मध्यप्रदेश का आर्थिक व व्यापारिक केंद्र माना जाने वाला इंदौर अक्सर अपनी स्वच्छता, आधुनिकता और विकास योजनाओं के कारण सुर्खियों में रहता है। लेकिन इसी शहर के बीचोंबीच एक ऐसा मामला सामने आया जिसने प्रशासन और वित्तीय संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। कनाड़िया थाना क्षेत्र में दर्ज हुए इस प्रकरण ने दिखा दिया कि कुछ लोग कानून और व्यवस्था को ठेंगा दिखाकर किस तरह संगठित तरीके से ठगी का जाल बुन लेते हैं और सरकारी लाइसेंस से लेकर बैंक लोन तक हासिल कर लेते हैं, वह भी नकली दस्तावेज़ों के आधार पर।

यह मामला उस समय उजागर हुआ जब लिंबोदी निवासी हर्ष कुमार वर्मा ने पुलिस के पास लिखित शिकायत दर्ज करवाई। वह श्याम ऑटोमोटिव नाम से कंपनी संचालित करते हैं और व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। लेकिन उन्हें तब गहरा झटका लगा जब पता चला कि उनके नाम और उनकी कंपनी के दस्तावेज़ों का गलत इस्तेमाल करके किसी ने फर्जी तरीके से नगर निगम से लाइसेंस प्राप्त किया है और फिर विभिन्न बैंकों से मोटे लोन लेकर रकम को गायब कर दिया गया है।
शुरुआत कैसे हुई: पीड़ित को तब पता चला जब दस्तावेज़ों में हेरफेर दिखा
हर्ष कुमार वर्मा ने अपने बयान में कहा कि वे अपनी नियमित व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर व्यस्त थे, तभी उन्हें कुछ बैंक प्रतिनिधियों से कॉल आने लगे, जिनमें उनसे लोन प्रक्रिया से संबंधित जानकारी पूछी गई। हर्ष कुमार हैरान थे क्योंकि उन्होंने किसी भी प्रकार का लोन आवेदन नहीं किया था। जब उन्होंने कारण पूछा, तो एक बैंक अधिकारी ने बताया कि उनके नाम से संचालित श्याम ऑटोमोटिव के दस्तावेज़ बैंक में जमा किए गए हैं और खाते से लोन की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
इस सूचना ने पीड़ित को हिला दिया और उन्होंने तुरंत नगर निगम, बैंक और संबंधित विभागों से दस्तावेज़ मांगकर जांच की। शुरूआती जांच में ही स्पष्ट हो गया कि श्याम ऑटोमोटिव के कोटेशन में बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ की गई है। दस्तावेजों में संशोधन किए गए हैं और उन संशोधित फाइलों को आधार बनाकर एक नई कंपनी के नाम पर नगर निगम से वैधता दिखाते हुए लाइसेंस हासिल कर लिया गया है।
फर्जी लाइसेंस की कहानी: असली दस्तावेजों की नकल कर तैयार किए नकली पेपर
जांच में सामने आया कि आरोपितों ने श्याम ऑटोमोटिव की मूल दस्तावेज़ फाइल को स्कैन कर उसके अंदर विवरण बदला, हस्ताक्षर की नक़ल की और कंपनी के नाम में बारिक बदलाव कर नया कोटेशन तैयार कर दिया। इसके बाद इन फर्जी दस्तावेज़ों को नगर निगम कार्यालय में जमा किया गया। नगर निगम ने अपनी स्तर पर सामान्य सत्यापन किया लेकिन दस्तावेज़ इतने अच्छे तरीके से तैयार किए गए थे कि पहली नज़र में उन्हें असली समझ लिया गया।
इसी के आधार पर आरोपी यह दावा करने में सफल रहे कि उनकी कंपनी कानूनी रूप से नगर निगम द्वारा मान्य है। यह मान्यता ही आगे उनके लिए ढाल बन गई और बैंकों में खाता खुलवाने व लोन प्रक्रिया शुरू करवाने का रास्ता तैयार हुआ।
बैंक खाते की जालसाजी: महालक्ष्मी नगर स्थित बैंक में खुला फर्जी खाता
जांच में यह भी पता चला कि आरोपितों ने महालक्ष्मी नगर की एक बैंक शाखा में श्याम ऑटोमोटिव के नाम पर फर्जी खाता खुलवाया था। बैंक को दी गई सभी जानकारी नकली थी, लेकिन लाइसेंस और कंपनी दस्तावेज असली जैसे दिखने के कारण बैंक अधिकारियों को कोई शक नहीं हुआ। बैंक की KYC प्रक्रिया भी फर्जी दस्तावेज़ों के आधार पर पूरी कर ली गई।
खाता खुलने के बाद आरोपियों ने विभिन्न बैंकों में लोन आवेदन भरना शुरू कर दिया। इनमें कुछ निजी बैंक थे, कुछ सहकारी बैंक और कुछ ऑनलाइन वित्तीय प्लेटफॉर्म भी शामिल थे। विभिन्न बैंकों से छोटे-बड़े लोन स्वीकृत होकर खाते में आ गए और आरोपियों ने तुरंत इन पैसों को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर दिया।
आरोपी कौन हैं: तीन लोगों पर केस दर्ज
पुलिस जांच में तीन नाम सामने आए
कमल पुत्र राममिलन लोधी निवासी टीकमगढ़
रविकांत पुत्र भागीरथ प्रसाद तिवारी निवासी टीकमगढ़
राहुल पुत्र नंदलाल चड़ार निवासी ड्रीमवैली
पुलिस ने इन तीनों के खिलाफ प्रकरण दर्ज कर लिया है और मामले की विस्तृत जांच जारी है।
जांच में हरिगीत प्रवाह: घटनाक्रम के तार धीरे-धीरे खुलते गए
पूरे प्रकरण की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, हर स्तर पर नई परतें खुलती चली गईं। यह मामला कोई साधारण दस्तावेज़ जालसाजी नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी जिसमें फर्जी लाइसेंस से लेकर बैंक लोन तक सभी कदम योजनाबद्ध तरीके से उठाए गए थे। पुलिस टीम ने जब बैंक के CCTV फुटेज की जांच की तो पाया कि दस्तावेज़ जमा करने और खाता खुलवाने की प्रक्रिया में एक ही व्यक्ति बार-बार दिखाई दे रहा है। इससे सिद्ध हुआ कि आरोपियों ने फर्जी पहचान बनाकर कई जगह खुद को अलग-अलग रूप में प्रस्तुत किया।
आर्थिक अपराध शाखा की भूमिका
मामला गंभीर होते देख आर्थिक अपराध शाखा को भी शामिल किया गया। उनकी प्राथमिक जांच से पता चला कि आरोपियों ने सिर्फ एक कंपनी ही नहीं, बल्कि कुछ अन्य फर्जी कंपनियां भी बनाई थीं जो अभी तक सामने नहीं आई थीं। कई दस्तावेज़ों पर समान हस्ताक्षर पैटर्न दिखाई दिए।
पुलिस अब क्या कर रही है
पुलिस अब आरोपियों की गिरफ्तारी के प्रयास में जुटी है। उनके मोबाइल नंबर, बैंक विवरण, यात्रा इतिहास और सीसीटीवी फुटेज की छानबीन की जा रही है। साथ ही यह भी जांच हो रही है कि कहीं बैंक के किसी कर्मचारी की मिलीभगत तो नहीं थी।
