मध्यप्रदेश में चल रही मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) की प्रक्रिया को लेकर राज्यभर में चिंताएँ गहराती जा रही हैं। चुनावों से पहले मतदाता सूची की शुद्धता, पारदर्शिता और समयसीमा में तैयार होना लोकतंत्र की स्वस्थ प्रक्रिया के लिए आवश्यक माना जाता है, लेकिन प्रदेश के प्रमुख शहरों — भोपाल, इंदौर और ग्वालियर — में इस कार्य की रफ्तार बेहद धीमी पाई गई है। यही कारण है कि दिल्ली से चुनाव आयोग की केंद्रीय टीम ने बुधवार को प्रदेश के सभी कलेक्टरों के साथ हुई वर्चुअल बैठक में इस सुस्ती पर कड़ी नाराज़गी जताई।

वर्चुअल बैठक की अगुवाई कर रहीं चुनाव आयोग की डायरेक्टर शुभ्रा सक्सेना और सचिव विनोद कुमार ने स्पष्ट रूप से कहा कि विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण का डिजिटलाइजेशन और गणना पत्रक वितरण, दोनों ही अत्यंत संवेदनशील कार्य हैं, जिनके प्रति उदासीनता किसी भी हाल में स्वीकार नहीं की जाएगी। दिल्ली से आने वाली यह चेतावनी अपने आप में बेहद गंभीर मानी जा रही है, क्योंकि यह न केवल प्रशासनिक अनुशासन पर सवाल उठाती है, बल्कि यह चुनावी तैयारियों की गुणवत्ता पर भी सीधा असर डालती है।
बैठक की पृष्ठभूमि: क्यों बढ़ा दिल्ली का हस्तक्षेप?
विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण हर वर्ष किया जाता है। इस प्रक्रिया में—
- नई वोटर एंट्री
- मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना
- पते, उम्र और दस्तावेजों का सत्यापन
- बूथों की सूची का अद्यतन
- और गणना पत्रक का डिजिटलाइजेशन
शामिल होते हैं।
यह प्रक्रिया चुनाव आयोग की नज़र में इतनी महत्वपूर्ण इसलिए होती है, क्योंकि देशभर में होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनाव इसी सूची के आधार पर संचालित होते हैं।
मध्यप्रदेश में 2025–26 की तैयारियों के लिए किए जा रहे SIR की डिजिटल प्रगति में बड़े शहरों की धीमी रफ्तार सीधे दिल्ली के चुनाव आयोग की नजर में थी।
इस बार चुनाव आयोग ने तकनीकी रूप से अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए गणना पत्रकों को पूरी तरह डिजिटल स्वरूप में बदलने का दिशा-निर्देश दिया है। बड़ी आबादी वाले शहरों से उम्मीद रहती है कि वहाँ संसाधन अधिक हों और कार्यों की रफ्तार तेज़ हो। लेकिन हकीकत इसके उलट रही।
वर्चुअल बैठक का घटनाक्रम: तीन बड़े शहरों पर सीधी फटकार
जैसे ही बैठक प्रारंभ हुई और प्रदेश के जिलों की प्रगति रिपोर्ट प्रदर्शित की गई, तब दिल्ली में बैठे चुनाव आयोग के अधिकारी हैरान रह गए।
भोपाल, इंदौर और ग्वालियर — तीनों बड़े नगर निगम क्षेत्रों की डिजिटलाइजेशन स्थिति बेहद खराब निकली।
डायरेक्टर शुभ्रा सक्सेना ने जब तीनों जिलों के कलेक्टरों से अलग-अलग जानकारी मांगी, तो यह सामने आया कि:
- गणना पत्रक वितरण अधूरा
- डिजिटल स्कैनिंग बहुत धीमी
- कर्मचारियों की टीमों की तैनाती असंगठित
- और कई विधानसभा क्षेत्रों में कार्य लगभग रुका हुआ पड़ा है।
इस पर शुभ्रा सक्सेना ने नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा कि यह लापरवाही सीधी चुनावी प्रक्रिया की शुचिता पर असर डाल रही है, जो किसी भी तरह स्वीकार नहीं है। उन्होंने अगले वर्चुअल सेशन तक उल्लेखनीय सुधार सुनिश्चित करने का आदेश दिया और साफ शब्दों में कहा—
“यदि सुधार नहीं हुए, तो कार्रवाई तय है।”
राजधानी भोपाल की स्थिति: सबसे धीमी रफ्तार ने उठाए सवाल
प्रदेश की राजधानी होने के बावजूद भोपाल में SIR डिजिटलाइजेशन की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक मिली।
विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में प्रगति इस प्रकार थी—
- भोपाल उत्तर – 5.07%
- नरेला – 5.57%
- भोपाल दक्षिण-पश्चिम – 5.58%
- भोपाल मध्य – 4.38%
- गोविन्दपुरा – 5.69%
- हुजूर – 10.80%
- बैरसिया – 28.86%
बैरसिया ने भले ही बेहतर प्रदर्शन किया हो, लेकिन जिले का कुल औसत 10% से भी कम है। राजधानी जैसे अत्याधुनिक प्रशासनिक तंत्र वाले जिले के लिए यह स्थिति बेहद असामान्य और चिंताजनक कही गई।
इंदौर और ग्वालियर की स्थिति भी निराशाजनक
इंदौर, जो राज्य की आर्थिक राजधानी माना जाता है, वहाँ भी डिजिटलाइजेशन की प्रगति 10% से नीचे रही।
ग्वालियर में भी काम लगभग ठप दिखाई दिया।
इन दोनों जिलों के कलेक्टरों को भी दिल्ली से कड़ी चेतावनी मिली है कि स्थानीय प्रशासन चुनावी प्रक्रिया से जुड़े इस संवेदनशील कार्य को प्राथमिकता देकर तुरंत गति दे।
चुनाव आयोग का स्पष्ट आदेश: राजनीतिक दलों को साथ लेकर करें तेजी
मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने निर्देश देते हुए कहा कि कलेक्टर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की बैठक लेकर बताएं कि SIR के कार्य में किस स्तर पर और किस बूथ पर दिक्कतें हैं, ताकि सभी की भागीदारी से कार्य जल्दी पूरे हों।
चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि:
- फील्ड टीमें बढ़ाई जाएँ
- बूथ स्तर अधिकारी अधिक सक्रिय हों
- डिजिटल स्कैनिंग के लिए मशीनों और स्टाफ को बढ़ाया जाए
- साप्ताहिक रिपोर्ट सीधे राज्य और केंद्र तक भेजी जाए
इससे स्पष्ट है कि आयोग किसी भी लापरवाही को अब और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
सिस्टम पर असर: क्यों महत्वपूर्ण है डिजिटलाइजेशन?
डिजिटल SIR का महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि इसमें—
- नकली वोटरों की पहचान आसान होती है
- डुप्लीकेट नाम हटते हैं
- स्थानांतरण वाले मतदाता अपडेट होते हैं
- पते और दस्तावेज सुरक्षित रहते हैं
- चुनाव में दोहरी वोटिंग जैसी समस्याओं से बचाव होता है
दिल्ली का जोर इसी बात पर है कि जितनी जल्दी यह प्रक्रिया पूर्ण होगी, उतना ही चुनावी पारदर्शिता मजबूत होगी।
संभावित कार्रवाई: क्या हो सकता है आगे?
कलेक्टरों को मिली चेतावनी हल्की नहीं है। अगर अगली बैठक तक सुधार नहीं होता, तो:
- कार्य में लापरवाही पर नोटिस
- प्रशासनिक अनुशासनात्मक कार्रवाई
- राज्य स्तरीय समीक्षा समिति के द्वारा जांच
- फील्ड अधिकारियों का तत्काल स्थानांतरण
जैसी कठोर कार्रवाइयाँ संभव हैं।
निष्कर्ष: लोकतंत्र की नींव में पारदर्शी मतदाता सूची का महत्व
भले ही यह मामला प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़ा हो, लेकिन इसके प्रभाव गहरे हैं।
मतदाता सूची देश के लोकतंत्र की नींव है।
यदि इसमें त्रुटियाँ रह जाती हैं, तो चुनाव की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
दिल्ली से मिली चेतावनी केवल तीन जिलों के लिए नहीं, बल्कि पूरे मध्यप्रदेश के लिए एक संकेत है कि चुनाव आयोग बेहद गंभीर है और किसी भी तरह की शिथिलता अब स्वीकार्य नहीं होगी।
