देश की अर्थव्यवस्था इन दिनों तेज रफ्तार में दौड़ती दिखाई दे रही है। लगातार दो तिमाहियों में मजबूत जीडीपी ग्रोथ के आंकड़े सामने आने के बाद केंद्र सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। यह आंकड़ा न केवल वैश्विक स्तर पर भारत की मजबूती को दर्शाता है, बल्कि निवेशकों और बाजार के लिए भी सकारात्मक संकेत देता है। लेकिन इसी चमकदार तस्वीर के पीछे एक ऐसी सच्चाई छिपी है, जिसने राज्यों की चिंता बढ़ा दी है। राज्यों का कहना है कि जब देश की जीडीपी बढ़ रही है, तब उनकी अपनी आय घटती जा रही है।

यही कारण है कि आम बजट 2026 से पहले केंद्र सरकार के साथ हुई अहम बैठक में राज्यों ने अपनी आर्थिक परेशानियों को खुलकर रखा और विशेष सहायता की मांग की। यह मांग केवल अतिरिक्त धन तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के संघीय ढांचे और वित्तीय संतुलन से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा बनती जा रही है।
बजट 2026 से पहले राज्यों की सामूहिक आवाज
1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण संसद में बजट पेश करने वाली हैं। इससे पहले राज्यों और केंद्र के बीच प्री-बजट बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। इन्हीं बैठकों में राज्यों ने यह सवाल उठाया कि जब देश की अर्थव्यवस्था तेज गति से आगे बढ़ रही है, तो राज्यों की आय में अपेक्षित बढ़ोतरी क्यों नहीं हो पा रही।
राज्यों का तर्क है कि विकास का असली बोझ उन्हीं पर होता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था, स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर और सामाजिक कल्याण योजनाओं का क्रियान्वयन सीधे राज्य सरकारों के जिम्मे होता है। ऐसे में यदि उनके संसाधन सीमित होंगे, तो विकास की गति भी प्रभावित होगी।
टैक्स बंटवारे का गणित और राज्यों की परेशानी
वर्तमान व्यवस्था के तहत केंद्र सरकार अपने कर राजस्व का 41 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को देती है। यह व्यवस्था वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर तय की गई है। कागजों पर यह आंकड़ा संतुलित दिखता है, लेकिन राज्यों का कहना है कि असली समस्या टैक्स की संरचना में छिपी हुई है।
केंद्र सरकार बीते कुछ वर्षों में सेस और सरचार्ज के जरिए बड़ी मात्रा में कर संग्रह कर रही है। तकनीकी रूप से यह कर केंद्र के टैक्स रेवेन्यू का हिस्सा नहीं माने जाते, इसलिए इनसे मिलने वाली राशि राज्यों के साथ साझा नहीं की जाती। परिणामस्वरूप, भले ही कुल टैक्स कलेक्शन बढ़ रहा हो, लेकिन राज्यों तक पहुंचने वाला हिस्सा अपेक्षाकृत कम हो जाता है।
राज्यों ने मांग की है कि सेस और सरचार्ज से प्राप्त राजस्व का भी कुछ हिस्सा उन्हें दिया जाए, ताकि उनके वित्तीय संसाधन मजबूत हो सकें और वे विकास योजनाओं को सुचारू रूप से चला सकें।
जीएसटी दरों में कटौती और राजस्व पर असर
राज्यों की चिंता का एक बड़ा कारण वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी से जुड़ा हुआ है। 22 सितंबर को जीएसटी की कुछ दरों में कटौती की गई थी। इसका उद्देश्य उपभोग को बढ़ावा देना और महंगाई के दबाव को कम करना था। हालांकि, इसका सीधा असर केंद्र और राज्यों दोनों के राजस्व पर पड़ा।
एक रिपोर्ट के अनुसार, जीएसटी दरों में कटौती से मौजूदा वित्त वर्ष में केंद्र और राज्यों को मिलाकर लगभग 1.11 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि कम दरों के चलते उपभोग बढ़ने से यह नुकसान कुछ हद तक कम हो सकता है, लेकिन तत्काल प्रभाव के रूप में राज्यों की आय पर दबाव बढ़ना तय है।
प्री-बजट बैठक में कई राज्यों ने यह मुद्दा उठाया और कहा कि जीएसटी व्यवस्था में सुधार की जरूरत है, ताकि राज्यों को स्थिर और अनुमानित राजस्व मिल सके।
विपक्ष शासित राज्यों की खास चिंता
प्री-बजट बैठक में विपक्ष शासित राज्यों ने विशेष रूप से अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर चिंता जताई। उनका कहना है कि केंद्र की नीतियों का असर राज्यों पर असमान रूप से पड़ता है। कुछ राज्यों की राजस्व क्षमता पहले से ही सीमित है, ऐसे में टैक्स शेयर में कमी और बढ़ते खर्च ने उनकी स्थिति और कमजोर कर दी है।
इन राज्यों ने मांग की कि केंद्र सरकार उन्हें विशेष वित्तीय सहायता दे, ताकि वे अपने विकास कार्यों और सामाजिक योजनाओं को प्रभावित हुए बिना चला सकें।
केंद्रीय योजनाएं और राज्यों की बढ़ती हिस्सेदारी
एक और अहम मुद्दा केंद्रीय योजनाओं में राज्यों की हिस्सेदारी से जुड़ा है। केंद्र सरकार की कई नई योजनाओं में राज्यों को अधिक वित्तीय योगदान देना पड़ता है। पहले जहां केंद्र बड़ी हिस्सेदारी वहन करता था, अब राज्यों पर भी खर्च का बोझ बढ़ रहा है।
राज्यों का कहना है कि उनकी आय सीमित है और खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में केंद्रीय योजनाओं में बढ़ी हुई हिस्सेदारी उनके बजट को और दबाव में डाल रही है। इसके अलावा, राज्यों ने अपनी लोन सीमा बढ़ाने की मांग भी की है, ताकि वे वित्तीय जरूरतों को पूरा कर सकें।
प्राकृतिक आपदाएं और विशेष पैकेज की मांग
भारत जैसे बड़े और विविध देश में प्राकृतिक आपदाएं कोई नई बात नहीं हैं। बाढ़, सूखा, चक्रवात, भूकंप और भूस्खलन जैसी आपदाएं हर साल कई राज्यों को प्रभावित करती हैं। राज्यों का कहना है कि आपदा प्रबंधन और पुनर्वास पर भारी खर्च आता है, जो उनके सीमित बजट को और कमजोर कर देता है।
इसी कारण राज्यों ने केंद्र से मांग की है कि प्राकृतिक आपदाओं के लिए विशेष पैकेज और अतिरिक्त सहायता दी जाए, ताकि प्रभावित क्षेत्रों में तेजी से राहत और पुनर्निर्माण किया जा सके।
डीबीटी योजनाएं और बढ़ता वित्तीय दबाव
हाल के वर्षों में डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर यानी डीबीटी योजनाओं का दायरा तेजी से बढ़ा है। कई राज्य सरकारें अपने चुनावी वादों के तहत लोगों को सीधे बैंक खातों में नकद सहायता दे रही हैं। इससे पारदर्शिता बढ़ी है और बिचौलियों की भूमिका कम हुई है, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है।
डीबीटी योजनाओं पर बढ़ता खर्च राज्यों के राजस्व घाटे को बढ़ा रहा है। कई राज्यों ने चिंता जताई है कि यदि यही स्थिति रही, तो विकास कार्यों के लिए संसाधन कम पड़ सकते हैं। सड़क, स्कूल, अस्पताल और अन्य बुनियादी ढांचे पर खर्च प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।
संघीय ढांचे की कसौटी पर वित्तीय संतुलन
राज्यों और केंद्र के बीच यह वित्तीय खींचतान केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। यह भारत के संघीय ढांचे की मजबूती से जुड़ा सवाल है। राज्यों का कहना है कि उन्हें केवल योजनाओं का क्रियान्वयनकर्ता न बनाकर, विकास में बराबी का भागीदार माना जाना चाहिए।
यदि राज्यों के पास पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे, तो राष्ट्रीय स्तर पर विकास के लक्ष्य भी अधूरे रह सकते हैं। इसलिए बजट 2026 से राज्यों को उम्मीद है कि केंद्र सरकार उनकी मांगों को गंभीरता से सुनेगी और वित्तीय संतुलन को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाएगी।
बजट से उम्मीदें और आगे की राह
बजट 2026 ऐसे समय में आ रहा है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बनी हुई है, लेकिन भारत की विकास दर उम्मीद जगाती है। राज्यों की मांगें यह संकेत देती हैं कि विकास का लाभ समान रूप से वितरित करना कितना जरूरी है।
आने वाले बजट में यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार राज्यों की चिंताओं को कैसे संबोधित करती है। क्या सेस और सरचार्ज के बंटवारे पर पुनर्विचार होगा, क्या जीएसटी प्रणाली में सुधार होंगे, और क्या राज्यों को विशेष वित्तीय राहत मिलेगी—ये सभी सवाल फिलहाल खुले हुए हैं।
एक बात तय है कि यदि केंद्र और राज्य मिलकर सहयोग की भावना से काम करें, तो आर्थिक विकास का यह सफर ज्यादा संतुलित और टिकाऊ बन सकता है। harigeet pravaah के अनुसार, यह बजट न केवल आंकड़ों का खेल होगा, बल्कि देश के संघीय रिश्तों की दिशा भी तय करेगा।
