हिंदी सिनेमा का इतिहास सितारों के उदय और पतन से भरा रहा है, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे हैं जो दशकों तक दर्शकों की स्मृति और भावनाओं में स्थायी रूप से दर्ज हो जाते हैं। शाहरुख खान, सलमान खान और आमिर खान न सिर्फ सुपरस्टार हैं, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की सिनेमाई पहचान भी रहे हैं। पिछले तीस वर्षों में इन तीनों ने न जाने कितनी ही ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं, ट्रेंड सेट किए और करोड़ों दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाए। एक समय ऐसा था जब इनका नाम ही फिल्म की सफलता की गारंटी माना जाता था।

लेकिन समय स्थिर नहीं रहता। दर्शक बदलते हैं, उनकी अपेक्षाएं बदलती हैं और मनोरंजन के साधन भी बदल जाते हैं। इसी बदलते दौर पर आमिर खान के भांजे और अभिनेता इमरान खान ने बेहद साफ, लेकिन संवेदनशील टिप्पणी की है। इमरान खान का मानना है कि अब उस पीढ़ी के सुपरस्टार्स के लिए अपनी उम्र को स्वीकार करने और उसी के अनुरूप किरदार चुनने का समय आ चुका है।
इमरान खान ने हाल ही में बातचीत के दौरान कहा कि किसी भी अभिनेता के करियर में एक स्वाभाविक चक्र होता है। एक दौर आता है जब वह लीड हीरो के रूप में सबसे आगे होता है, लेकिन एक उम्र के बाद वही भूमिकाएं निभाना दर्शकों के लिए विश्वसनीय नहीं रह जाता। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि युवा पीढ़ी शायद 70 साल के व्यक्ति की कहानी में खुद को नहीं देख पाती।
उनके इस बयान ने बॉलीवुड और दर्शकों के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सवाल यह नहीं है कि शाहरुख, सलमान या आमिर की लोकप्रियता खत्म हो गई है। सवाल यह है कि क्या आज का युवा दर्शक उसी तरह से उनसे जुड़ पाता है, जैसे पहले जुड़ता था।
इमरान खान ने स्टारडम की बदलती प्रकृति को बहुत सहज ढंग से समझाया। उनके अनुसार हर अभिनेता के साथ एक खास पीढ़ी बड़ी होती है। वह पीढ़ी उस अभिनेता को अपने जीवन के अनुभवों से जोड़ती है। लेकिन समय के साथ नई पीढ़ी आती है, जिनकी प्राथमिकताएं अलग होती हैं। वे खुद जैसी उम्र, सोच और संघर्ष वाले किरदारों को देखना चाहते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि जब हम फिल्म या वेब शो देखते हैं, तो सबसे पहले हम खुद को उस कहानी में खोजते हैं। हम ऐसे किरदार से जुड़ते हैं जो हमारी उम्र, हमारे सपनों और हमारे अनुभवों के करीब हो। यही कारण है कि आज के युवा दर्शक उन कहानियों की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं जिनमें नए चेहरे और नई संवेदनाएं दिखाई देती हैं।
तीनों खानों की उम्र अब साठ के पार हो चुकी है। उन्होंने अपने करियर में लगभग तीस वर्षों का अद्वितीय स्टारडम देखा है, जिसकी बराबरी करना किसी भी अभिनेता के लिए आसान नहीं है। इमरान खान मानते हैं कि यह सफर अपने आप में एक उपलब्धि है, लेकिन इसके साथ ही भूमिकाओं में बदलाव भी उतना ही जरूरी है।
अगर हाल के बॉक्स ऑफिस रुझानों को देखा जाए तो इमरान खान की बातों में दम नजर आता है। शाहरुख खान ने फिल्म ‘जीरो’ के बाद लंबा ब्रेक लिया और जब उन्होंने वापसी की तो ‘पठान’ और ‘जवान’ जैसी एक्शन फिल्मों के जरिए की। इन फिल्मों में उनका किरदार उम्र के बावजूद बड़े पैमाने पर प्रस्तुत किया गया, जिसमें कहानी से ज्यादा स्टार पावर पर जोर था। दर्शकों ने इसे स्वीकार किया और फिल्में बड़ी हिट साबित हुईं।
लेकिन उसी वर्ष रिलीज हुई ‘डंकी’ बॉक्स ऑफिस पर वैसा प्रभाव नहीं छोड़ पाई। इसकी कहानी और प्रस्तुति दर्शकों को उस स्तर पर नहीं जोड़ सकी, जैसा पहले की फिल्मों में होता था। इससे यह संकेत मिलता है कि अब केवल स्टार होना ही काफी नहीं है।
आमिर खान के करियर में भी यही बदलाव दिखता है। ‘लाल सिंह चड्ढा’ जैसी फिल्म, जिसमें आमिर को एक युवा किरदार के रूप में पेश करने की कोशिश की गई, दर्शकों को प्रभावित नहीं कर सकी। वहीं ‘सितारे जमीन पर’ को अपेक्षाकृत बेहतर प्रतिक्रिया मिली, क्योंकि उसमें आमिर को एक स्टार हीरो की छवि से हटकर देखा गया।
सलमान खान का करियर भी 2018 के बाद लगातार संघर्ष करता नजर आया है। उनकी कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर उम्मीदों पर खरी नहीं उतरीं। ‘टाइगर 3’ के बाद भी उनकी फिल्मों को वैसी सफलता नहीं मिली, जैसी एक समय पर उनकी पहचान थी। इसका मतलब यह नहीं कि दर्शक सलमान खान को नापसंद करने लगे हैं, बल्कि यह दर्शाता है कि दर्शक अब कहानी और किरदार को ज्यादा महत्व देने लगे हैं।
इमरान खान की बातों का सार यही है कि उम्र के साथ अभिनेता की भूमिका बदलनी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें स्क्रीन से गायब हो जाना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने अनुभव और उम्र के अनुरूप किरदारों में खुद को ढालना चाहिए। पिता, मार्गदर्शक, ग्रे शेड वाले किरदार या कहानी के केंद्र में एक मजबूत लेकिन उम्रदराज पात्र के रूप में वे आज भी दर्शकों को प्रभावित कर सकते हैं।
हिंदी सिनेमा अब सिर्फ बड़े पर्दे तक सीमित नहीं है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने दर्शकों को विकल्प दिए हैं और नई पीढ़ी को नई कहानियां देखने की आजादी दी है। ऐसे में सुपरस्टार्स के लिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि वे बदलते दर्शक मनोविज्ञान को समझें।
इमरान खान खुद लंबे समय से फिल्मों से दूर हैं, लेकिन उनकी यह टिप्पणी बताती है कि वह सिनेमा को एक दर्शक और अभिनेता दोनों के नजरिए से समझते हैं। उनकी बात किसी आलोचना से ज्यादा एक सलाह के रूप में देखी जानी चाहिए।
यह बयान दरअसल हिंदी सिनेमा के एक संक्रमणकाल की ओर इशारा करता है, जहां स्टारडम की परिभाषा बदल रही है। अब दर्शक नाम नहीं, बल्कि कहानी देखने सिनेमाघर जाता है। यही बदलाव आने वाले समय में बॉलीवुड की दिशा तय करेगा।
