25 दिसंबर की सुबह घाना में कुछ अलग थी। क्रिसमस के उल्लास, चर्च की घंटियों और परिवारों के साथ मनाए जाने वाले इस दिन की शुरुआत भय और अफरातफरी से हुई। सूरज निकलने से पहले ही समुद्र किनारे हजारों लोग जमा होने लगे। पुरुष, महिलाएं, बुजुर्ग, बच्चे—सबके चेहरों पर एक ही सवाल था, क्या आज सच में दुनिया खत्म होने वाली है?

यह दृश्य किसी फिल्म का हिस्सा नहीं था, बल्कि एक हकीकत थी, जिसने पूरे घाना को झकझोर कर रख दिया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में लोग समुद्र तट की ओर भागते दिखे, लंबी कतारें लगी थीं और कुछ लोग रोते हुए प्रार्थना कर रहे थे। इस सामूहिक डर के केंद्र में एक नाम था—एबो नोआ।
कौन है एबो नोआ और क्यों मानी गई उसकी बात
एबो नोआ खुद को भगवान का संदेशवाहक और आधुनिक समय का अवतार बताता है। उसका दावा है कि उसे ईश्वर से सीधे संकेत मिलते हैं और वह आने वाले भविष्य को देख सकता है। बीते कुछ महीनों से वह सोशल मीडिया और स्थानीय सभाओं में लगातार यह प्रचार कर रहा था कि 25 दिसंबर को पूरी दुनिया विनाश की ओर बढ़ जाएगी।
नोआ का कहना था कि भगवान उसे बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि पृथ्वी पर एक ऐसी प्राकृतिक आपदा आने वाली है, जो अब तक की सभी आपदाओं से कहीं अधिक भयावह होगी। उसके अनुसार, क्रिसमस के दिन आसमान से मूसलाधार बारिश होगी, नदियां उफान पर होंगी, समुद्र अपनी सीमाएं तोड़ देगा और पूरी दुनिया भीषण बाढ़ में डूब जाएगी।
नोआ की ‘नाव’ और बाइबल से जुड़ा दावा
एबो नोआ ने अपनी भविष्यवाणी को और विश्वसनीय बनाने के लिए बाइबल की प्रसिद्ध कहानी का सहारा लिया। उसने खुद को उसी नोआ से जोड़ दिया, जिसने ईश्वर के आदेश पर नाव बनाई थी और महाप्रलय से जीवों को बचाया था। इसी कथा से प्रेरित होकर एबो ने एक बड़ी नाव बनवाई, जिसे उसने ‘आर्क ऑफ नूह’ नाम दिया।
नोआ का दावा था कि यह नाव ईश्वर के निर्देश पर बनाई गई है और जब 25 दिसंबर को विनाश आएगा, तब केवल वही लोग जीवित बचेंगे जो इस नाव में होंगे। उसने यह भी कहा कि यह नाव आम नावों जैसी नहीं है, बल्कि इसमें विशेष सुरक्षा है, जो किसी भी बाढ़ या तूफान का सामना कर सकती है।
डर कैसे बना विश्वास
घाना के कई इलाकों में गरीबी, अशिक्षा और धार्मिक आस्था गहराई से जुड़ी हुई है। ऐसे में जब कोई व्यक्ति ईश्वर का नाम लेकर भयावह भविष्य की तस्वीर पेश करता है, तो लोग बिना सवाल किए उस पर विश्वास कर लेते हैं। एबो नोआ की बातें धीरे-धीरे सोशल मीडिया, व्हाट्सऐप ग्रुप्स और चर्च सभाओं में फैलने लगीं।
लोगों ने यह मानना शुरू कर दिया कि अगर वे नोआ की चेतावनी को नजरअंदाज करेंगे, तो उनका और उनके परिवार का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। इसी डर ने हजारों लोगों को समुद्र किनारे खींच लाया।
समुद्र तट पर उमड़ा जनसैलाब
25 दिसंबर की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आई, लोगों की बेचैनी बढ़ती गई। रात होते-होते समुद्र किनारे भीड़ जमा होने लगी। सुबह तक हालात ऐसे हो गए कि नाव तक पहुंचने के लिए लंबी-लंबी कतारें लग गईं। कुछ लोगों ने तो पहले से ही नाव में जगह बुक करा ली थी।
वीडियो में देखा गया कि लोग अपने बच्चों को गोद में लिए दौड़ रहे हैं, बुजुर्ग सहारे के बिना चल नहीं पा रहे, फिर भी डर उन्हें आगे बढ़ने को मजबूर कर रहा था। कई लोग हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे थे, तो कुछ नोआ के सामने घुटनों के बल बैठकर अपनी जान बचाने की गुहार लगा रहे थे।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ डर
इस पूरे घटनाक्रम ने सोशल मीडिया को भी हिला दिया। फेसबुक, एक्स और अन्य प्लेटफॉर्म पर घाना के समुद्र तट की वीडियो तेजी से वायरल होने लगीं। कुछ लोग इसे अंधविश्वास बता रहे थे, तो कुछ इसे ईश्वरीय संकेत मानकर समर्थन कर रहे थे।
कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि क्या सच में इतनी बड़ी आपदा आने वाली है या यह सिर्फ लोगों के डर का फायदा उठाने की कोशिश है। लेकिन जिन लोगों ने नाव में शरण ली थी, उनके लिए यह बहस बेमानी थी। उनके लिए सबसे जरूरी था—जिंदगी बचाना।
प्रशासन की भूमिका और चुनौती
जब हालात बेकाबू होने लगे, तब स्थानीय प्रशासन और पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा। अधिकारियों ने लोगों से अपील की कि वे अफवाहों पर विश्वास न करें और शांति बनाए रखें। मौसम विभाग ने भी स्पष्ट किया कि किसी भी असाधारण बारिश या बाढ़ का कोई पूर्वानुमान नहीं है।
इसके बावजूद, डर इतना गहरा था कि प्रशासन की बातों का असर सीमित रहा। कई लोग मानते थे कि सरकार सच्चाई छुपा रही है और सिर्फ एबो नोआ ही सच बोल रहा है।
आस्था बनाम विवेक की लड़ाई
यह घटना सिर्फ घाना तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक सवाल बन गई। क्या आस्था के नाम पर लोगों को डराया जा सकता है? क्या किसी एक व्यक्ति की भविष्यवाणी हजारों लोगों की सोच और व्यवहार को बदल सकती है?
विशेषज्ञों का कहना है कि जब समाज में अनिश्चितता, आर्थिक संकट और भय का माहौल होता है, तब ऐसे दावे तेजी से फैलते हैं। लोग तर्क और विज्ञान को छोड़कर किसी चमत्कार की उम्मीद में सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार हो जाते हैं।
जब दिन ढला और दुनिया खत्म नहीं हुई
25 दिसंबर का दिन धीरे-धीरे बीत गया। न कोई महाप्रलय आया, न ही कोई भीषण बाढ़। आसमान साफ रहा और समुद्र अपनी सामान्य लहरों के साथ शांत दिखाई दिया। जैसे-जैसे समय बीतता गया, लोगों को एहसास होने लगा कि वे एक अफवाह और डर का शिकार हो गए थे।
कुछ लोग चुपचाप लौट गए, कुछ ने सवाल उठाए और कुछ अब भी यह मानने को तैयार नहीं थे कि एबो नोआ गलत हो सकता है। इस घटना ने कई परिवारों को मानसिक रूप से झकझोर दिया और समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अंधविश्वास कितना खतरनाक हो सकता है।
एक सबक जो दुनिया को याद रखना चाहिए
घाना की यह घटना सिर्फ एक देश की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता के लिए चेतावनी है। जब डर, आस्था और अफवाह एक साथ मिल जाते हैं, तो विवेक पीछे छूट जाता है। ऐसे समय में सच, विज्ञान और जागरूकता ही समाज को संभाल सकती है।
यह घटना यह भी बताती है कि सोशल मीडिया के दौर में किसी भी दावे को आंख मूंदकर मान लेना कितना खतरनाक हो सकता है। जरूरत है सवाल पूछने की, समझने की और सच को परखने की।
