भारत की ऊर्जा जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं। देश के विकास, उद्योग, घरेलू उपयोग और डिजिटल इंडिया के सपनों को पूरा करने के लिए पर्याप्त और स्थायी ऊर्जा की आवश्यकता है। इस दिशा में सरकार ने विभिन्न तकनीकों पर ध्यान केंद्रित किया है, जिनमें जीवाश्म ईंधन, नवीकरणीय ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा शामिल हैं। हाल ही में भारत सरकार ने परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को निजी निवेशकों के लिए खोलने का ऐतिहासिक कदम उठाया है। यह कदम देश की ऊर्जा क्षमता को बढ़ाने और 2047 तक 100 GW की परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने के लक्ष्य की दिशा में एक बड़ी पहल माना जा रहा है।

वर्तमान में भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता 8.8 GW के आसपास है। इसे देखते हुए सरकार का मानना है कि सिर्फ सरकारी निवेश से इस लक्ष्य को हासिल करना संभव नहीं होगा। निजी कंपनियों की भागीदारी से न केवल पूंजी आएगी, बल्कि नवाचार, प्रतिस्पर्धा और परियोजनाओं की तेजी भी बढ़ेगी। हालांकि विशेषज्ञों का यह मानना है कि इसमें अंधाधुंध दौड़ शुरू करने की बजाय, देश को धीरे-धीरे और सतर्क रूप से आगे बढ़ना चाहिए। नई तकनीकें जैसे कि स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) भविष्य में जोखिम और लागत कम कर सकती हैं, लेकिन इनका व्यावसायिक पैमाने पर परीक्षण अभी बाकी है।
परमाणु ऊर्जा अत्यधिक पूंजी-सघन और समय लेने वाली तकनीक है। दुनिया के विकसित देशों के उदाहरण हमें बताते हैं कि इस क्षेत्र में निवेश करना आसान नहीं है। फ्रांस का 1,600 MW EPR रिएक्टर और फिनलैंड का Olkiluoto-3 रिएक्टर भारी लागत और वर्षों की देरी का शिकार रहे हैं। ब्रिटेन के Hinkley Point C की लागत लगातार बढ़ रही है और यह इतिहास की सबसे महंगी बिजली पैदा कर सकता है। ऐसे उदाहरण हमें यह समझाते हैं कि भारत में निजी निवेशकों को सरकारी गारंटी, तयशुदा टैरिफ, ईंधन आपूर्ति सहायता और अन्य सब्सिडी की आवश्यकता पड़ सकती है। अगर निजी कंपनियां विफल होती हैं, तो संयंत्र के रखरखाव, सुरक्षा और ईंधन प्रबंधन की जिम्मेदारी सरकार पर आ सकती है।
नवीकरणीय ऊर्जा जैसे सौर और पवन ऊर्जा की लागत पिछले दशक में लगभग 90 प्रतिशत कम हो गई है। नई बैटरी और स्टोरेज तकनीकें इसे 24 घंटे बिजली देने में सक्षम बना सकती हैं। यह पारंपरिक परमाणु ऊर्जा की तुलना में अधिक लचीला, कम खर्चीला और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प हो सकता है। भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन, लंबी अवधि के स्टोरेज और अंतरराष्ट्रीय बिजली व्यापार नई ऊर्जा योजनाओं को पूरी तरह बदल सकते हैं। सऊदी अरब भारत को अपनी अतिरिक्त सौर ऊर्जा बेचने के लिए समुद्र के नीचे केबल बिछाने जैसी योजनाओं पर काम कर रहा है।
परमाणु ऊर्जा को लेकर सरकार का यह निर्णय आर्थिक और तकनीकी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ जोखिम भी जुड़ा है। देश को 2047 तक 100 GW की कठोर लक्ष्य सीमा में बांधने की बजाय, विकल्पों को खुला रखना, अनुसंधान में निवेश करना, ट्रांसमिशन और स्टोरेज के लिए तैयार रहना और बाजार को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने देना बेहतर रणनीति होगी। निजी निवेशकों को पर्याप्त जोखिम उठाने के लिए प्रेरित करना चाहिए, लेकिन सामाजिक नुकसान और सरकारी खर्चों को नियंत्रित रखना जरूरी है।
निष्कर्षतः, भारत का ऊर्जा भविष्य मिश्रित और लचीला होना चाहिए। परमाणु ऊर्जा को विकल्प के रूप में रखें, लेकिन नवीकरणीय ऊर्जा और नई तकनीकों पर जोर दें। सरकार और निजी क्षेत्र को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा। इस तरह, देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और पर्यावरण संरक्षण दोनों को सुनिश्चित कर सकता है।
