एजियन सागर की गहराइयों में जितनी शांति है, उसके ऊपर उतना ही तूफान धीरे-धीरे पनप रहा है। ग्रीस और तुर्की के बीच दशकों से चली आ रही प्रतिस्पर्धा आज नई दिशा ले चुकी है। समुद्री सीमाओं, खनिज संसाधनों और हवाई क्षेत्र को लेकर लगातार बढ़ते तनाव ने दोनों देशों की सैन्य रणनीतियों को बदलकर रख दिया है। इस बदलाव के केंद्र में है आधुनिक तकनीक, जिसने हथियारों की दौड़ को एक नए युग में पहुंचा दिया है।

ग्रीस, जिसे लंबे समय तक तुर्की के मुकाबले कमजोर माना जाता था, अब अचानक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरता दिख रहा है। यह परिवर्तन किसी संयोग का परिणाम नहीं, बल्कि योजनाबद्ध सैन्य आधुनिकीकरण का नतीजा है, जिसने भूमध्यसागर की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है।
ग्रीस का तेज़ी से उभरता सैन्य आधुनिकीकरण
पिछले कुछ वर्षों में ग्रीस ने अपनी रक्षा क्षमताओं में जिस गति से वृद्धि की है, वह यूरोप के कई बड़े देशों के लिए भी आश्चर्य का विषय बनी है। आर्थिक संकट से जूझ चुके इस देश ने अचानक ही अपनी प्राथमिकताओं को पुनः संरचित किया और रक्षा-क्षेत्र में बड़े निवेश की ओर कदम बढ़ाया। इसका प्रमुख कारण था तुर्की की लगातार बढ़ती आक्रामकता, विशेषकर एजियन क्षेत्र में।
फ्रांस के साथ ग्रीस की राफेल जेट डील ने उसकी हवाई क्षमता को ऐसे स्तर पर पहुंचा दिया, जिसकी कल्पना कुछ वर्ष पहले भी नहीं की जा सकती थी। इन आधुनिक लड़ाकू विमानों ने ग्रीस को ऐसी शक्ति दी जो केवल गति और फुर्ती तक सीमित नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, स्टील्थ क्षमताओं और लंबी दूरी की मिसाइल तकनीक पर आधारित है।
राफेल के साथ जुड़ी मेटेओर मिसाइल ग्रीस की सैन्य रणनीति का सबसे बड़ा आधार बन चुकी है। 150 किलोमीटर से अधिक दूरी पर हवा में उड़ते दुश्मन विमान को बिना चेतावनी के गिराने की क्षमता आज ग्रीक एयरफ़ोर्स का निर्णायक हथियार बन चुकी है।
तुर्की की चिंता: F-16 पर निर्भरता और F-35 से बाहर हुआ भविष्य
एक समय था जब तुर्की के पास इस क्षेत्र का सबसे मजबूत लड़ाकू विमान बेड़ा माना जाता था। उसके F-16 जेट्स तेज़, भरोसेमंद और युद्ध-सिद्ध थे। लेकिन तकनीकी विकास ने तुर्की को अचानक पिछड़े हुए देश की स्थिति में खड़ा कर दिया।
अमेरिका द्वारा उसे F-35 कार्यक्रम से बाहर किए जाने के बाद तुर्की के सामने आधुनिक उपकरणों की भारी कमी उत्पन्न हो गई। उसकी स्वदेशी KAAN फाइटर जेट परियोजना अभी भी इंजन और तकनीक के अभाव में अधूरी है। इस बीच ग्रीस ने राफेल के माध्यम से वह शक्ति हासिल कर ली, जिसका मुकाबला F-16 किसी भी स्तर पर नहीं कर सकता।
तुर्की इस असमानता को दूर करने के लिए यूरोफाइटर टाइफून खरीदने की योजना बना रहा है, लेकिन जर्मनी से राजनीतिक मतभेद इस प्रक्रिया को लगातार धीमा कर रहे हैं। इस देरी ने तुर्की के कूटनीतिक और रक्षा-विशेषज्ञों को गंभीर चिंता में डाल दिया है।
एजियन सागर: हवा में टकराते जेट्स और बढ़ता तनाव
एजियन सागर वह क्षेत्र है जहां ग्रीस और तुर्की की हवाई टकराहट लगभग रोजमर्रा की बात बन चुकी है। कई बार दोनों देशों के जेट्स एक-दूसरे को रडार पर लॉक कर लेते हैं, और स्थिति ऐसी बन जाती है कि एक छोटी गलती भी युद्ध का कारण बन सकती है।
तुर्की कई बार ग्रीस पर अपने हवाई क्षेत्र में घुसपैठ का आरोप लगाता है, जबकि ग्रीस कहता है कि तुर्की उसके द्वीपों के बहुत करीब उड़ान भरकर तनाव पैदा करता है। इन आरोपों और जवाबी आरोपों के बीच वास्तविक विजेता वह देश बनता है जिसके पास बेहतर तकनीक और बेहतर तैयारी हो।
आज स्थिति यह है कि यदि हवा में कोई वास्तविक भिड़ंत होती है, तो ग्रीस के पास मौजूद राफेल और मेटेओर मिसाइलें तुर्की के F-16 को हवा में पहुंचने से पहले ही गिरा सकती हैं। यही वास्तविकता तुर्की को सबसे अधिक परेशान कर रही है।
ग्रीस की नई समुद्री ताकत: बेलहारा फ्रिगेट्स का आगमन
सिर्फ हवाई क्षेत्र ही नहीं, ग्रीस ने अपनी समुद्री शक्ति को भी आधुनिक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फ्रांस से मिली बेलहारा क्लास फ्रिगेट्स ग्रीस की नौसेना के लिए ऐतिहासिक बदलाव लेकर आई हैं। ये फ्रिगेट्स एंटी-एयरक्राफ्ट, एंटी-शिप, एंटी-सबमरीन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमताओं से लैस हैं, जिनकी वजह से पूरे पूर्वी भूमध्यसागर में ग्रीस की प्रतिष्ठा बेहद तेजी से बढ़ी है।
तुर्की, जो लंबे समय तक इस क्षेत्र में ड्रिलिंग जहाजों, नौसैनिक अभियानों और सैन्य अभ्यासों के जरिए अपना प्रभुत्व दिखाता रहा है, अब ग्रीस की नई नौसैनिक ताकत से असहज महसूस कर रहा है।
यह परिवर्तन केवल सैन्य स्तर पर नहीं, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी तुर्की को चुनौती दे रहा है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बदलता प्रभाव
ग्रीस की नई रणनीति केवल तुर्की को संतुलित करने तक सीमित नहीं है। यूरोप और नाटो में उसकी बढ़ती भूमिका इस बात का प्रमाण है कि वह खुद को क्षेत्रीय स्थिरता का प्रमुख आधार देश बनाना चाहता है। रूस और चीन के बढ़ते भूमध्यसागरीय प्रभाव ने यूरोपीय देशों को मजबूर किया है कि वे ग्रीस को अपनी दक्षिणी रक्षा दीवार के रूप में स्थापित करें।
तुर्की की रूस के साथ बढ़ती नज़दीकियों ने उसे नाटो के भीतर एक अलग-थलग स्थिति में ला खड़ा किया है। यही कारण है कि यूरोपीय राष्ट्र ग्रीस को मजबूत बनाकर एक भरोसेमंद संतुलन तैयार करना चाहते हैं।
भविष्य का समीकरण: क्या बढ़ेगा तनाव या बनेगी नई स्थिरता?
ग्रीस जिस तेज़ गति से आगे बढ़ रहा है, यदि यह क्रम इसी तरह जारी रहा तो आने वाले वर्षों में वह तुर्की को सैन्य रूप से पीछे छोड़ सकता है। यह परिवर्तन केवल हथियारों तक सीमित नहीं होगा, बल्कि कूटनीति, समुद्री नियंत्रण और आर्थिक स्थिरता पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा।
दोनों देश समझते हैं कि सीधा युद्ध उनके लिए विनाशकारी होगा। इसलिए इस संघर्ष का स्वरूप हथियारों की दौड़, तकनीक की प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बनाने की कोशिशों तक सीमित रहेगा। फिर भी एजियन सागर की हर उड़ान और हर नौसैनिक गतिविधि भविष्य में किसी बड़े विवाद का बीज बन सकती है।
2025 का यह समय पूर्वी भूमध्यसागर के लिए एक ऐसा दौर है जहां संतुलन पहली बार स्पष्ट रूप से ग्रीस की ओर झुकता दिखाई दे रहा है। आने वाले वर्षों में यह बदलाव किस दिशा में जाएगा, यही इस पूरे क्षेत्र की स्थिरता तय करेगा।
