भारत के औद्योगिक और विमानन इतिहास में वर्ष 2026 एक ऐसे मोड़ के रूप में दर्ज होने जा रहा है, जिसने देश को केवल विमानों का उपभोक्ता नहीं बल्कि निर्माता बनाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ा दिया है। देश के सबसे बड़े निजी एयरपोर्ट ऑपरेटर अडानी ग्रुप ने अब आसमान की दुनिया में अपनी मौजूदगी को एक नए स्तर पर पहुंचाने का फैसला किया है। अडानी एयरोस्पेस एंड डिफेंस ने ब्राजील की प्रतिष्ठित विमान निर्माता कंपनी एम्ब्रेयर के साथ मिलकर भारत में कमर्शियल एयरक्राफ्ट असेंबल और निर्माण की दिशा में समझौता किया है। यह साझेदारी न केवल औद्योगिक दृष्टि से अहम है, बल्कि यह भारत के आत्मनिर्भरता के सपने को भी मजबूती देती है।

मेक इन इंडिया को मिले नए पंख
यह करार भारत सरकार की मेक इन इंडिया पहल के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य देश को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाना है। अब तक भारत में हवाई जहाजों का निर्माण सीमित दायरे में रहा है और देश को एयरबस या बोइंग जैसी विदेशी कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ा है। अडानी और एम्ब्रेयर की यह पहल इस निर्भरता को धीरे-धीरे कम करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। खास बात यह है कि इस साझेदारी के जरिए रीजनल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट यानी छोटे और मध्यम दूरी के यात्री विमानों के निर्माण पर फोकस किया जाएगा, जो भारत जैसे विशाल और विविध भूगोल वाले देश के लिए बेहद जरूरी हैं।
समझौते की घोषणा और सरकारी उपस्थिति
इस ऐतिहासिक समझौते की घोषणा नागरिक उड्डयन मंत्रालय में केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू की मौजूदगी में की गई। यह संकेत देता है कि सरकार भी इस परियोजना को रणनीतिक महत्व की नजर से देख रही है। अडानी ग्रुप के लिए यह कदम केवल एक कारोबारी विस्तार नहीं बल्कि भारत के विमानन इकोसिस्टम को मजबूत करने का प्रयास है। अडानी एयरोस्पेस एंड डिफेंस के निदेशक जीत अडानी ने कहा कि आने वाले महीनों में इस परियोजना की समय-सीमा, स्थान और अन्य तकनीकी पहलुओं को अंतिम रूप दिया जाएगा।
दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी विमान निर्माता कंपनी से साझेदारी
एम्ब्रेयर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी विमान निर्माता कंपनी है, जो एयरबस और बोइंग के बाद इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पहचान रखती है। ब्राजील की यह कंपनी दशकों से कमर्शियल, डिफेंस और बिजनेस जेट्स के क्षेत्र में सक्रिय है। अडानी ग्रुप के साथ उसकी साझेदारी भारत के लिए तकनीकी विशेषज्ञता, वैश्विक अनुभव और उच्च गुणवत्ता मानकों को लेकर आएगी। यह सहयोग केवल असेंबली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि धीरे-धीरे पूर्ण निर्माण और सप्लाई चेन के विकास की ओर बढ़ेगा।
कहां लगेगी फैक्ट्री, अभी सस्पेंस बरकरार
हालांकि इस करार की घोषणा के साथ ही एक सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है कि विमान निर्माण की फैक्ट्री भारत के किस हिस्से में लगेगी। इस बारे में अभी अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। एम्ब्रेयर ने स्पष्ट किया है कि साझेदारी की संरचना और स्थान को लेकर बातचीत जारी है। संभावना जताई जा रही है कि यह फैक्ट्री ऐसे राज्य में स्थापित की जाएगी जहां पहले से औद्योगिक बुनियादी ढांचा, कुशल श्रम और लॉजिस्टिक सुविधा मौजूद हो। गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्य इस दौड़ में माने जा रहे हैं, हालांकि आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।
एक पूरा विमानन इकोसिस्टम बनाने की तैयारी
अडानी और एम्ब्रेयर की योजना केवल विमान असेंबल करने तक सीमित नहीं है। दोनों कंपनियां मिलकर रीजनल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के लिए एक संपूर्ण इकोसिस्टम विकसित करना चाहती हैं। इसमें विमान निर्माण के साथ-साथ सप्लाई चेन, आफ्टरमार्केट सर्विस, मेंटेनेंस रिपेयर एंड ओवरहॉल, पायलट ट्रेनिंग और तकनीकी सपोर्ट शामिल होंगे। इसका मतलब है कि भारत में न केवल विमान बनेंगे बल्कि उनके रखरखाव और संचालन से जुड़ा पूरा ढांचा भी विकसित होगा।
भारत का तेजी से बढ़ता विमानन बाजार
भारत आज दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते नागरिक उड्डयन बाजारों में से एक है। नागरिक उड्डयन सचिव समीर कुमार सिन्हा ने इस मौके पर कहा कि देश में हवाई अड्डों के बुनियादी ढांचे का अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है और माल ढुलाई में भी तेजी आई है। भारतीय एयरलाइनों ने आने वाले वर्षों के लिए 1,800 से अधिक विमानों का ऑर्डर दिया है, जो इस क्षेत्र की विशाल संभावनाओं को दर्शाता है।
रीजनल कनेक्टिविटी को मिलेगा बड़ा फायदा
छोटे और मध्यम दूरी के विमान भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए रीढ़ की हड्डी साबित हो सकते हैं। देश के कई छोटे शहर और दूरदराज के इलाके अभी भी हवाई नेटवर्क से पूरी तरह जुड़े नहीं हैं। स्थानीय स्तर पर बने रीजनल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट न केवल लागत कम करेंगे बल्कि उड़ानों की उपलब्धता भी बढ़ाएंगे। इससे उड़ान योजना जैसी सरकारी पहलों को भी मजबूती मिलेगी।
रोजगार और कौशल विकास का नया अवसर
इस परियोजना से भारत में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन होने की उम्मीद है। विमान निर्माण एक उच्च तकनीकी क्षेत्र है, जिसमें इंजीनियरिंग, डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और मेंटेनेंस जैसे कई कौशलों की जरूरत होती है। अडानी-एम्ब्रेयर साझेदारी से हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा हो सकते हैं। इसके साथ ही भारतीय युवाओं को अत्याधुनिक एयरोस्पेस तकनीक में प्रशिक्षण का अवसर मिलेगा।
एम्ब्रेयर की भारत में पहले से मौजूदगी
एम्ब्रेयर भारत के लिए कोई नई कंपनी नहीं है। इसके लगभग 50 विमान पहले से ही देश में विभिन्न भूमिकाओं में उपयोग किए जा रहे हैं। भारतीय वायु सेना, सरकारी एजेंसियां और क्षेत्रीय एयरलाइन स्टार एयर इसके विमानों का संचालन करती हैं। कंपनी ने पहले भी मेक इन इंडिया के तहत महिंद्रा ग्रुप के साथ साझेदारी में सैन्य परिवहन विमान C-390 मिलेनियम की पेशकश की थी। इससे यह साफ है कि एम्ब्रेयर लंबे समय से भारत को एक रणनीतिक बाजार के रूप में देखती रही है।
अडानी ग्रुप की बदलती रणनीति
अडानी ग्रुप ने पिछले एक दशक में ऊर्जा, बंदरगाह, एयरपोर्ट, रक्षा और डेटा सेंटर जैसे क्षेत्रों में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है। अब विमान निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाकर समूह ने यह संकेत दे दिया है कि वह केवल इंफ्रास्ट्रक्चर तक सीमित नहीं रहना चाहता। एयरपोर्ट खरीदने के बाद अब एयरक्राफ्ट निर्माण में प्रवेश करना उसकी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
वैश्विक स्तर पर भारत की नई पहचान
यदि यह परियोजना अपने तय लक्ष्यों के अनुरूप आगे बढ़ती है, तो भारत धीरे-धीरे वैश्विक विमान निर्माण मानचित्र पर अपनी अलग पहचान बना सकता है। आज जहां दुनिया के अधिकांश देश विमान निर्माण के लिए कुछ चुनिंदा देशों पर निर्भर हैं, वहीं भारत इस क्षेत्र में एक वैकल्पिक केंद्र बन सकता है। इससे न केवल विदेशी निवेश आकर्षित होगा बल्कि तकनीकी आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी।
भविष्य की उड़ान की ओर भारत
अडानी और एम्ब्रेयर की यह साझेदारी केवल एक कारोबारी समझौता नहीं है, बल्कि यह भारत के भविष्य की उड़ान का संकेत है। यह कदम देश को तकनीकी रूप से मजबूत बनाने, रोजगार बढ़ाने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे लाने की दिशा में अहम साबित हो सकता है। आने वाले वर्षों में जब भारत में बने विमान भारतीय आसमान में उड़ान भरेंगे, तो यह क्षण देश के औद्योगिक इतिहास में गर्व के रूप में दर्ज होगा।
