भारत के बैंकिंग इतिहास में एक बार फिर बड़ा मोड़ आने वाला है। सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम द्वारा आईडीबीआई बैंक में अपनी बहुलांश हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया अब निर्णायक चरण में पहुंच चुकी है। इस रणनीतिक विनिवेश को लेकर देश और दुनिया के बड़े निवेशकों की नजरें टिकी हुई हैं। ताजा घटनाक्रम के अनुसार, कनाडा की दिग्गज निवेश कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल और भारत का प्रमुख निजी बैंक कोटक महिंद्रा बैंक इस सौदे में सबसे आगे माने जा रहे हैं। दोनों संस्थाएं आईडीबीआई बैंक की हिस्सेदारी खरीदने के लिए आमने-सामने हैं और वित्तीय बोलियां जमा करने की तैयारी पूरी कर चुकी हैं।

सरकार और एलआईसी मिलकर आईडीबीआई बैंक में कुल 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने जा रहे हैं। मौजूदा समय में दोनों के पास मिलाकर बैंक की 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सेदारी है। यह विनिवेश केवल एक बैंक की हिस्सेदारी बिक्री नहीं है, बल्कि यह भारत के बैंकिंग क्षेत्र में सरकार की भूमिका को धीरे-धीरे कम करने की नीति का अहम हिस्सा भी है। लंबे समय से यह माना जा रहा था कि आईडीबीआई बैंक का निजीकरण देर-सबेर होगा, और अब यह प्रक्रिया अपने सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव पर खड़ी दिखाई दे रही है।
सूत्रों के मुताबिक, दोनों इच्छुक बोलीदाता अपने-अपने वित्तीय प्रस्ताव अलग-अलग जमा करने वाले हैं। इन प्रस्तावों के जमा होने के बाद सरकार और संबंधित एजेंसियां उन्हें खोलने से पहले बैंक की न्यूनतम बिक्री कीमत यानी रिजर्व प्राइस तय करेंगी। यह रिजर्व प्राइस बोली प्रक्रिया का सबसे संवेदनशील हिस्सा माना जाता है, क्योंकि इसके आधार पर ही यह तय होगा कि सरकार और एलआईसी को इस सौदे से कितना मूल्य प्राप्त होगा।
रिजर्व प्राइस की जानकारी केवल चुनिंदा सरकारी अधिकारियों तक सीमित रखी जाएगी। इसे जानबूझकर बोली लगाने वालों से गोपनीय रखा जाएगा, ताकि प्रक्रिया निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी बनी रहे। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के अनुसार, इस न्यूनतम कीमत का निर्धारण बैंक के कारोबार, वित्तीय प्रदर्शन और संपत्तियों के मूल्यांकन के आधार पर किया गया है। इस मूल्यांकन का काम पहले ही पूरा हो चुका है और इसके लिए सरकार ने विशेषज्ञों की सेवाएं भी ली थीं।
आईडीबीआई बैंक की संपत्तियों की बात करें तो बैंक की कुल संपत्ति में जमीन और इमारत जैसी अचल संपत्तियों का हिस्सा करीब तीन प्रतिशत है। हालांकि प्रतिशत के हिसाब से यह हिस्सा छोटा दिखता है, लेकिन बैंक की देशभर में फैली शाखाएं और व्यावसायिक संपत्तियां इसके मूल्यांकन को महत्वपूर्ण बनाती हैं। यही कारण है कि रिजर्व प्राइस तय करते समय केवल बैलेंस शीट के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि बैंक की भविष्य की संभावनाओं पर भी विचार किया गया है।
इस पूरे विनिवेश प्रक्रिया में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड की भूमिका भी बेहद अहम मानी जा रही है। सेबी के ओपन ऑफर प्राइसिंग मैकेनिज्म को रिजर्व प्राइस तय करने के लिए एक मानक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अल्पसंख्यक शेयरधारकों के हितों की अनदेखी न हो और उन्हें भी उचित मूल्य मिले।
आईडीबीआई बैंक के विनिवेश की प्रक्रिया अक्टूबर 2022 में शुरू हुई थी। शुरुआत में उम्मीद जताई जा रही थी कि यह सौदा अपेक्षाकृत जल्दी पूरा हो जाएगा, लेकिन सरकार द्वारा संभावित खरीदारों के लिए नियमों और शर्तों को आसान बनाने के कारण इसमें देरी होती चली गई। इन कदमों का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा गंभीर निवेशकों को आकर्षित करना था, ताकि प्रतिस्पर्धा बढ़े और सरकार को बेहतर मूल्य मिल सके।
विनिवेश और संपत्ति मुद्रीकरण सरकार के लिए राजकोषीय प्रबंधन का एक अहम साधन बन चुका है। सरकार ने वित्तीय वर्ष 2027 तक विनिवेश और संपत्ति मुद्रीकरण के जरिए 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य में आईडीबीआई बैंक का सौदा एक बड़ा योगदानकर्ता साबित हो सकता है। बजट के बाद एक बातचीत में निवेश और लोक संपत्ति प्रबंधन विभाग के सचिव अरुणिश चावला ने स्पष्ट किया था कि आईडीबीआई बैंक का रणनीतिक विनिवेश तीसरे चरण में पहुंच चुका है। इसका मतलब है कि तकनीकी और वित्तीय बोलियां मंगाई जा चुकी हैं और प्रक्रिया अब अंतिम दिशा में बढ़ रही है।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मौजूदा वित्तीय वर्ष के खत्म होने से पहले इस सौदे को लेकर और स्पष्टता सामने आ सकती है। इससे बाजार और निवेशकों को भी यह अंदाजा मिल सकेगा कि आईडीबीआई बैंक का भविष्य किस दिशा में जाने वाला है।
हालांकि, बोली प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी रास्ता पूरी तरह आसान नहीं है। जो भी कंपनी या बैंक आईडीबीआई बैंक को खरीदेगा, उसे भारतीय रिजर्व बैंक से अंतिम मंजूरी लेनी होगी। आरबीआई यह जांच करेगा कि संभावित खरीदार बैंकिंग नियामक के ‘फिट एंड प्रॉपर’ मानकों पर खरा उतरता है या नहीं। यह मानक यह सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं कि बैंक का नियंत्रण किसी ऐसे हाथ में न जाए, जो वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम बन सकता हो।
इसके अलावा, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग सहित अन्य वैधानिक और नियामक संस्थाओं से भी मंजूरी लेनी होगी। इन सभी प्रक्रियाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सौदा पारदर्शी रहे और बैंकिंग प्रणाली पर इसका नकारात्मक असर न पड़े। सफल बोली लगाने वाले को आईडीबीआई बैंक के अल्पसंख्यक शेयरधारकों के लिए ओपन ऑफर भी देना होगा, जिससे उन्हें भी अपनी हिस्सेदारी बेचने का अवसर मिल सके।
कोटक महिंद्रा बैंक और फेयरफैक्स फाइनेंशियल, दोनों ही इस सौदे के लिए मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं। कोटक महिंद्रा बैंक के लिए यह सौदा घरेलू बैंकिंग बाजार में अपनी मौजूदगी को और मजबूत करने का अवसर हो सकता है। वहीं, प्रेमा वाट्स की फेयरफैक्स फाइनेंशियल पहले से ही भारत के वित्तीय क्षेत्र में कई निवेश कर चुकी है और आईडीबीआई बैंक में हिस्सेदारी उसे दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ दे सकती है।
आईडीबीआई बैंक का इतिहास भी इस सौदे को खास बनाता है। एक समय देश का प्रमुख विकास वित्तीय संस्थान रहा यह बैंक बाद में गंभीर संकट में फंस गया था। सरकार और एलआईसी द्वारा समय-समय पर पूंजी डालकर इसे संभाला गया, लेकिन अब नीति स्पष्ट है कि सरकार बैंकिंग कारोबार से धीरे-धीरे बाहर निकलना चाहती है।
इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आईडीबीआई बैंक की नीलामी केवल एक कारोबारी सौदा नहीं है, बल्कि यह भारत के बैंकिंग सुधारों की दिशा में एक बड़ा कदम है। आने वाले दिनों में जैसे-जैसे बोली प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, बाजार, निवेशक और बैंकिंग सेक्टर से जुड़े सभी लोग इस पर करीबी नजर बनाए रखेंगे।
