आने वाले दशक में ऊर्जा की वैश्विक तस्वीर में भारत का नाम सबसे ऊपर लिखा जाएगा। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की नवीनतम ग्लोबल एनर्जी आउटलुक 2025 रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब सिर्फ एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक तेल मांग का “एपिसेंटर” बनने जा रहा है।

भारत की बढ़ती ऊर्जा प्यास
साल 2024 में भारत में रोजाना लगभग 5.5 मिलियन बैरल तेल की खपत हो रही थी। यह संख्या 2035 तक बढ़कर 8 मिलियन बैरल प्रतिदिन (mbpd) तक पहुंचने का अनुमान है — यानी करीब 45% की वृद्धि। इस अभूतपूर्व वृद्धि के पीछे हैं भारत की तेजी से बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण, और वाहनों की बढ़ती संख्या।
IEA की रिपोर्ट कहती है —
“2035 तक दुनिया में तेल मांग में जितनी भी अतिरिक्त वृद्धि होगी, उसका लगभग आधा हिस्सा अकेले भारत से आएगा।”
दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, जिस भूमिका में पिछले दो दशकों तक चीन था, अब उसमें भारत प्रवेश कर चुका है।
वाहन, उद्योग और रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ईंधन की भूमिका
भारत में पेट्रोल और डीज़ल की मांग में वृद्धि मुख्यतः दो क्षेत्रों से आ रही है —
- परिवहन क्षेत्र — जैसे कार, बाइक, ट्रक, बसें, विमान आदि।
- औद्योगिक क्षेत्र — विशेष रूप से प्लास्टिक, केमिकल्स, और पेट्रोकेमिकल उत्पाद।
साथ ही, घरेलू रसोई में एलपीजी गैस का उपयोग भी लगातार बढ़ा है। ग्रामीण इलाकों में रसोई गैस की पहुँच से न सिर्फ लोगों की जीवनशैली बदली है, बल्कि इससे ईंधन की कुल खपत पर भी असर पड़ा है।
भारत का रिफाइनिंग नेटवर्क और ऊर्जा क्षमता
भारत सिर्फ तेल आयातक ही नहीं, बल्कि रिफाइनिंग क्षेत्र में भी बड़ा खिलाड़ी बन रहा है। वर्तमान में भारत की रिफाइनिंग क्षमता लगभग 6 mbpd है, जो 2035 तक 7.5 mbpd तक पहुंचने की उम्मीद है। इससे भारत परिवहन ईंधन का निर्यातक देश भी बन जाएगा।
रिलायंस इंडस्ट्रीज, इंडियन ऑयल, और एचपीसीएल जैसी कंपनियां नई रिफाइनरियां और अपग्रेडेड यूनिट्स बना रही हैं। गुजरात के जामनगर में स्थित रिलायंस रिफाइनरी पहले से ही दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनिंग सुविधाओं में से एक है।
आयात पर बढ़ती निर्भरता – एक चिंता भी
हालांकि भारत घरेलू तेल उत्पादन को बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन आईईए के अनुसार भारत की तेल आयात निर्भरता 2024 में 87% थी, जो 2035 तक 92% तक बढ़ सकती है। इसका सीधा मतलब है — भारत की ऊर्जा सुरक्षा अब अंतरराष्ट्रीय बाजारों की कीमतों, भू-राजनीतिक परिस्थितियों और डॉलर विनिमय दर पर अधिक निर्भर होगी।
प्राकृतिक गैस की मांग में भी तेजी
तेल के साथ-साथ, भारत की प्राकृतिक गैस की खपत भी बढ़ रही है। साल 2035 तक भारत में गैस की मांग लगभग दोगुनी होकर 140 बिलियन क्यूबिक मीटर (bcm) तक पहुंच जाएगी। शहरों में पाइप्ड गैस, एलएनजी आयात, और औद्योगिक गैस उपयोग इसमें अहम योगदान देंगे। वर्तमान में भारत 35 bcm LNG आयात करता है, जो 2035 तक 50 bcm तक पहुंच जाएगा।
कोयला और स्वदेशी ऊर्जा – संतुलन की कोशिश
दुनिया भले ही कोयले से दूर जा रही हो, लेकिन भारत के लिए यह अभी भी ज़रूरी ऊर्जा स्रोत है। 2035 तक भारत का कोयला उत्पादन 50 मिलियन टन (Mtce) बढ़ने की उम्मीद है। कोल इंडिया लिमिटेड अपनी गेवरा खदान का विस्तार कर रही है, जिससे यह एशिया की सबसे बड़ी कोयला खदान बन जाएगी। इसके अलावा आने वाले पांच वर्षों में 36 नई खदानें भी शुरू की जाएंगी।
भविष्य की ऊर्जा रणनीति
भारत सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में देश को “ऊर्जा आत्मनिर्भरता” की दिशा में आगे बढ़ाया जाए। इस दिशा में ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाएं, और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पर तेजी से काम हो रहा है। फिर भी, यह भी सच है कि तेल और गैस आने वाले कम से कम दो दशकों तक भारत की ऊर्जा रीढ़ बने रहेंगे।
भारत बनाम चीन: नया ऊर्जा समीकरण
पिछले दशक में जब दुनिया में तेल की मांग में 75% से ज्यादा की बढ़ोतरी चीन से आई थी, अब वही परिदृश्य भारत की ओर झुक रहा है। चीन की धीमी अर्थव्यवस्था और इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती संख्या से उसकी तेल मांग स्थिर हो रही है, जबकि भारत अभी तेजी से विकास और उपभोग के चरण में है।
निष्कर्ष
IEA की रिपोर्ट सिर्फ एक आँकड़ा नहीं, बल्कि भारत की नई ऊर्जा कहानी की झलक है। भारत अब सिर्फ तेल का ग्राहक नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संतुलन का केंद्र बनने जा रहा है। यह अवसर भी है और चुनौती भी — क्योंकि आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी बढ़ेगी। भारत के पास आज वह मौका है कि वह दुनिया को दिखाए — विकास और स्थिरता साथ-साथ चल सकते हैं।
