नई दिल्ली में बुधवार का दिन देश की प्रगति और रणनीतिक बदलावों के लिए बेहद अहम साबित हुआ। केंद्र सरकार ने उन चार बड़ी परियोजनाओं को मंजूरी दी, जो न केवल भारत की अर्थव्यवस्था की गति बढ़ाएंगी, बल्कि आने वाले वर्षों में वैश्विक स्तर पर उसकी तकनीकी ताकत को भी नए आयाम देंगी। इन परियोजनाओं का कुल निवेश लगभग 19,919 करोड़ रुपये है, और इनमें से सबसे चर्चित है रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स की घरेलू निर्माण क्षमता विकसित करने की ऐतिहासिक योजना। यह वही क्षेत्र है, जिस पर आज तक पूरी दुनिया का सबसे बड़ा नियंत्रण चीन के पास रहा है।

भारत के इस कदम को विशेषज्ञ चीन के आर्थिक प्रभुत्व को चुनौती देने वाला निर्णय मान रहे हैं। इसके अलावा पुणे मेट्रो के दूसरे चरण का विस्तार और दो बड़ी रेलवे परियोजनाओं को मंजूरी देकर केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि आने वाले वर्षों में आधारभूत संरचना, स्वदेशी उत्पादन और पर्यावरणीय संतुलन, तीनों को साथ लेकर आगे बढ़ाया जाएगा।
रेयर अर्थ मैग्नेट: चीन की पकड़ तोड़ने की दिशा में भारत का निर्णायक निर्णय
दुर्लभ पृथ्वी धातुओं पर चीन का कब्जा सिर्फ खनन तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग और मैग्नेट निर्माण तक फैला हुआ है। इलेक्ट्रिक वाहनों से लेकर रक्षा उपकरणों तक, रेयर अर्थ मैग्नेट्स आधुनिक तकनीकी दुनिया की रीढ़ माने जाते हैं। वर्षों से अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे देश चीन पर निर्भरता कम करने के उपाय खोज रहे हैं, लेकिन इतने विशाल स्तर पर उत्पादन क्षमता बनाना किसी भी देश के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है।
इन्हीं परिस्थितियों में भारत ने एक ऐसा निर्णय लिया है, जिसे विशेषज्ञ “गेम चेंजर” बता रहे हैं।
केंद्रीय मंत्री ने घोषणा की कि कैबिनेट ने सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट्स यानी REPM के निर्माण के लिए 7,280 करोड़ रुपये की एक व्यापक योजना को मंजूरी दी है। यह योजना भारत में पूरे वैल्यू चेन को स्थापित करेगी, जिसमें रेयर अर्थ ऑक्साइड की प्रोसेसिंग से लेकर धातुकर्म, मिश्रधातु निर्माण और अंततः उच्च गुणवत्ता वाले मैग्नेट्स का उत्पादन शामिल होगा।
योजना के अनुसार देश में लगभग 6,000 MTPA की एकीकृत मैग्नेट निर्माण क्षमता विकसित की जाएगी। यह क्षमता पाँच अलग-अलग इकाइयों में स्थापित होगी, और प्रत्येक की क्षमता लगभग 1,200 MTPA होगी। इन इकाइयों के निर्माण में शुरुआती दो वर्ष लगेंगे और फिर पाँच वर्षों तक इस योजना के तहत उत्पादन को गति दी जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम भारत को न केवल आयात निर्भरता से मुक्त करेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर उच्च-तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला में भारत की मजबूत उपस्थिति स्थापित करेगा।
क्यों खास है यह प्रोजेक्ट?
रेयर अर्थ मैग्नेट्स का उपयोग आज लगभग हर आधुनिक तकनीक में होता है। मोबाइल फोन, पवन ऊर्जा टर्बाइनें, MRI जैसे मेडिकल उपकरण, इलेक्ट्रिक वाहनों के मोटर, ड्रोन, मिसाइल गाइडेंस सिस्टम और हज़ारों प्रकार की मशीनें इन्हीं पर आधारित होती हैं। यह उद्योग रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील भी है क्योंकि रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा इससे गहराई से जुड़ी हुई हैं।
भारत इन मैग्नेट्स के लिए अब तक लगभग पूरी तरह चीन पर निर्भर था। ऐसे में यह प्रोजेक्ट राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और टेक्नोलॉजिकल स्वतंत्रता के लिए एक निर्णायक कदम माना जा रहा है।
पुणे मेट्रो का विस्तार: बढ़ती आबादी और ट्रैफिक को मिलेगी राहत
बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में भी कैबिनेट ने अहम निर्णय लिया है। पुणे शहर, जो एक प्रमुख आईटी हब, शिक्षा केंद्र और तेजी से विस्तार कर रहे महानगर के रूप में उभर रहा है, लंबे समय से बेहतर सार्वजनिक परिवहन की मांग कर रहा था। सरकार ने पुणे मेट्रो के चरण-2 के विस्तार को मंजूरी देकर इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है।
पुणे मेट्रो विस्तार के तहत दो नई मेट्रो लाइनों को मंजूरी दी गई है। इनमें खाराडी से खडकवासला तक लाइन 4 और नल स्टॉप से वारजे-माणिक बाग तक लाइन 4A शामिल हैं। यह पूरा विस्तार लगभग 9,857.85 करोड़ रुपये की लागत से अगले पाँच वर्षों में पूरा किया जाएगा।
कुल 31.6 किलोमीटर का नया एलिवेटेड नेटवर्क बनेगा, जिसमें 28 स्टेशन होंगे। यह नेटवर्क पुणे के आईटी कॉरिडोर, बिजनेस हब, प्रमुख शैक्षणिक संस्थान और भीड़-भाड़ वाले आवासीय क्षेत्रों को जोड़ देगा। इससे शहर में ट्रैफिक का दबाव घटेगा और लोगों की आवाजाही में बड़ी सुविधा होगी।
नई लाइनों का मौजूदा मेट्रो लाइनों से जुड़ना इसे और भी मजबूत बनाता है। नल स्टॉप और खाराडी बाईपास पर लाइन 2 से तथा स्वार्गेट पर लाइन 1 से यह नए मार्ग जुड़े होंगे। इससे अंतिम-मील कनेक्टिविटी को भी मजबूती मिलेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि पुणे की बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए यह विस्तार अत्यंत आवश्यक था। आईटी कंपनियाँ, स्टार्टअप्स और शिक्षा संस्थान इस शहर की पहचान रहे हैं, और तेज तथा सुविधाजनक पब्लिक ट्रांसपोर्ट का अभाव लंबे समय से बड़ी चुनौती बना हुआ था। नए फैसले इस समस्या को काफी हद तक खत्म कर सकते हैं।
रेलवे की दो बड़ी परियोजनाएं: कनेक्टिविटी और अर्थव्यवस्था को मिलेगी नई ऊर्जा
रेलवे के क्षेत्र में कैबिनेट ने दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं को मंजूरी दी है। पहली परियोजना देवभूमि द्वारका (ओखा) से कानालस के बीच रेलवे लाइन का दोहरीकरण है, जिसका बजट लगभग 1,457 करोड़ रुपये रखा गया है। दूसरी परियोजना मुंबई उपनगरीय क्षेत्र में बदलापुर और कर्जत के बीच तीसरी और चौथी लाइनों के निर्माण की है, जिसके लिए 1,324 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं।
इन दोनों परियोजनाओं की कुल लंबाई लगभग 224 किलोमीटर है और ये लगभग 585 गांवों को बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करेंगी। इससे माल ढुलाई की क्षमता बढ़ेगी और यात्री परिवहन भी अधिक सुगम होगा। इन परियोजनाओं के पूरा होने से न केवल ट्रेनों की गति में वृद्धि होगी, बल्कि भीड़भाड़ कम होने से यात्रा समय भी घटेगा।
सरकार का अनुमान है कि इन परियोजनाओं के पूरा होने से पर्यावरण को भी महत्वपूर्ण लाभ होगा। लगभग 3 करोड़ लीटर तेल आयात कम होने और 16 करोड़ किलोग्राम CO2 उत्सर्जन में कमी आने की उम्मीद है। यह प्रभाव लगभग 64 लाख पेड़ लगाने के बराबर है, जो भारत के जलवायु लक्ष्यों में अहम योगदान देगा।
कुल प्रभाव: आत्मनिर्भरता, रोजगार, विकास और वैश्विक पहचान
इन चारों परियोजनाओं का कुल निवेश लगभग 19,919 करोड़ रुपये है, लेकिन इनका प्रभाव इससे कहीं बड़ा है। रेयर अर्थ मैग्नेट्स की घरेलू निर्माण क्षमता विकसित होने से भारत की वैश्विक तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला में भूमिका मजबूत होगी। इससे देश में हजारों कुशल नौकरियां पैदा होंगी और हाई-टेक इंडस्ट्री की नई इकाइयाँ स्थापित होंगी।
पुणे मेट्रो के विस्तार से लाखों यात्रियों को राहत मिलेगी। शहर की आर्थिक गतिविधियां तेज होंगी, प्रदूषण कम होगा और ट्रैफिक का दबाव घटेगा। वहीं रेलवे परियोजनाएँ औद्योगिक क्षेत्रों को बेहतर कनेक्टिविटी देंगी, जिससे माल ढुलाई लागत कम होगी और व्यापार में तेजी आएगी। यह सब मिलकर भारत को आत्मनिर्भर और सक्षम बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
