भारत की न्यायिक व्यवस्था एक बार फिर ऐसे संवेदनशील मुद्दे की ओर ध्यान खींच रही है, जिसके बारे में वर्षों से बहस होती रही है। यह मुद्दा है लड़कियों के खतने का, जिसे कई समुदायों में पारंपरिक मान्यता के रूप में देखा जाता है। किंतु आधुनिक कानून, बाल संरक्षण नियमों और मानवाधिकारों के परिप्रेक्ष्य में यह प्रथा गंभीर प्रश्नों के घेरे में खड़ी है। हाल ही में दायर एक याचिका पर सुनवाई करने के लिए तैयार होते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और पूछा कि क्या यह प्रथा POCSO अधिनियम का सीधा उल्लंघन नहीं है।

यह विषय न केवल धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा है बल्कि उन अधिकारों और भावनाओं से भी संबंधित है जो किसी भी बालिका के शरीर, मन और भविष्य को प्रभावित करते हैं। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी करना यह संकेत है कि न्यायपालिका अब इस विषय को केवल एक सांस्कृतिक प्रथा के रूप में नहीं, बल्कि एक कानूनी और संवैधानिक बहस के रूप में देख रही है।
याचिका का आधार और समाज की प्रतिक्रिया
एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हुए मांग की कि देश में लड़कियों के खतने की प्रथा को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए। याचिका में यह भी कहा गया कि इस प्रथा में नाबालिग लड़कियों के साथ शारीरिक हस्तक्षेप होता है, जो उनके शरीर की स्वायत्तता का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह प्रथा बच्चों पर अनावश्यक शारीरिक और मानसिक कष्ट डालती है और इसलिए इसे अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
समाज के विभिन्न वर्गों में इस याचिका के बाद व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। एक ओर वे लोग हैं जो खतने को सदियों पुरानी पारंपरिक प्रक्रिया बताते हैं, जबकि दूसरी ओर मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं जो इसे स्पष्ट रूप से बाल अधिकारों का उल्लंघन मानते हैं। इन दोनों धाराओं के बीच न्यायपालिका का यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का संज्ञान और केंद्र को जारी नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करने की सहमति व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या खतना POCSO अधिनियम के तहत एक दंडनीय अपराध माना जाना चाहिए। POCSO अधिनियम बच्चों के यौन उत्पीड़न, शारीरिक नुकसान और मानसिक शोषण से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है। ऐसे में यह प्रश्न कि खतना इस अधिनियम की परिधि में आता है या नहीं, अत्यंत महत्वपूर्ण है।
केंद्र सरकार को नोटिस जारी होना यह बताता है कि अब यह विषय एक राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन चुका है। सरकार से उम्मीद की जा रही है कि वह इस मुद्दे पर स्पष्ट रूप से अपना पक्ष रखेगी और जानकारी देगी कि यह प्रथा किन कानूनी और सामाजिक नियमों के तहत देखी जानी चाहिए।
खतना क्या है और विवाद क्यों है?
खतना आमतौर पर नाबालिग लड़कियों पर की जाने वाली एक प्रक्रिया है जिसमें उनके जननांगों के किसी हिस्से को काटा या नुकसान पहुँचाया जाता है। समर्थकों का कहना है कि यह धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है, लेकिन विरोध करने वालों का कहना है कि यह प्रक्रिया न केवल शारीरिक रूप से हानिकारक है बल्कि लड़की के मानसिक स्वास्थ्य पर भी दीर्घकालिक प्रभाव डालती है।
कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने महिला खतना को महिला जननांग विकृति की श्रेणी में रखा है और इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन माना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इस प्रथा को हानिकारक और अवांछित बताता है।
भारत में खतने की कानूनी स्थिति
भारत में खतने के विषय पर कानून स्पष्ट नहीं है। हालांकि POCSO और IPC की कई धाराएं ऐसे मामलों में लागू हो सकती हैं, लेकिन अब तक कोई विशेष कानून नहीं है जो महिला खतना को सीधे तौर पर अपराध घोषित करता हो। यही कारण है कि याचिका में मांग की गई है कि इसे स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया जाए।
न्यायपालिका की भूमिका और सामाजिक संदेश
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मुद्दे पर सुनवाई के लिए तैयार होना समाज को एक मजबूत संदेश देता है। यह बताता है कि न्यायपालिका उन मुद्दों को भी समझती है जो लंबे समय से नजरअंदाज किए गए हैं। यह संकेत भी मिलता है कि आधुनिक कानून और संवैधानिक अधिकार अब पारंपरिक प्रथाओं के ऊपर प्राथमिकता पा रहे हैं।
क्या केंद्र सरकार का रुख बदलेगा?
सुप्रीम कोर्ट की तरफ से नोटिस जारी होने के बाद अब सभी की निगाहें केंद्र सरकार पर टिकी हैं। सरकार के उत्तर से यह तय हो सकता है कि देश में खतने को एक सांस्कृतिक अधिकार माना जाएगा या इसे बाल संरक्षण कानूनों के अंतर्गत प्रतिबंधित किया जाएगा।
आगे की राह
यह मामला केवल एक कानूनी याचिका भर नहीं है। यह देश के भविष्य, बालिकाओं की सुरक्षा, मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे कई मुद्दों को छूता है। सुप्रीम कोर्ट के इस कदम ने यह सुनिश्चित किया है कि आने वाले समय में इस प्रथा पर व्यापक बहस होगी और संभव है कि भारत भी उन देशों की सूची में शामिल हो जाए जिन्होंने महिला खतना पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है।
यह बहस समाज, सरकार और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाते हुए आगे बढ़ेगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि लड़कियों की सुरक्षा और अधिकार सर्वोपरि हैं और कोई भी प्रथा जो उनके शरीर या मन को नुकसान पहुंचाती है उस पर पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है।
