दुनिया की वित्तीय हलचलें हर बार निवेश रणनीतियों के केंद्र में नए अवसर और जोखिम लाती हैं। आने वाला वर्ष 2026 भी इसी परिवर्तन के दोराहे पर खड़ा है। वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में गिरावट की आशंका, ब्याज दरों की अनिश्चितता, मुद्राओं के मूल्य में गिरावट, राजनीतिक तनाव और बाज़ारों में अत्यधिक ऊंचे मूल्यांकन ने निवेशकों को नई मंजिलें तलाशने पर मजबूर कर दिया है। इसी संदर्भ में एक बड़े और प्रभावशाली निवेश विशेषज्ञ मार्क फैबर ने भविष्य की एक ऐसी दिशा दिखाई है जो भारत के निवेश बाजार की मान्यताओं को चुनौती देती है।

भारत से हटेगा विदेशी धन, दक्षिण–पूर्व एशिया और लैटिन दुनिया बनेगी नई पनाहगाह
2025 के उतार–चढ़ाव भरे वर्ष के बाद विशेषज्ञ 2026 के वित्तीय संतुलन को लेकर गहन चिंताएं व्यक्त कर रहे हैं। मार्क फैबर का तर्क है कि भारत में विदेशी निवेश कुछ समय के लिए धीमा होगा, जबकि निवेश प्रवाह इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, हांगकांग, ब्राजील, कोलंबिया और चिली जैसे देशों की तरफ सक्रिय रूप से बढ़ेगा।
फैबर के अनुसार इन देशों में वर्तमान मूल्यांकन संतुलित हैं, सामाजिक तनाव सीमित है, सरकारी कर्ज नियंत्रण में है और आर्थिक गतिविधियों में भविष्य की संभावनाएं अधिक दिखाई देती हैं।
भारत हालांकि दीर्घकाल में मजबूत अर्थव्यवस्था बनेगा, लेकिन अगले 12 से 18 महीने निवेशकों के लिए चुनौतीपूर्ण रहेंगे।
भारत की बढ़त वास्तव में कितनी मजबूत
भारतीय शेयर बाजार ने बीते वर्ष रुपये के आधार पर अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मापदंडों में यह चमक कम हुई। सितंबर 2024 के बाद डॉलर के लिहाज से बाजार नई ऊंचाई नहीं छू पाया। सोने और चांदी के मूल्य मानक पर भारतीय बाजार और भी कमजोर रूप में दिखता है।
ब्राजील का बाजार वर्षभर में 55 प्रतिशत ऊपर गया जबकि कई अन्य उभरते देश भारत से बेहतर रिटर्न दे गए। इसका मूल कारण विदेशी निवेशकों की रणनीति में बदलाव और भारतीय बाजार में ऊंचे मूल्यांकन की स्थिति है।
ब्याज दरों ने बनाया वातावरण अनिश्चित
अमेरिका और यूरोप अभी भी मुद्रास्फीति से लड़ रहे हैं। ब्याज दरें कम होंगी या नहीं, यह अपने आप में असमंजस का विषय है। यदि दरों में कटौती होती है और बांड बाजार इसे पसंद नहीं करता, तो लंबी अवधि की ब्याज दरें उल्टा बढ़ सकती हैं। ऐसे समय में शेयर निवेश जोखिमभरा होता है।
फैबर का विश्लेषण संकेत देता है कि अमेरिका में यह स्थिति और खराब हो सकती है। इससे विदेशी निवेश विशुद्ध रूप से उन बाजारों में जाएगा जहां मूल्यांकन कम है और नीतिगत दबाव सीमित हैं।
क्या AI आधारित कंपनियों का दौर खत्म होने लगा
कृत्रिम बुद्धिमत्ता वैश्विक तकनीकी दौड़ की सबसे महत्वपूर्ण धुरी बन चुकी है। लेकिन फैबर का तर्क है कि AI कंपनियों में निवेश ऐसी अवस्था में पहुंच गया है जहां कीमतें भविष्य की उपलब्धियों को पहले ही शामिल कर चुकी हैं। यह स्थिति वर्ष 2000 के इंटरनेट बुलबुले जैसी दिखाई देती है।
तकनीक ठीक है, उसका भविष्य ठीक है, लेकिन शेयर मूल्य अब अत्यधिक ऊंचे हैं। आने वाले समय में मूल्य सुधार हो सकता है। इस प्रक्रिया में निवेशक सुरक्षित बाजारों की ओर भागेंगे।
मुद्राओं की वास्तविक कमजोरी और सोने–चांदी की सार्थकता
फैबर पिछले 30 वर्षों से लगातार एक ही बात कह रहे हैं कि मुद्रा अपनी कीमत खोती है। दुनिया की कोई भी प्रमुख मुद्रा समय के साथ अपनी क्रय शक्ति खोती है।
उन्होंने कहा कि निवेशक नकद रखने की बजाय धन का एक बड़ा हिस्सा सोने, चांदी और प्लेटिनम में सुरक्षित रखें। यह निवेश दीर्घकाल में जोखिम कम करने में मदद करता है।
2026 में निवेश रणनीति कैसी होनी चाहिए
फैबर का कहना है कि अगले वर्ष निवेशकों को सावधानी रखनी होगी। उन्हें बाजारों में एक–तरफा भरोसा नहीं करना चाहिए। वे उभरते बाजारों में बिखरे अवसर देखने की सलाह देते हैं, विशेषकर उन देशों में जहां विकास का आधार अभी मजबूत हो रहा है।
भारत में अगले वर्ष अधिक रिटर्न की संभावना कम है, लेकिन भारत का सामाजिक–आर्थिक आधार लंबी अवधि में विश्वसनीय है।
