गाजा पट्टी आज इक्कीसवीं सदी का सबसे विचलित करने वाला मानवीय संकट झेल रही है। दो साल से अधिक समय से चल रहे संघर्ष ने इस छोटे से क्षेत्र को अस्तित्व की जंग में धकेल दिया है। ताजा आंकड़ों ने भयावह तस्वीर और भी साफ कर दी है। जो आँकड़े कभी असंभव लगते थे, वे अब बीते हुए आँकड़ों की तरह पढ़े जा रहे हैं। गाजा के स्वास्थ्य मंत्रालय ने पुष्टि की है कि अक्टूबर 2023 से शुरू हुए संघर्ष में अब तक फिलिस्तीनी नागरिकों की मौत का आंकड़ा सत्तर हजार से अधिक हो चुका है। यह संख्या केवल एक आंकड़ा नहीं बल्कि लाखों टूटे परिवारों की चीखों, खंडहरों में दबी उम्मीदों और खत्म होते भविष्य का प्रतिबिंब है।

10 अक्टूबर को जब नए युद्धविराम समझौते की घोषणा हुई थी, दुनिया भर में मानवता ने यह उम्मीद की थी कि शायद अब इस युद्धग्रस्त इलाके को सांस लेने का मौका मिलेगा। अमेरिका की मध्यस्थता में बनाए गए इस नए सीजफायर से यह उम्मीद थी कि कम से कम अस्थायी तौर पर गोलियों की आवाजें थमेंगी और बम धमाकों की गूंज कम होगी। लेकिन वास्तविकता ठीक इसके उलट सामने आई। युद्धविराम लागू होने के बाद भी मौतों का सिलसिला नहीं रुक सका और विडम्बना यह कि सीजफायर के बाद भी 350 से ज्यादा फिलिस्तीनी नागरिकों की जानें जा चुकी हैं। जो युद्धविराम उम्मीदों के दीप जलाने आया था, वही नए सवाल खड़ा कर गया।
युद्धविराम के बाद भी क्यों जारी है संघर्ष
युद्धविराम का अर्थ आमतौर पर शांति, राहत और बातचीत का रास्ता माना जाता है। लेकिन गाजा की धरती पर हालात इतने उलझे और संवेदनशील हैं कि किसी भी समझौते का पालन पूरी तरह होता नहीं दिख रहा। इजरायल और हमास दोनों एक-दूसरे पर लगातार आरोप लगा रहे हैं कि युद्धविराम की शर्तों का पालन नहीं किया गया। इजरायल दावा करता है कि हमास ने सीजफायर के बाद भी कई तरह की गतिविधियाँ जारी रखीं, जिन पर प्रतिक्रिया देना उनकी मजबूरी थी। वहीं गाजा का स्वास्थ्य मंत्रालय और स्थानीय प्रशासन यह कहता रहा है कि हमले बिना किसी सैन्य लक्ष्य के भी रहासत ढाए जा रहे हैं।
गाजा में कई इलाकों में अभी भी मलबे हटाने का काम चल रहा है। इसमें से कई ऐसी जगहें हैं जहां बमबारी युद्ध के शुरुआती चरणों में हुई थी और अब काफी समय बाद भी मलबे के नीचे से शव निकल रहे हैं। मौतों की संख्या बढ़ने का यह भी एक बड़ा कारण है।
बच्चों की मौत और दुनिया का मौन
सीजफायर के बाद जिन 354 लोगों की मौत हुई, उनमें कई बच्चे शामिल हैं। नवीनतम घटना ने तो पूरी दुनिया को झकझोर दिया। दक्षिणी गाजा के नासिर अस्पताल ने पुष्टि की कि इजरायली फायरिंग में दो छोटे भाई मारे गए। दोनों की उम्र आठ और ग्यारह साल बताई गई है। अस्पताल कर्मियों ने बताया कि वे विस्थापित लोगों को आश्रय दे रहे एक स्कूल के पास खड़े थे, जब कथित रूप से एक ड्रोन हमला हुआ। बच्चे वहीं ढेर हो गए। परिवार की चीखें, मलबे और खून से सनी इस घटना की तस्वीरें उन लोगों के दिल को भी चीर देती हैं जो हजारों किलोमीटर दूर सुरक्षित बैठे हैं।
इजरायल की सेना ने बयान में इन बच्चों का जिक्र नहीं किया, बल्कि केवल यह कहा कि उन्होंने उन लोगों को निशाना बनाया जो संदिग्ध गतिविधियों में शामिल थे और इजरायली नियंत्रण क्षेत्र में घुसने की कोशिश कर रहे थे। सच क्या है, यह विवाद का प्रश्न बन चुका है, लेकिन दो मासूमों की मौत किसी भी राजनीतिक तर्क से परे है।
दो साल से लंबा होता गया युद्ध
यह संघर्ष 7 अक्टूबर 2023 को उस हमले के बाद शुरू हुआ जिसमें हमास के लड़ाकों ने दक्षिणी इजरायल पर हमला किया था। इसमें 1221 लोग मारे गए और 251 इजरायली नागरिकों को बंधक बनाया गया। यह घटना आने वाले महीनों और आज तक जारी विनाश का कारण बनी। प्रतिक्रिया में इजरायल ने बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान चलाया जिसकी वजह से गाजा का लगभग पूरा इन्फ्रास्ट्रक्चर धराशायी हो गया।
धीरे-धीरे युद्ध इतना लंबा खिंच गया कि लोग यह भूलने लगे कि शुरुआत कैसे हुई थी। घर, स्कूल, अस्पताल, सड़कें, पानी के टैंक, बिजली की लाइनें और जीवन के सारे स्तंभ एक-एक करके ढह गए। युद्धविराम और एक्सचेंज समझौतों की प्रक्रिया में इजरायल ने लगभग 2000 फिलिस्तीनी कैदियों को रिहा किया और सैकड़ों शव वापस लौटाए। इसी तरह लगभग सभी बंधक या उनके मृत अवशेष भी वापस कर दिए गए।
लेकिन सवाल केवल बंधकों का नहीं, सवाल है उस मानव जीवन का जिसकी कीमत हर नई सुबह कम होती जा रही है।
सीजफायर के बाद गाजा की स्थिति
युद्धविराम का अर्थ होता है राहत, लेकिन गाजा की धरती पर राहत एक शब्द भर बन कर रह गया है। बिजली, पानी और भोजन जैसी बुनियादी ज़रूरतें आज भी उपलब्ध नहीं। अस्पतालों में दवाएं और उपकरण खत्म हो चुके हैं। कई जगह ऑपरेशन बिना एनेस्थीसिया के किए जा रहे हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, ऐसे हालात आधुनिक दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलते।
जनसंख्या का बड़ा हिस्सा दक्षिणी इलाके में शरण ले चुका है जहां कभी स्कूल, कभी मस्जिद और कभी अधूरे मकान शरणस्थली बन गए हैं। हर जगह केवल खानाबदोशों की तरह घूमते परिवार, भूख और मृत्यु की छाया दिख रही है।
अंतरराष्ट्रीय संगठनों की मददें आती हैं, लेकिन इतनी कम मात्रा में कि उन्हें कहीं भी असरकारी नहीं कहा जा सकता। संयुक्त राष्ट्र बार-बार चेतावनी दे चुका है कि गाजा अकाल की कगार पर है, लेकिन वास्तविकता यह है कि कई जगह लोग पहले से ही भूख से जूझ रहे हैं।
दुनिया की राजनीति और मानवता का टकराव
इस संघर्ष को केवल इजरायल और हमास के बीच का युद्ध कहना गलत होगा। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय राजनीति की कई परतें जुड़ी हैं। अमेरिका से लेकर यूरोप और अरब देशों तक सभी की अपनी-अपनी रणनीतियाँ, चिंताएँ और हित हैं। कई देश खुलकर किसी पक्ष के साथ नहीं आते, क्योंकि उन्हें डर है कि उनकी बात किसी एक पक्ष की तरफ झुकाव के रूप में देखी जाएगी।
लेकिन सवाल यह है कि जब बच्चे मरते हों, जब अस्पताल खंडहर बन जाएं, जब सत्तर हजार से ज्यादा लोग मौत के आँकड़ों में बदल जाएं, तब क्या चुप्पी भी राजनीति का हिस्सा बन जाती है।
गाजा की गलियों में रोज जन्म लेती त्रासदियाँ
गाजा की कहानी सिर्फ युद्ध की कहानी नहीं है। यह कहानी उन माताओं की है जो मलबे हटने का इंतजार करती हैं ताकि पता चल सके कि उनका बेटा जिंदा है या नहीं। यह कहानी उन बच्चों की है जो स्कूल जाते थे लेकिन अब स्कूल उनका आश्रय बन गए हैं। यह कहानी उन हजारों पुरुषों और महिलाओं की है जो कभी किसान, शिक्षक, दुकानदार, इंजीनियर थे, लेकिन अब शरणार्थी बन चुके हैं और उनका पूरा संसार मलबा बनकर उनके चारों ओर बिखरा है।
हर दिन कोई नई घटना, कोई नया हादसा, कोई नई मौत इस क्षेत्र की तकदीर बन चुका है। गाजा की फिजाओं में केवल धुएं और चीखों की गूँज है। वहां रोटी कम और मौत ज्यादा मिलती है।
क्या कभी मिलेगा स्थायी समाधान
इस युद्ध का स्थायी समाधान किसके हाथ में है, यह एक बड़ा सवाल है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि जब तक दोनों पक्ष सुरक्षा और राष्ट्र की पहचान के मुद्दे पर एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते, तब तक कोई भी समझौता स्थायी नहीं बन सकेगा।
लेकिन क्या यह संभव है कि युद्ध के इतने दर्दनाक अध्यायों के बीच कोई ऐसा पुल बनाया जा सके जिस पर चलकर दोनों पक्ष शांति की ओर बढ़ें।
यदि यह युद्ध जारी रहा तो कौन बचेगा, और बचेगा भी तो किस रूप में। आज का संघर्ष केवल जमीन का नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के भविष्य का संकट बन चुका है।
गाजा का हर बच्चा जो स्कूल नहीं जाता, भविष्य के खोने का प्रतीक बन रहा है। हर अस्पताल जो ढहता है, हर परिवार जो मिट्टी में दफन होता है, दुनिया को यह संदेश देता है कि मानवता हर बार हार रही है।
