दुनिया की भू-राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां सहयोगी देश आमने-सामने आने की कगार पर हैं। उत्तरी ध्रुव के करीब स्थित बर्फीला द्वीप ग्रीनलैंड अब केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं रहा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का नया केंद्र बन गया है। अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ता तनाव इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा समीकरणों में बड़ा बदलाव हो सकता है।

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की आक्रामक बयानबाज़ी और सैन्य विकल्पों की धमकी ने डेनमार्क और यूरोपीय संघ को असहज कर दिया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि यूरोप अब अमेरिका के खिलाफ अपने सबसे शक्तिशाली सामूहिक रक्षा प्रावधान को लागू करने पर विचार कर रहा है।
ग्रीनलैंड क्यों बन गया वैश्विक संघर्ष का केंद्र
ग्रीनलैंड भले ही आबादी के लिहाज से छोटा हो, लेकिन रणनीतिक दृष्टि से यह क्षेत्र बेहद अहम है। आर्कटिक क्षेत्र में स्थित यह द्वीप न केवल सैन्य निगरानी और रक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यहां दुर्लभ खनिज संसाधनों और भविष्य के व्यापारिक मार्गों की भी अपार संभावनाएं हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक में बर्फ पिघलने से नए समुद्री मार्ग खुल रहे हैं, जिससे वैश्विक शक्तियों की रुचि इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ी है। अमेरिका, रूस और चीन पहले से ही इस इलाके में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। ऐसे में ग्रीनलैंड पर नियंत्रण भविष्य की रणनीतिक बढ़त का प्रतीक बन गया है।
ट्रंप की धमकी और यूरोप की बेचैनी
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए सैन्य विकल्प की बात करना यूरोप के लिए किसी झटके से कम नहीं था। यह बयान न केवल डेनमार्क की संप्रभुता पर सवाल उठाता है, बल्कि NATO जैसे सैन्य गठबंधन की एकता पर भी खतरा पैदा करता है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है और वह डेनमार्क के प्रशासनिक नियंत्रण में ही रहेगा। यही संदेश लेकर डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेश मंत्री वाइट हाउस पहुंचने वाले हैं, जहां उनकी मुलाकात अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व से होगी।
वाइट हाउस की बैठक: फैसला जो इतिहास बदल सकता है
अमेरिकी समय के अनुसार बुधवार को वाइट हाउस में होने वाली बैठक को निर्णायक माना जा रहा है। इस बैठक में डेनमार्क और ग्रीनलैंड के प्रतिनिधि अमेरिका के उप-राष्ट्रपति और विदेश मंत्री से सीधे बातचीत करेंगे।
यूरोपीय नेताओं का मानना है कि अगर अमेरिका ने सैन्य दबाव बनाया, तो यूरोप को सामूहिक रूप से प्रतिक्रिया देनी होगी। यही वजह है कि यूरोपीय संघ अब अपने सबसे अहम रक्षा प्रावधान पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
NATO की भूमिका और आर्कटिक सुरक्षा
NATO ने भी इस बढ़ते तनाव पर प्रतिक्रिया दी है। संगठन की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि आर्कटिक क्षेत्र में सुरक्षा बनाए रखने के लिए अगले कदमों पर चर्चा की जा रही है।
हालांकि NATO का रुख फिलहाल संतुलित दिख रहा है, लेकिन अंदरखाने चिंता गहरी है। अगर अमेरिका और यूरोप आमने-सामने आते हैं, तो यह NATO के अस्तित्व और विश्वसनीयता के लिए बड़ा संकट बन सकता है।
यूरोप का आर्टिकल 42.7 क्या है और क्यों अहम है
यूरोपीय संघ की संधि में शामिल आर्टिकल 42.7 एक सामूहिक रक्षा क्लॉज है। इसके तहत अगर किसी सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होता है, तो बाकी सदस्य देशों की जिम्मेदारी बनती है कि वे उसकी रक्षा के लिए अपनी पूरी क्षमता से सहायता करें।
यह प्रावधान यूरोप की सामूहिक सुरक्षा की रीढ़ माना जाता है। हालांकि यह NATO के आर्टिकल 5 से अलग है, लेकिन इसकी राजनीतिक और सैन्य ताकत कम नहीं आंकी जाती।
अगर आर्टिकल 42.7 लागू हुआ तो क्या बदलेगा
अगर यूरोपीय संघ इस प्रावधान को लागू करता है, तो डेनमार्क को सीधी सैन्य सहायता मिलने का रास्ता खुल जाएगा। इसके बाद यूरोपीय देशों के सैनिक ग्रीनलैंड और डेनमार्क में तैनात किए जा सकते हैं।
हालांकि कुछ तटस्थ देशों को इस क्लॉज से छूट मिलती है, लेकिन बड़े सैन्य ताकत वाले देशों की भागीदारी इस संघर्ष को वैश्विक स्तर पर पहुंचा सकती है।
इतिहास में आर्टिकल 42.7 का एकमात्र उपयोग
अब तक यूरोप ने इस प्रावधान का इस्तेमाल केवल एक बार किया है। 2015 में पेरिस में हुए आतंकी हमलों के बाद फ्रांस ने इसे सक्रिय किया था। उस समय यूरोपीय देशों ने फ्रांस को सैन्य और खुफिया सहयोग दिया था।
ग्रीनलैंड विवाद में इस क्लॉज का इस्तेमाल करना कहीं ज्यादा जटिल और संवेदनशील होगा, क्योंकि इसमें संभावित टकराव सीधे अमेरिका से है।
NATO और यूरोपीय संघ के बीच असहज संतुलन
NATO के महासचिव ने हाल ही में कहा था कि संगठन की प्राथमिक चिंता रूस, चीन और अन्य संभावित दुश्मनों से सुरक्षा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अमेरिका और यूरोप आपसी बातचीत से समाधान निकाल लेंगे।
लेकिन मौजूदा हालात यह दिखा रहे हैं कि सहयोगी देशों के बीच भरोसे की दरार गहरी हो रही है।
वैश्विक राजनीति पर पड़ने वाला असर
अगर यह विवाद बढ़ता है, तो इसका असर केवल ग्रीनलैंड या यूरोप तक सीमित नहीं रहेगा। इससे वैश्विक व्यापार, सैन्य गठबंधन और अंतरराष्ट्रीय कानून की दिशा भी बदल सकती है।
यह मामला यह भी दिखाता है कि आने वाले समय में आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक संघर्ष का नया केंद्र बन सकता है।
निष्कर्ष: दुनिया सांस रोके देख रही है
ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ता तनाव दुनिया को एक नए भू-राजनीतिक युग की ओर ले जा सकता है। वाइट हाउस में होने वाली बैठक केवल एक कूटनीतिक मुलाकात नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला क्षण है।
क्या बातचीत से समाधान निकलेगा या दुनिया एक नए टकराव की ओर बढ़ेगी, इसका जवाब आने वाले घंटों में मिल सकता है।
