भारत ने हाल ही में ब्रिक्स देशों द्वारा आयोजित सैन्य अभ्यासों में शामिल न होने का निर्णय लिया है, जो वैश्विक राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह कदम केवल भारत की सैन्य नीति नहीं बल्कि उसके अंतरराष्ट्रीय संबंधों और रणनीतिक संतुलन का भी प्रतीक माना जा रहा है।

नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के भू-राजनीतिक विश्लेषक हर्ष पंत के अनुसार, भारत का यह निर्णय अमेरिका के साथ संबंधों को संतुलित करने से जुड़ा हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत ब्रिक्स के सैन्य अभ्यासों में शामिल नहीं होगा क्योंकि यह ब्रिक्स की मूल संरचना और उद्देश्यों के अनुरूप नहीं है।
ब्रिक्स का मूल स्वरूप और उद्देश्य
ब्रिक्स, जो ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के समूह को संदर्भित करता है, का मूल उद्देश्य सैन्य गठबंधन नहीं बल्कि आर्थिक और विकासात्मक सहयोग है। यह एक अंतर-सरकारी साझेदारी है जो आर्थिक सहयोग, व्यापार और विकासशील देशों के लिए साझा अवसर प्रदान करने पर केंद्रित है।
हर्ष पंत ने कहा कि ब्रिक्स का जनादेश सैन्य प्रयासों पर केंद्रित नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य पश्चिमी देशों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना और विकासशील देशों के बीच साझा आर्थिक रणनीति बनाना है। इस दृष्टिकोण से भारत के लिए यह स्पष्ट हो गया कि ब्रिक्स के युद्धाभ्यासों में शामिल होना व्यावहारिक और नैतिक दोनों दृष्टियों से उपयुक्त नहीं होगा।
ब्रिक्स प्लस और वैश्विक मतभेद
ब्रिक्स ने अपने नेटवर्क का विस्तार करते हुए ब्रिक्स प्लस में अन्य देशों को शामिल किया है, जिनमें यूएई, ईरान, मिस्र और अन्य विकासशील देश शामिल हैं। हालांकि, हर्ष पंत के अनुसार, इन देशों के बीच महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामरिक मतभेद मौजूद हैं। उदाहरण के लिए, यूएई और ईरान के बीच ऐतिहासिक और रणनीतिक मतभेद हैं, जो किसी भी समग्र सैन्य गठबंधन की प्रभावशीलता को सीमित करते हैं।
इस दृष्टि से भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके अंतरराष्ट्रीय संबंध और रणनीतिक निर्णय स्थिर और संतुलित रहें। यदि भारत इन सैन्य अभ्यासों में शामिल होता है, तो यह अमेरिका के साथ उसके संबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीतियों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकता है।
रणनीतिक स्थिरता और भारत की विदेश नीति
भारत ने हमेशा अपनी सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में संतुलन बनाए रखा है। चीन और रूस जैसे प्रमुख देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक संबंधों के बावजूद, भारत अमेरिका के साथ अपने सैन्य और सामरिक सहयोग को भी महत्व देता है। हर्ष पंत के अनुसार, ब्रिक्स के सैन्य अभ्यासों में शामिल न होने का निर्णय इस संतुलन का स्पष्ट उदाहरण है।
भारत के इस कदम से यह संदेश जाता है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों, अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारियों और रणनीतिक स्थिरता के लिए सतर्क और विवेकपूर्ण नीति अपनाता है।
व्यावहारिक और नैतिक दृष्टिकोण
हर्ष पंत ने यह भी बताया कि भारत के लिए यह निर्णय केवल रणनीतिक नहीं बल्कि नैतिक दृष्टिकोण से भी उपयुक्त है। ब्रिक्स देशों के बीच मौजूद मतभेद और विभिन्न राजनीतिक हित इसे एक दृढ़ सैन्य गठबंधन बनाने से रोकते हैं। इस परिदृश्य में भारत के लिए इसमें शामिल होना न केवल व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण है, बल्कि यह उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि और सहयोगी देशों के साथ संबंधों पर भी प्रभाव डाल सकता है।
भविष्य की दिशा
ब्रिक्स समूह और उसके विस्तार के बावजूद, भारत अब भी अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देता है। भारत ने अपने अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण में यह स्पष्ट कर दिया है कि वह सैन्य गठबंधन की तुलना में साझा विकास, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय स्थिरता पर अधिक ध्यान देगा।
भारत के इस कदम से यह संदेश जाता है कि वह वैश्विक राजनीतिक माहौल में संतुलित और दूरदर्शी नीति अपनाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत अपने विकासशील देशों के सहयोगियों के साथ संबंध बनाए रखते हुए किसी भी सैन्य गतिविधि में शामिल होने से परहेज करता है, जो उसके वैश्विक हितों और नैतिक दृष्टिकोण से मेल खाती है।
