भारत और रूस के बीच आर्थिक संबंध लगातार नई गति प्राप्त कर रहे हैं। इसी क्रम में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारत और यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन के बीच जल्द से जल्द वरीयता प्राप्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर होने का समर्थन किया है। यह समझौता न केवल भारत और रूस के रिश्तों का नया अध्याय खोलेगा बल्कि आर्थिक दृष्टि से पांच देशों के समूह को भी एक नए व्यापारिक मोड़ तक पहुंचाएगा। यूरेशियन आर्थिक संघ, जिसमें रूस, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, आर्मेनिया और बेलारूस शामिल हैं, आज वैश्विक व्यापार में एक प्रभावशाली गठजोड़ माना जाता है। हाल के महीनों में इस संघ की भारत में रुचि बढ़ी है और भारत भी इस क्षेत्र को अपने रणनीतिक साझेदारों की सूची में तेजी से बढ़ावा दे रहा है।

इस समझौते की पहली औपचारिक बातचीत हाल ही में आयोजित हुई, जिसने दोनों पक्षों के बीच भविष्य के आर्थिक एजेंडे को स्पष्ट किया। भारत और यूरेशियन संघ ने बीते कुछ समय से कच्चे तेल, रक्षा सहयोग, ऊर्जा ट्रांसफर, तकनीकी विनिर्माण, फार्मा एक्सपोर्ट, चावल, खाद्य पदार्थ तथा सूचना तकनीक जैसी महत्वपूर्ण क्षेत्रों में व्यापार बढ़ाया है। यही कारण है कि इस समझौते को एक निर्णायक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।
समझौते की जरूरत और सामरिक महत्व
भारत आज वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक परिवर्तनों के बीच एक संतुलनकारी शक्ति की भूमिका निभा रहा है। पश्चिमी देशों के साथ रिश्तों के समानांतर भारत पूर्वी देशों और सेंट्रल एशिया की ओर भी साझेदारी बढ़ा रहा है। यूरेशियन आर्थिक संघ की भौगोलिक स्थिति इसे एशिया और यूरोप के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण व्यापारिक कॉरिडोर बनाती है। भारत के लिए यह अवसर है कि वह अपने निर्यात आधार को व्यापक क्षेत्र में विस्तार दे और ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता सुनिश्चित करे।
पिछले एक वर्ष में रूस से भारत को तेल आयात में लगभग तीन गुना वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं रूस भी भारत से औद्योगिक उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स और कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ाने को इच्छुक है। लेकिन वर्तमान में भुगतान प्रणाली, शिपिंग बीमा और मुद्रा विनिमय की बाधाएं सामने आती हैं। इस समझौते के बाद इन बाधाओं में कमी आएगी।
रूस के राष्ट्रपति ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों को व्यापारिक लेनदेन में अपनी स्थानीय मुद्रा के उपयोग का विस्तार करने की आवश्यकता है। उनका कहना था कि मुक्त व्यापार समझौता तभी सार्थक होगा, जब भुगतान प्रणाली निर्बाध रहे और वित्तीय लेनदेन बाहरी दबावों से मुक्त हों।
भारत और रूस का व्यापार लक्ष्य
पिछले वर्ष भारत और रूस के बीच व्यापार लगभग 70 बिलियन डॉलर के स्तर तक पहुंच गया था। यह भारत के लिए एक नए रिकॉर्ड के बराबर आंकड़ा माना जा रहा है। हालांकि भारत और रूस ने 2030 तक इस द्विपक्षीय व्यापार को 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए दोनों ओर से औद्योगिक विकास, प्रौद्योगिकी साझेदारी और इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट आवश्यक होंगे।
रूस लगातार तेल और गैस के निर्यात को बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। दूसरी ओर भारत अपने विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए रूस की तकनीक का लाभ उठाना चाहता है। विशेष रूप से रक्षा, विमानन, मशीन निर्माण, आईटी और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ रहा है।
यह भी उल्लेखनीय है कि भारत ने हाल ही में रूस के साथ कृषि समझौतों को मजबूत किया है, जिससे भारत ने गेहूं, सूरजमुखी तेल और विभिन्न दालों की आयात प्रक्रिया को सुगम बनाया है। वहीं रूस भारत से खाद्य उत्पादों के साथ-साथ कच्चे माल वाली दवाओं और इंजीनियरिंग उत्पादों की खरीद को बढ़ाने पर सहमत हुआ है।
यूरेशियन क्षेत्र में भारत की भूमिका
यूरेशियन क्षेत्र भारत के लिए केवल व्यापारिक महत्व नहीं रखता बल्कि सामरिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है। भारत की अफगानिस्तान और मध्य एशिया में पहुंच इसी क्षेत्र से होकर बनती है। भारत कुछ समय पहले अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे (International North South Transport Corridor) को सक्रिय रूप से आगे बढ़ा रहा है, जो रूस, ईरान और अजरबैजान के माध्यम से यूरोप तक जाता है।
इस गलियारे के सक्रिय होने के बाद भारत की व्यापार लागत लगभग 30 से 40 प्रतिशत तक कम हो सकती है। वहीं उत्पाद की आपूर्ति समय भी घट सकता है। इस गलियारे के शुरू होने के बाद चावल, गेहूं, कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक सामान, फार्मास्यूटिकल्स, स्टील, ऑटो पार्ट्स और कृषि उत्पादों के निर्यात में भारी उछाल आने का अनुमान है।
इस समझौते से न केवल भारतीय निर्यातकों को एक बड़ा बाजार मिलेगा बल्कि भारत को यूरेशियन देशों की ऊर्जा परियोजनाओं तक पहुंच आसान होगी।
औद्योगिक सहयोग का विस्तार
पुतिन ने अपने संबोधन में कहा कि भारत और रूस केवल व्यापार तक सीमित न रहें बल्कि औद्योगिक स्तर पर संयुक्त उत्पादन और तकनीकी विनिर्माण शुरू करें। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, मशीन लर्निंग, साइबर तकनीक, रक्षा तकनीक, कृषि प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष अनुसंधान में साझेदारी बढ़ाने को प्राथमिकता दी।
हाल ही में रूस ने भारत के लिए एक नए ऊर्जा संयंत्र के निर्माण का प्रस्ताव दिया है, जिसे एशिया का सबसे बड़ा ऊर्जा केंद्र माना जा रहा है। इसके अलावा रूस भारत में संयुक्त रूप से एलएनजी टर्मिनल स्थापित करने की तैयारी में है।
निष्कर्ष
भारत और यूरेशियन आर्थिक संघ का प्रस्तावित व्यापार समझौता एशिया और यूरोप के बीच एक नया आर्थिक पुल तैयार करेगा। यह भारत की ‘विकसित भारत 2047’ नीति में निर्णायक भूमिका निभाएगा, जबकि रूस के लिए यह अवसर होगा कि वह पश्चिमी बाजारों में उत्पन्न आर्थिक बाधाओं से निकलकर एशियाई व्यापारिक क्षेत्र को मजबूत करे।
भारत की बढ़ती आर्थिक शक्ति और रूस का तकनीकी तथा संसाधनात्मक आधार दोनों मिलकर एक नए आर्थिक युग के निर्माण की दिशा में बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
