ग्रामीण भारत में विकास तभी सार्थक होता है, जब उसकी कमान गांव की महिलाओं के हाथों में हो। योजनाएं तभी सफल होती हैं, जब उनके क्रियान्वयन में वही लोग शामिल हों, जो गांव की वास्तविक जरूरतों और परिस्थितियों को समझते हों। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए हरदा जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत महिलाओं को और अधिक जिम्मेदारी देने की दिशा में एक अहम पहल की गई है। जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी अंजलि जोसेफ द्वारा सीआरपी महिलाओं के साथ आयोजित बैठक इसी बदलाव की मजबूत नींव मानी जा रही है।

बैठक का उद्देश्य और पृष्ठभूमि
हरदा जिले में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन महिलाओं के साथ हुई इस बैठक का मुख्य उद्देश्य था ‘एक बगिया मां के नाम’ योजना की प्रगति की समीक्षा करना और इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए नई रणनीति तैयार करना। यह योजना केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं है, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने, पोषण सुरक्षा बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का एक समग्र प्रयास है।
बैठक में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि अब योजनाओं की एंट्री, निगरानी और रिपोर्टिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में सीआरपी महिलाओं की भूमिका और सशक्त की जाएगी। लोकल स्तर पर योजना की जानकारी दर्ज करने, लाभार्थियों से संवाद बनाए रखने और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी इन्हीं महिलाओं को दी जाएगी।
सीआरपी महिलाओं की भूमिका का विस्तार
सीआरपी महिलाएं पहले से ही गांवों में स्वयं सहायता समूहों और आजीविका मिशन की रीढ़ मानी जाती हैं। वे न केवल अन्य महिलाओं को समूह से जोड़ती हैं, बल्कि उन्हें बचत, ऋण, रोजगार और स्वावलंबन के रास्ते पर भी आगे बढ़ाती हैं। अब जब लोकल एंट्री जैसे तकनीकी और प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी भी इन्हें सौंपी जा रही है, तो यह महिला नेतृत्व को नई ऊंचाई देने जैसा कदम है।
इस पहल से यह संदेश जाता है कि महिलाएं केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास की सहभागी और संचालक भी हैं। जब वही महिलाएं डेटा दर्ज करेंगी, फील्ड से जानकारी देंगी और योजनाओं की निगरानी करेंगी, तो जमीनी सच्चाई सीधे प्रशासन तक पहुंचेगी।
‘एक बगिया मां के नाम’ योजना का सामाजिक महत्व
‘एक बगिया मां के नाम’ योजना का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को पोषणयुक्त भोजन उपलब्ध कराना और महिलाओं को खेती-बाड़ी से जोड़कर आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। इस योजना के तहत घरों के आसपास छोटी-छोटी बगिया विकसित की जाती हैं, जहां सब्जियां और फल उगाए जाते हैं। इससे परिवार की पोषण जरूरतें पूरी होती हैं और अतिरिक्त उपज से आय का स्रोत भी बनता है।
बैठक में यह चर्चा की गई कि योजना को केवल कागजों तक सीमित न रखते हुए उसे महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी से कैसे जोड़ा जाए। सीआरपी महिलाओं को यह जिम्मेदारी दी गई कि वे गांव-गांव जाकर महिलाओं को प्रेरित करें, तकनीकी जानकारी दें और नियमित निगरानी रखें।
महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की दिशा
इस पूरी पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू महिला सशक्तिकरण है। जब महिलाएं योजनाओं की निगरानी और क्रियान्वयन में सक्रिय भूमिका निभाती हैं, तो उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है। वे खुद को केवल घरेलू दायरे तक सीमित नहीं रखतीं, बल्कि गांव के विकास में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
हरदा जिले में यह प्रयोग इस बात का उदाहरण बन सकता है कि यदि महिलाओं को भरोसा और जिम्मेदारी दी जाए, तो वे किसी भी योजना को सफल बना सकती हैं। सीआरपी महिलाओं को लोकल एंट्री जैसे कार्य सौंपना इस भरोसे की सबसे मजबूत अभिव्यक्ति है।
प्रशासन और समुदाय के बीच सेतु
सीआरपी महिलाएं प्रशासन और ग्रामीण समुदाय के बीच एक मजबूत सेतु का काम करती हैं। वे स्थानीय भाषा, संस्कृति और जरूरतों को समझती हैं। इसी कारण वे योजनाओं को जमीन पर उतारने में अहम भूमिका निभाती हैं। बैठक में यह भी कहा गया कि यदि किसी गांव में योजना के क्रियान्वयन में बाधा आती है, तो सबसे पहले सीआरपी महिलाएं ही समाधान खोजेंगी और आवश्यकता पड़ने पर प्रशासन को सूचित करेंगी।
यह व्यवस्था न केवल योजनाओं की गति बढ़ाएगी, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही भी सुनिश्चित करेगी।
डिजिटल जिम्मेदारियों की ओर कदम
लोकल एंट्री जैसे कार्यों का अर्थ है कि अब सीआरपी महिलाएं डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी सक्रिय होंगी। यह ग्रामीण महिलाओं के लिए एक बड़ा बदलाव है। इससे उनकी डिजिटल साक्षरता बढ़ेगी और वे तकनीक से जुड़ेंगी। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि महिलाओं को आवश्यक प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि वे बिना किसी कठिनाई के यह जिम्मेदारी निभा सकें।
डिजिटल एंट्री से आंकड़ों की शुद्धता बढ़ेगी और योजनाओं की वास्तविक स्थिति सामने आएगी।
ग्रामीण विकास में नई सोच
हरदा जिले में हुई यह बैठक केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं थी, बल्कि यह ग्रामीण विकास की सोच में बदलाव का संकेत है। अब विकास ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर की दिशा में होगा। गांव की महिलाएं अपनी जरूरतें खुद बताएंगी, समाधान खुद खोजेंगी और प्रशासन के साथ मिलकर काम करेंगी।
यह मॉडल अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है, जहां महिला स्वयं सहायता समूह पहले से सक्रिय हैं।
भविष्य की संभावनाएं
यदि यह पहल सफल होती है, तो आने वाले समय में सीआरपी महिलाओं की भूमिका और भी व्यापक हो सकती है। वे केवल एक योजना तक सीमित न रहकर अन्य ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा सकती हैं। इससे न केवल महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ेगा, बल्कि गांवों की तस्वीर भी बदलेगी।
निष्कर्ष: जिम्मेदारी से सशक्तिकरण तक
हरदा जिले में सीआरपी महिलाओं के साथ हुई यह बैठक इस बात का प्रमाण है कि जब महिलाओं को जिम्मेदारी दी जाती है, तो वे सशक्त बनती हैं। ‘एक बगिया मां के नाम’ योजना की समीक्षा के बहाने यह संदेश साफ है कि ग्रामीण विकास की असली ताकत गांव की महिलाओं में ही छिपी है। लोकल एंट्री जैसे कार्य सौंपकर प्रशासन ने यह भरोसा जताया है कि महिलाएं न केवल योजनाओं की लाभार्थी हैं, बल्कि उनकी सबसे मजबूत आधारशिला भी हैं।
