हिमालयी क्षेत्र, जो सदियों से प्राकृतिक सौंदर्य, जल स्रोत और जैव विविधता का प्रमुख केंद्र रहा है, आज एक नई चुनौती का सामना कर रहा है। विशेषज्ञों और पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालय में सर्दियों के दौरान होने वाली बर्फबारी में लगातार कमी देखी जा रही है। ऐसे मौसम में जब पर्वतों को बर्फ की सफेद चादर ढकनी चाहिए, वहां के कई हिस्से अब नंगे और पथरीले दिखाई देने लगे हैं। यह सिर्फ दृश्य परिवर्तन नहीं बल्कि जल संसाधनों, ग्लेशियरों और क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर गंभीर प्रभाव डालने वाली समस्या है।

बर्फबारी में कमी के आँकड़े और अध्ययन
विभिन्न शोधों और मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 1980 से 2020 के बीच हिमालय में औसत बर्फबारी को देखा जाए तो पिछले पाँच सालों में सर्दियों के दौरान यह लगभग 25 प्रतिशत तक कम हो गई है। उत्तर-पश्चिमी हिमालय और केंद्रीय हिमालय के कुछ हिस्सों में यह गिरावट विशेष रूप से गंभीर है। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ रीडिंग के ट्रॉपिकल मेटियोरोलॉजी विशेषज्ञ कीरन हंट ने 2025 में प्रकाशित एक स्टडी में चार अलग-अलग डेटा सेट्स का विश्लेषण किया। इसमें स्पष्ट पाया गया कि हिमालय में सर्दियों की बर्फबारी लगातार घट रही है।
तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन का असर
वैज्ञानिक बताते हैं कि हिमालय में घटती बर्फबारी का मुख्य कारण ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन है। तापमान बढ़ने के कारण जो भी बर्फ गिरती है, वह तेज़ी से पिघल जाती है। कुछ निचले इलाक़ों में अब बर्फबारी के बजाय बारिश अधिक होने लगी है। इस बदलाव ने हिमालयी ग्लेशियरों की गति और संरचना को प्रभावित किया है। बर्फ की कमी का यह मतलब है कि पहाड़ों की सतह पर बर्फ और हिम का मोटा आवरण नहीं बन रहा और इससे भूस्खलन, चट्टान गिरने और ग्लेशियर झीलों के फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ गया है।
स्नो ड्रॉट और बर्फ़ का टिकाव
हिमालयी क्षेत्र में “स्नो ड्रॉट” यानी बर्फ का सूखापन जैसी स्थिति अब आम होती जा रही है। इंटरनेशनल सेंटर फ़ॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की रिपोर्ट में बताया गया कि 2024-25 की सर्दियों में बर्फ का टिकाव सामान्य से 24 प्रतिशत कम रहा। इसका मतलब यह है कि बर्फ न केवल कम गिरी बल्कि जो भी बर्फ गिरी वह लंबे समय तक टिक नहीं पाई।
बर्फबारी और जल सुरक्षा का संबंध
हिमालयी ग्लेशियरों और बर्फीले क्षेत्र का पानी, विशेषकर वसंत और गर्मियों में पिघलकर नदियों में जाता है। यह पानी पीने, सिंचाई और हाइड्रोपावर उत्पादन के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। हिमालय की 12 प्रमुख नदी घाटियों में बर्फ़ के पिघलने से आने वाला पानी कुल वार्षिक रनऑफ़ का लगभग एक चौथाई हिस्सा है। बर्फबारी में कमी से इन नदियों और घाटियों में रहने वाले लगभग दो अरब लोगों की जल सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
हिमालय में प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती आशंका
ग्लेशियरों और बर्फ की कमी से पहाड़ अस्थिर हो रहे हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि बर्फ और हिम पर्वतों के लिए एक तरह का “प्राकृतिक सीमेंट” का काम करते हैं। जब यह कम हो जाता है, तो भूस्खलन, चट्टानों का गिरना, ग्लेशियर झीलों का फटना और भारी मलबा बहने जैसी घटनाएं अधिक सामान्य हो जाती हैं। पिछले सालों में उत्तराखंड, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश में ऐसे घटनाएं बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई हैं।
नेपाल और केंद्रीय हिमालय पर असर
नेपाल में भी सर्दियों की बारिश में भारी गिरावट आई है। त्रिभुवन यूनिवर्सिटी के मेटियोलॉजी विशेषज्ञ बिनोद पोखरेल के अनुसार, अक्तूबर से अब तक नेपाल में बारिश नहीं हुई और आने वाले महीनों में भी अधिक बारिश की संभावना कम है। यही हाल केंद्रीय हिमालय के अन्य हिस्सों का भी है।
बर्फबारी घटने के पर्यावरणीय परिणाम
सर्दियों में कम बर्फबारी के कई पर्यावरणीय परिणाम सामने आते हैं। पहला, जल आपूर्ति में कमी। दूसरा, हिमालय की पारिस्थितिकी और जैव विविधता पर असर। तीसरा, जंगलों में आग का खतरा बढ़ना। इसके अलावा, स्नोमेल्ट की कमी से नदियों में जल प्रवाह असामान्य हो सकता है, जिससे कृषि और जलाशयों की स्थिति प्रभावित होती है।
पश्चिमी विक्षोभों का कमजोर पड़ना
हिमालय में सर्दियों की बारिश और बर्फबारी का एक प्रमुख कारण पश्चिमी विक्षोभ हैं। ये भूमध्यसागर से आने वाले कम दबाव वाले सिस्टम होते हैं। पहले ये विक्षोभ ठंडी हवा और नमी लेकर आते थे, जिससे हिमालय में अच्छी बर्फबारी होती थी। लेकिन अब ये कमजोर हो गए हैं और कभी-कभार उत्तर की ओर खिसक रहे हैं। इसका असर यह हुआ कि अरब सागर से नमी लेने की क्षमता कम हो गई और हिमालय में बर्फबारी घट गई।
हिमालय का दोहरा संकट
अंततः विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि हिमालय एक दोहरे संकट का सामना कर रहा है। एक तरफ़ ग्लेशियर और बर्फीले क्षेत्र तेजी से घट रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बर्फबारी भी कम हो रही है। इस कारण हिमालय की जल सुरक्षा, पारिस्थितिकी, प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम और करोड़ों लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है।
हिमालय में बर्फबारी में गिरावट केवल प्राकृतिक परिवर्तनों का संकेत नहीं बल्कि मानव जीवन, कृषि, जल आपूर्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी है। विशेषज्ञों की सलाह है कि जलवायु परिवर्तन पर ठोस कदम उठाए जाएं और हिमालयी क्षेत्रों में पर्यावरणीय संरक्षण और ग्लेशियर की निगरानी को बढ़ावा दिया जाए।
