अंडा दुनिया के सबसे अधिक खाए जाने वाले खाद्य पदार्थों में शामिल है। भारत ही नहीं, लगभग हर देश में अंडे को सस्ता, सुलभ और पोषण से भरपूर भोजन माना जाता है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, खिलाड़ी से लेकर आम नागरिक तक, सभी की थाली में अंडा किसी न किसी रूप में शामिल रहता है। प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स और आवश्यक अमीनो एसिड्स से भरपूर अंडा लंबे समय से “सुपरफूड” के रूप में जाना जाता है। लेकिन दिसंबर 2025 में सामने आई एक खबर ने इस भरोसे को झकझोर दिया है। दावा किया गया कि कुछ अंडों में नाइट्रोफुरंटोइन या नाइट्रोफ्यूरान्स नामक प्रतिबंधित एंटीबायोटिक के अवशेष पाए जा सकते हैं, जो लंबे समय तक सेवन करने पर गंभीर बीमारियों, यहां तक कि कैंसर का खतरा बढ़ा सकते हैं।

इस खबर के सामने आते ही देशभर में चिंता की लहर दौड़ गई। सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई, उपभोक्ताओं के मन में सवाल उठने लगे और नियामक संस्थाओं पर दबाव बढ़ गया कि वे इस मामले में स्पष्ट और ठोस कदम उठाएं। भारत में खाद्य सुरक्षा और मानकों की निगरानी करने वाली शीर्ष संस्था ने तुरंत सक्रियता दिखाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश जारी किए कि वे बाजार में उपलब्ध ब्रांडेड और बिना ब्रांड वाले दोनों तरह के अंडों के नमूने इकट्ठा करें। इन नमूनों को देश की विभिन्न मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में भेजकर जांच कराई जाएगी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अंडों में किसी भी प्रकार का प्रतिबंधित एंटीबायोटिक मौजूद है या नहीं।
यह मामला केवल एक खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की पूरी पोल्ट्री इंडस्ट्री, खाद्य सुरक्षा प्रणाली और उपभोक्ता जागरूकता से जुड़ा हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में अंडे की खपत तेजी से बढ़ी है। शहरी इलाकों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी अंडा अब रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा बन चुका है। स्कूलों की मध्याह्न भोजन योजनाओं से लेकर जिम डाइट तक, हर जगह अंडे का इस्तेमाल हो रहा है। ऐसे में अगर अंडों की गुणवत्ता पर सवाल उठता है, तो उसका असर लाखों लोगों की सेहत पर पड़ सकता है।
विवाद की शुरुआत एक ऑनलाइन रिपोर्ट से हुई, जिसमें एक प्रसिद्ध अंडा ब्रांड के उत्पादों की गुणवत्ता पर सवाल उठाए गए थे। रिपोर्ट में आशंका जताई गई थी कि अंडों में नाइट्रोफुरंटोइन जैसे प्रतिबंधित एंटीबायोटिक के अंश हो सकते हैं। यह रिपोर्ट सामने आते ही सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई। कुछ लोगों ने इसे गंभीर स्वास्थ्य खतरा बताया, तो कुछ ने इसे अफवाह कहकर खारिज करने की कोशिश की। लेकिन जब चर्चा का दायरा बढ़ता गया, तो यह मुद्दा आम उपभोक्ताओं से निकलकर नियामक एजेंसियों तक पहुंच गया।
नाइट्रोफुरंटोइन या नाइट्रोफ्यूरान्स एंटीबायोटिक्स का एक ऐसा समूह है, जिस पर दुनिया के कई देशों में खाने योग्य जानवरों में इस्तेमाल करने पर सख्त प्रतिबंध है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन दवाओं का उपयोग कभी-कभी पशुओं और पोल्ट्री में संक्रमण रोकने या तेजी से विकास के लिए किया जाता रहा है, लेकिन इसके दुष्परिणाम बेहद खतरनाक हो सकते हैं। अगर इन एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल गैरकानूनी तरीके से किया जाता है, तो उनके अवशेष मांस, दूध या अंडों के जरिए मानव शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि नाइट्रोफुरंटोइन के अवशेष पकाने के बाद भी पूरी तरह नष्ट नहीं होते। इसका मतलब यह है कि चाहे अंडा उबला हो, तला हो या किसी अन्य रूप में पकाया गया हो, अगर उसमें इस दवा के अंश मौजूद हैं, तो वे शरीर में पहुंच सकते हैं। लंबे समय तक ऐसे अंडों का सेवन करने से शरीर पर गंभीर असर पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि नाइट्रोफ्यूरान्स के लंबे संपर्क से जेनेटिक डैमेज, लिवर और किडनी पर असर और कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
इसी गंभीरता को देखते हुए भारतीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण ने देशव्यापी सैंपलिंग का फैसला लिया है। निर्देशों के अनुसार, बाजार में उपलब्ध हर तरह के अंडों के नमूने लिए जाएंगे, चाहे वे किसी बड़े ब्रांड के हों या स्थानीय स्तर पर बेचे जा रहे हों। इन नमूनों को लगभग दस अलग-अलग प्रयोगशालाओं में भेजा जाएगा, ताकि जांच के नतीजे निष्पक्ष और सटीक हों। इस प्रक्रिया का उद्देश्य किसी एक कंपनी या ब्रांड को निशाना बनाना नहीं, बल्कि पूरे बाजार की स्थिति को समझना है।
इस बीच जिस ब्रांड का नाम विवाद की शुरुआत में सामने आया था, उसने अपनी सफाई भी पेश की है। कंपनी का कहना है कि उसके अंडे पूरी तरह सुरक्षित हैं और सभी मानकों का पालन करते हैं। कंपनी ने यह भी दावा किया कि उसने अपने उत्पादों की लैब रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई है, जिसमें किसी भी प्रकार के प्रतिबंधित एंटीबायोटिक, कीटनाशक या दवाओं के अवशेष नहीं पाए गए। कंपनी के अनुसार, वह पारदर्शिता में विश्वास रखती है और उपभोक्ताओं की सेहत से कोई समझौता नहीं करती।
हालांकि, मेडिकल और फूड सेफ्टी एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह मामला किसी एक ब्रांड तक सीमित नहीं देखा जाना चाहिए। पोल्ट्री उद्योग में एंटीबायोटिक्स के दुरुपयोग की समस्या लंबे समय से चली आ रही है। कई बार बीमारियों से बचाव या उत्पादन बढ़ाने के लिए नियमों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसे में सख्त निगरानी और नियमित जांच बेहद जरूरी हो जाती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, नाइट्रोफुरंटोइन जैसे तत्वों के साइड इफेक्ट्स तुरंत भी दिखाई दे सकते हैं और लंबे समय में भी। कुछ लोगों में इससे मतली, उल्टी, दस्त, भूख न लगना, सिरदर्द और चक्कर आने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। गंभीर मामलों में सांस लेने में दिक्कत, लगातार खांसी, बुखार, त्वचा या आंखों का पीला पड़ना और अत्यधिक कमजोरी जैसे लक्षण भी सामने आ सकते हैं। लंबे समय तक संपर्क में रहने से शरीर के अंदरूनी अंगों पर असर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर उपभोक्ताओं को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे जो खा रहे हैं, उसकी गुणवत्ता और सुरक्षा कितनी सुनिश्चित है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि घबराने की बजाय सतर्क रहना जरूरी है। अंडा एक महत्वपूर्ण पोषक आहार है और केवल आशंका के आधार पर इसे पूरी तरह छोड़ देना सही कदम नहीं होगा। लेकिन यह जरूरी है कि लोग विश्वसनीय स्रोतों से ही अंडे खरीदें, सही तरीके से स्टोर करें और अच्छी तरह पकाकर ही सेवन करें।
सरकारी एजेंसियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही स्थिति साफ होगी। अगर किसी भी स्तर पर नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो संबंधित पक्षों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इस प्रक्रिया का मकसद उपभोक्ताओं में डर फैलाना नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाना है।
यह विवाद एक बड़े सवाल की ओर भी इशारा करता है। क्या हम अपने खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर पर्याप्त सजग हैं। क्या केवल सस्ता और आसानी से उपलब्ध होना ही किसी भोजन को चुनने का मापदंड होना चाहिए। इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि पोषण के साथ-साथ सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अंडों को लेकर उठे इस सवाल ने नीति निर्माताओं, उद्योग और उपभोक्ताओं तीनों के लिए एक चेतावनी का काम किया है। अगर समय रहते सख्त कदम उठाए गए और पारदर्शिता बनाए रखी गई, तो न केवल उपभोक्ताओं का भरोसा कायम रहेगा, बल्कि भारतीय खाद्य प्रणाली भी अधिक मजबूत और सुरक्षित बन सकेगी।
