मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल हमेशा से फिल्म संस्कृति, मनोरंजन और भीड़भाड़ वाले सिनेमाघरों के लिए चर्चा में रहती है। मंगलवार की रात भी कुछ ऐसा ही हुआ, जब शहर के एक लोकप्रिय सिनेप्लेक्स में धुरंधर फिल्म का शो चल रहा था। फिल्म के रिलीज़ के बाद से ही दर्शकों में उत्सुकता थी क्योंकि फिल्म की कहानी परिवार, समाज, रिश्ते और युवा संघर्ष जैसी भावनात्मक परतों से होकर गुजरती है। लेकिन जिस रात यह फिल्म बड़े पर्दे पर चल रही थी, उसी रात दर्शकों के बीच ऐसा विवाद हुआ कि पूरा सिनेमा हॉल तनाव और हंगामे में बदल गया।

होशंगाबाद रोड पर स्थित बहुचर्चित सिनेमा कॉम्प्लेक्स में चल रहे इस शो में दर्शकों की संख्या खासी थी। हॉल लगभग पूरा भरा हुआ था। फिल्म धीरे-धीरे अपनी भावनात्मक दिशा में बढ़ रही थी। दर्शक कहानी में खो चुके थे। वातावरण शांत था, स्क्रीन पर चरित्र अपनी गहरी जीवन स्थितियों से गुजर रहा था। तभी अचानक एक भावुक दृश्य आया, जिससे कुछ दर्शक भावनात्मक रूप से जुड़े तो वहीं कुछ युवक उटपटांग हरकतों में जुट गए।
फिल्म में एक ऐसा दृश्य आया, जिसमें परिवार टूटने की स्थिति दिखाई गई। जहां कहानी धीमे और गहरे शब्दों में आगे बढ़ रही थी, वहीं उसी क्षण कुछ युवक लगातार सीटें थपथपाते हुए शोर करने लगे। उनमें से कुछ सीटी बजा रहे थे और हूटिंग भी कर रहे थे। उनके पास ही बैठे दर्शक इसे सहन नहीं कर पाए, क्योंकि उनके परिवारों में महिलाएँ और बच्चे भी मौजूद थे।
यही वह क्षण था जिसने पूरी घटना को हवा दी।
भावनात्मक दृश्य के दौरान उठा माहौल और असंतोष की शुरुआत
धुरंधर फिल्म की पटकथा दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने वाली बनाई गई है। उस समय स्क्रीन पर एक महत्वपूर्ण दृश्य आया था — पिता-पुत्र के संबंध, त्याग, सामाजिक दबाव और परिवार की तकरार जैसी स्थिति दिखाई गई। पूरे हॉल में भावनात्मक तनाव महसूस हो रहा था, लेकिन उसी समय कुछ युवक सीटियाँ बजाने लगे। ऐसा लगता था जैसे उन्हें किसी प्रकार का मज़ाक सूझ गया हो, लेकिन हॉल के दूसरे हिस्से में बैठे कुछ लोग इसे अपमानजनक मान बैठे।
दर्शकों का एक समूह चुपचाप फिल्म देखना चाहता था। वे परिवार और बच्चों के साथ आए थे, इसलिए उन्हें यह व्यवहार बिल्कुल पसंद नहीं आया। उस समूह ने युवकों को समझाने की कोशिश की—शायद हल्के शब्दों में, शायद धीरे-धीरे—लेकिन समस्या यहीं से शुरू हुई।
सीट संख्या A-22, A-23, B-10 और B-11 के आस-पास बैठे युवकों ने कहा-सुनी शुरू कर दी। एक ने कुछ कहा, दूसरे ने उसी पर टिप्पणी कर दी। आवाज़ें तेज़ होती गईं और देखते-देखते वातावरण गर्म हो गया।
जब दर्शक सीट छोड़कर आमने-सामने आ गए
सिनेमा की रौशनी मंद थी, लेकिन मोबाइल फोन की फ्लैशलाइट और स्क्रीन की चमक ने सबका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था। दर्शक उठ-उठकर एक-दूसरे की तरफ गर्जने लगे। एक युवक लगभग कुर्सी के हैंडल को पकड़कर सामने वाले व्यक्ति की ओर बढ़ा। दूसरे ने उसकी शर्ट का कॉलर पकड़ लिया। हंगामा यहीं शुरू हो गया, और हॉल में बैठी महिलाओं तक की चीखें सुनाई देने लगीं।
“फिल्म देखने आए हैं या दंगा करने?”
“परिवार है पीछे!”
“तुम लोग शांत रहो!”
ऐसी आवाज़ें चारों तरफ सुनाई देने लगीं।
मंच की स्थिति कुछ ऐसी हो गई कि दर्शक फिल्म छोड़कर झगड़े की ओर देखने लगे। कुछ न तो समझ पा रहे थे, न ही बीच-बचाव में शामिल होना चाहते थे। लेकिन कुछ लोग ज़िम्मेदारी से आगे आए।
युवकों का एक समूह खुद को सही बता रहा था, और दूसरा कह रहा था कि फिल्म का मज़ाक उड़ाना गलत है। दोनों पक्षों में उत्तेजना बढ़ती गई।
हॉल में सुरक्षा कर्मी उस समय अन्य स्क्रीन पर तैनात थे। इसलिए शुरुआती कुछ मिनटों तक मामला दर्शकों के भरोसे ही रहा।
कर्मचारियों की एंट्री और स्थिति का शांत होना
घटना के बढ़ते रूप को देखते हुए तीन कर्मचारी तुरंत पहुंचे। उन्होंने दोनों पक्षों को अलग-अलग बैठाया। फिर कर्मचारियों ने शांत होकर समझाया कि फिल्म समय से चल रही है, कोई भी हिंसा कैंसिलेशन, रोक या आगे की पुलिस कार्रवाई का कारण बन सकती है। कर्मचारियों ने कुछ समय के लिए शो को रोका नहीं, लेकिन हॉल में रोशनी हल्की बढ़ा दी गई।
समय थोड़ा बीता। युवक भी शांत हो गए। लेकिन जाते-जाते दोनों समूहों के बीच एक-दूसरे को बाहर मिलने और देख लेने जैसी धमकियाँ भी मिलीं। हालांकि किसी ने बाहर निकलने तक उस विवाद को आगे नहीं बढ़ाया।
हॉल की सामान्य स्थिति कुछ देर बाद बहाल हुई।
दर्शक वापस अपनी कुर्सी पर बैठे, स्क्रीन सामान्य अंदाज़ में चलती रही। कहानी अपनी भावनात्मक पलक पर फिर लौट आई। शायद कई लोगों के मन में यह घटना चुभी, लेकिन फिल्म देखने का अनुभव कोई खोना नहीं चाहता था।
क्यों भड़का विवाद? असल कारण भीतर की चुभन
सिनेमा हमेशा से सिर्फ मनोरंजन नहीं रहा; वह लोगों को सामाजिक संवेदनाओं से जोड़ता है। धुरंधर में ऐसे कई पल थे जो दर्शकों के जीवन से मेल खाते हैं। कुछ लोग फिल्म के भीतर अपना अतीत देख रहे थे, कुछ वर्तमान, कुछ भविष्य की आशंकाएँ।
जब कोई गंभीर दृश्य चल रहा होता है और औचित्यहीन शोर उठता है, तो स्वाभाविक है कि संवेदनशील लोग चिढ़ जाएंगे।
इस रात भी ऐसा ही हुआ।
भावनात्मक ढंग से फिल्म में डूबे लोगों को महसूस हुआ कि दूसरे उनकी भावनाओं का अपमान कर रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर शोर करने वाले युवकों को लगा कि मनोरंजन में अभिव्यक्ति का अधिकार है।
यही सोच-संघर्ष एक झड़प में बदल गया।
कानूनी शिकायत क्यों दर्ज नहीं हुई?
महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस पूरी घटना में किसी को चोट नहीं आई। न कोई वस्तु टूटी, न सीटें खिसकीं। ऐसा अधिकतर तभी होता है, जब झगड़ा गंभीर रूप से हिंसक न हो। दोनों पक्षों ने बाहर आने के बाद विवाद को आगे नहीं बढ़ाया। हॉल प्रबंधन ने मामले को पूरी तरह बंद मान लिया।
यह भी समझदारी रही कि किसी परिवार ने इस विवाद को मुद्दा नहीं बनाया।
धुरंधर फिल्म क्यों संवेदनशील हो गई?
धुरंधर फिल्म लंबे समय से चर्चा में रही। इसका संगीत, कहानी और फिल्माइजेशन ऐसा है, जो दर्शकों का ध्यान गंभीरता से खींचता है। इसकी पटकथा कई जगहों पर जीवन की सच्चाइयों को छूती है। इसमें मानवीय संबंधों की टूटन और जोड़ का संतुलन दिखाया गया है।
ऐसे दृश्यों में अनुचित प्रतिक्रिया लोगों का गुस्सा उभार देना स्वाभाविक था।
फिल्म देखने का अनुभव और सीख
यह घटना सिर्फ सिनेमाघर में हुई मारपीट भर नहीं थी। यह संकेत है कि सामूहिक जगहों पर मनोरंजन भी अनुशासन चाहता है। जब कोई व्यक्ति अकेला फिल्म देखता है, तो उसके अनुभव का मालिक वह खुद होता है। लेकिन हॉल में वह अनुभव साझा हो जाता है।
हमें यह समझना चाहिए—
सिनेमा सिर्फ देखने की दीवार नहीं है,
सिनेमा एक संस्कृति है।
उसी संस्कृति में जब असंगति प्रवेश करती है,
तो विवाद उभर आता है।
