पाकिस्तान की राजनीतिक धरातल पर इन दिनों एक बार फिर घनी बादलों जैसी बेचैनी तैरती दिख रही है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान, जो कई महीनों से अडियाला जेल में बंद हैं, एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चाओं, आरोपों, तनाव और राजनीतिक टकराव के केंद्र में आ गए हैं। लेकिन इस बार मामला किसी चुनावी भाषण, किसी विवादास्पद नीति या किसी बड़े राजनैतिक कदम को लेकर नहीं है, बल्कि उनके अपने परिवार के उस दर्द से जुड़ा है जो जेल प्रशासन और सरकार के रवैए के कारण और गहरा होता जा रहा है।

रावलपिंडी की अडियाला जेल के बाहर ठंडी रात में इमरान खान की बहनें, उनकी पार्टी के नेता और समर्थक खुले आसमान के नीचे बैठ गए। उन्हें शिकायत थी कि अदालत के आदेश के बावजूद उन्हें इमरान खान से मिलने से रोक दिया गया है। पाकिस्तान की राजनीति में उभरते इस करुण दृश्य ने अचानक पूरे वातावरण को ऐसा संघर्षमय बना दिया, जहां संवेदनाएं राजनीति पर भारी पड़ती नजर आईं। इससे पहले भी कई बार मुलाकात पर रोक लगाई गई थी, लेकिन इस बार बहनों ने ऐलान कर दिया कि वे वहीं बैठी रहेंगी, चाहे रात कितनी ही ठंडी क्यों न हो, चाहे प्रशासन उन्हें कितना ही दबाव में लेना चाहे।
अदालत के आदेश की अनदेखी और प्रशासन की चुप्पी
जैसे ही खबर आई कि अदालत ने इमरान खान के परिवार को उनसे मिलने की इजाजत दी है, उनके समर्थकों के चेहरे पर कुछ राहत दिखाई दी। लेकिन यह राहत क्षणिक थी। जेल अधिकारियों ने मुलाकात कराना फिर मना कर दिया। परिवार और PTI नेताओं ने इसका जमकर विरोध किया और कहा कि यह न सिर्फ अदालत के आदेश का उल्लंघन है बल्कि यह पूरी तरह राजनीतिक प्रतिशोध है।
अलीमा खान, जो आंदोलन का नेतृत्व कर रही थीं, रातभर जेल के सामने बैठी रहीं। यह सिर्फ विरोध नहीं था, बल्कि एक प्रतीक था — एक बहन का प्रतिकार, एक परिवार का दर्द और एक राजनीतिक लड़ाई का नया अध्याय। उन्होंने साफ कहा कि सरकार कानून तोड़ रही है और वे हर हाल में अपने भाई से मिलने का अधिकार चाहती हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जेल में इमरान खान के साथ उचित व्यवहार नहीं किया जा रहा और उन्हें मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है।
सरकार और सेना पर गंभीर आरोप
इमरान खान की बहनों और उनकी पार्टी ने सीधे-सीधे आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार और सेना प्रमुख इमरान खान के साथ अन्याय कर रहे हैं। उनका कहना है कि राजनीतिक विरोध और सत्ता के दबाव में जिस तरह से इमरान खान को अलग-थलग रखा जा रहा है, वह एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह वही इमरान खान हैं जिन्होंने क्रिकेट के मैदान पर विश्व कोरवाने वाला नेतृत्व दिखाया, फिर राजनीति में एक बड़ी जनशक्ति बनकर सामने आए और अब जेल में फंसे हुए हैं।
उनके समर्थकों का तर्क है कि किसी कैदी को परिवार, वकीलों और अपने डॉक्टर से मिलने देना एक बुनियादी हक है, और इसे रोकना किसी भी संवैधानिक नियम का हिस्सा नहीं हो सकता। लेकिन सरकार और जेल प्रशासन चुप्पी साधे हुए हैं, जिससे संदेह और बढ़ जाता है।
जेल के बाहर रात भर का धरना और तनावपूर्ण माहौल
अडियाला जेल के बाहर रातभर का वह दृश्य किसी आंदोलन से कम नहीं था। सैकड़ों लोग ज़मीन पर बैठकर विरोध कर रहे थे, ठंडी हवाओं में लिपटे हुए, लेकिन अपने उद्देश्य में दृढ़। हर कोई यही कह रहा था कि इमरान खान को अकेला रखना बंद किया जाए। उनके समर्थकों ने कहा कि यह राजनीतिक लड़ाई नहीं है, बल्कि इंसानियत की लड़ाई है।
जेल के बाहर सुरक्षा बलों की भारी तैनाती थी। पुलिसकर्मियों को हर वक्त चौकन्ना रहना पड़ रहा था क्योंकि भीड़ कभी भी उग्र हो सकती थी। लेकिन इस भीड़ में गुस्सा नहीं था, बल्कि एक शांत दृढ़ता थी, जो किसी सत्याग्रह की तरह महसूस हो रही थी।
अलीमा खान ने अपने भाषण में कहा कि वे इस अन्याय के सामने झुकने वाली नहीं हैं। उन्होंने कहा कि चाहे उन्हें डंडे मारे जाएं या गोली चलाने की धमकी दी जाए, वे अपने भाई से मिलने के हक के लिए वहां बैठी रहेंगी। उनकी आवाज में एक बहन का दर्द भी था और एक जिम्मेदार नागरिक का साहस भी।
पिछली मुलाकात में उजमा खान के आरोप
कुछ दिन पहले इमरान खान की उनकी बहन उजमा खान से मुलाकात कराई गई थी। उस मुलाकात के बाद उजमा ने बताया कि इमरान खान शारीरिक रूप से ठीक लग रहे थे, लेकिन उन्हें उचित चिकित्सकीय सुविधा नहीं दी जा रही। यह जानकारी सामने आते ही लोगों का गुस्सा और बढ़ गया था।
उन्होंने यह भी शिकायत की कि पिछले 14 महीनों से इमरान खान को उनके निजी डॉक्टर से मिलने नहीं दिया गया है, जबकि अदालत ने इसकी अनुमति कई बार दी थी। इस तरह की बातें यह बताती हैं कि जेल प्रशासन पर सवाल उठाने के लिए पर्याप्त कारण मौजूद हैं।
PTI नेताओं का विरोध और राजनीतिक तीक्ष्णता
PTI नेताओं ने खुलकर कहा कि यह मुलाकात रोकना राजनीतिक दुश्मनी की सीमा है। उनका कहना है कि राजनीति में मतभेद होते हैं, लेकिन परिवार से मिलने, डॉक्टर से इलाज कराने और वकील से बात करने के अधिकार पर रोक नहीं लगाई जा सकती।
गौहर अली खान ने कहा कि यदि मुलाकात कराई जाए तो माहौल शांत हो सकता है, लेकिन सरकार इसे जानबूझकर रोक रही है ताकि तनाव बना रहे। यह बयान पाकिस्तान की राजनीति में सेनानी व्यूह की ओर संकेत करता है, जहां सत्ता, फैसलों और दबाव की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।
अडियाला जेल के बाहर उभरते सवाल
पूरे घटनाक्रम में एक सवाल सबसे ज्यादा गूंज रहा है — आखिर इमरान खान से मिलने में इतनी पाबंदी क्यों? यदि सब कुछ सही है, यदि इमरान खान जेल में सुरक्षित हैं, यदि कोई दुर्व्यवहार नहीं हो रहा, तो मुलाकात से डर किस बात का है?
इस सवाल का जवाब कोई भी जिम्मेदार संस्था सामने नहीं ला रही। यह मौन ही पूरे मामले को और संदिग्ध बना देता है। पाकिस्तान में इससे पहले भी कई बार नेताओं को जेल में खराब स्थिति झेलनी पड़ी है, लेकिन इमरान खान के मामले ने इसे राष्ट्रीय विवाद का रूप दे दिया है।
जनता की प्रतिक्रिया और देशभर में मचे सवाल
घटना के बाद पाकिस्तान के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उबल पड़े। लोग इमरान खान की बहनों की हिम्मत की तारीफ कर रहे हैं, वहीं सरकार और सेना की आलोचना भी कर रहे हैं। देशभर में लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह लोकतंत्र का तरीका है? क्या एक परिवार को अपने ही सदस्य से मिलने से रोक देना न्यायोचित है?
कई लोग यह भी कह रहे हैं कि यह लड़ाई अब इमरान खान की नहीं है, बल्कि पाकिस्तान के आम नागरिक के अधिकारों की लड़ाई बन चुकी है। न्याय और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए यह संघर्ष एक बड़े सामाजिक संदेश का रूप ले रहा है।
