिए केवल बेटा नहीं था, बल्कि जीवन में उम्मीद की आखिरी कड़ी भी था। पांच साल पहले ही उन्होंने अपने बड़े बेटे को बीमारी के कारण खो दिया था। पिता की बीमारी के बाद घर की आर्थिक जिम्मेदारी भी यही बच्चा उठाने लगा था। लेकिन 29 नवंबर 2025 की रात जो हुआ, उसने इस परिवार को पूरी तरह भीतर तक तोड़ दिया।
उस रात शाहदरा के एक समुदायिक हॉल के बाहर शोर, रोशनी और बारात का उत्साह चारों तरफ था। पर उसी चकाचौंध के बीच एक गोली की आवाज ने उस खुशियों भरी रात को मातम में बदल दिया।
यह गोली सीआईएसएफ में हेड कॉन्स्टेबल पद पर कार्यरत मदन गोपाल तिवारी की लाइसेंसी पिस्तौल से चली, और उसने साहिल की जिंदगी को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। आरोप है कि नोट उठाने की वजह से उन्हें गुस्सा आया और उन्होंने सीधे बच्चे पर गोली चला दी।
परिवार का कहना है कि बारात में उड़ाए जाने वाले नोट असली भी नहीं थे, वे सिर्फ दिखावे के लिए थे। फिर भी एक बच्चे को इतने मामूली कारण पर गोली मार देना किस मानसिकता को दर्शाता है, यह सवाल हर इंसान का मन विचलित कर रहा है।
साहिल का परिवार और टूटी हुई उम्मीदें
शाहदरा के तंग गलियों में बने एक छोटे से कमरे में साहिल अपने परिवार के साथ रहता था। यह कमरा चार बाई चार फुट का है, जिसकी दीवारें नमी खाई हुई और छत जगह-जगह से टूटी हुई दिखती हैं। लेकिन इस कमरे में साहिल के सपनों का उजाला भरा था।
साहिल का पिता सिराजुद्दीन अंसारी छह महीने पहले लकवे से प्रभावित हुए, जिसके बाद उनकी काम करने की क्षमता काफी कम हो गई। घर का खर्च, दवाइयों का बोझ और बाकी जिम्मेदारियां साहिल ने अपने कंधों पर उठाई थीं। पास की किराने की दुकान में काम करने लगा ताकि घर की जरूरतें पूरी हो सकें।
उस रात भी वह काम खत्म कर घर लौट रहा था कि बारात से निकलते नोटों ने उसका ध्यान खींच लिया। जैसे सभी बच्चे बारात में खुशी से नोट उठाते हैं, वैसे ही वह भी सड़क पर पड़े नोट उठाने लगा। लेकिन किसी को क्या पता था कि एक बच्चा मजे-मजे में उठाए गए नकली नोटों की वजह से गोलियों का शिकार बन जाएगा।
मां की आँखों के सामने बसा वो भयानक दृश्य
निशा अंसारी को आज भी वह क्षण झकझोर देता है, जब पड़ोसियों ने उन्हें बताया कि उनके बेटे को गोली मार दी गई। वह दौड़ती हुई मौके पर पहुंचीं। वहां उनका बेटा खून से लथपथ सड़क पर पड़ा था। हाथ-पैर जमे हुए, चेहरा पीला, और आंखें खुली हुई मानो उनसे मदद की गुहार लगा रही हों।
मां कहती हैं, मैं उसे देखते ही बेहोश हो गई। इतने लोगों की भीड़ थी, पर किसी ने उसे अस्पताल तक नहीं पहुंचाया। वह उनका बच्चा था, लेकिन भीड़ के लिए सिर्फ एक घटना।
पोस्टमार्टम, कानूनी प्रक्रिया और पुलिस जांच
स्थानीय पुलिस के अनुसार आरोपी मदन गोपाल घटना के बाद मौके से भाग गया था। सीसीटीवी कैमरों और अन्य लोगों से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने उसे अगले ही दिन इटावा से गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में उसने माना कि उसने गोली चलायी सिर्फ इसलिए क्योंकि बच्चे नोट उठा रहे थे।
पुलिस ने बताया कि यह पिस्तौल लाइसेंसी .32 बोर थी।
आरोपी पक्ष का दावा और विरोधाभास
आरोपी के परिवार का कहना है कि गोली जानबूझकर नहीं चली थी और यह एक दुर्घटना थी। उनका कहना है कि मदन गोपाल शराब नहीं पीते और हमेशा शांत स्वभाव के हैं।
लेकिन दूसरी तरफ पुलिस का बयान, परिवार के आरोप और वीडियो फुटेज के हालात कुछ और ही कहानी कहते हैं।
सीआईएसएफ का नियम और संभव कार्रवाई
नियमों के अनुसार, किसी जवान के 48 घंटे से ज्यादा हिरासत में रहने पर उसे निलंबित कर दिया जाता है। हालांकि यह घटना निजी अवकाश के दौरान हुई, इसलिए संस्था ने आधिकारिक बयान देने से इनकार कर दिया है।
वह सवाल जो सबसे बड़ा है: एक बच्चे की जान इतनी सस्ती क्यों?
हर बारात में बच्चे नोट उठाते हैं। यह एक आम दृश्य है, किसी संस्कृति का हिस्सा, माहौल का हिस्सा। अगर किसी बड़े को यह पसंद नहीं आया, क्या इसकी सजा मौत हो सकती है?
साहिल की मां कहती हैं, मेरे बेटे ने कभी किसी चींटी को तक नहीं मारा। वह जीवन से भरा हुआ था, परिवार की जिम्मेदारी उठा रहा था। अब बता दीजिए, उसका कसूर क्या था?
परिवार की मांग: सिर्फ न्याय
परिवार का कहना है कि वे किसी से बदला नहीं चाहते, वे सिर्फ न्याय चाहते हैं। उनका मकसद यह है कि कोई और बच्चा ऐसी मौत का शिकार न बने। उनका दर्द किसी और मां को न झेलना पड़े।
यह घटना सिर्फ एक परिवार का शोक नहीं है, बल्कि समाज और सिस्टम से जुड़े उस सवाल का प्रमाण है, जिसे जवाब देना होगा। कानून के हाथ में बंदूक है, लेकिन क्या कानून के हाथ में संवेदनशीलता भी है?
यह कहानी सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि हमारे समाज के सड़ते हुए ढांचे का आइना है।
साहिल की मौत हमें मजबूर करती है यह सोचने पर कि छोटे-छोटे गुस्से, अहंकार और सत्ता का गलत इस्तेमाल किस हद तक खतरनाक हो सकता है।
यह खबर समाप्त नहीं होती, बल्कि उसके भीतर से कई नए सवाल जन्म ले रहे हैं।
