भारत तेजी से बदल रहा है। शहर फैल रहे हैं, आय बढ़ रही है, तकनीक जीवन को आसान बना रही है और खानपान की आदतें भी पहले से बिल्कुल अलग हो चुकी हैं। इसी बदलाव के बीच एक ऐसी समस्या चुपचाप देश की जड़ों में समा रही है, जिसे अब तक केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जाता रहा। लेकिन इकोनॉमिक सर्वे 2026 ने पहली बार साफ शब्दों में यह चेतावनी दी है कि मोटापा अब केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह भारत की आर्थिक प्रगति के लिए भी एक गंभीर खतरा बन चुका है।

जिस बीमारी को कभी अमीर देशों की समस्या माना जाता था, वह आज भारत के हर वर्ग, हर उम्र और लगभग हर राज्य में फैल चुकी है। यह संकट इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि यह शोर नहीं करता, अचानक सामने नहीं आता और अक्सर तब पकड़ में आता है जब शरीर और व्यवस्था दोनों को नुकसान हो चुका होता है।
इकोनॉमिक सर्वे 2026 की चेतावनी क्यों अहम है
इकोनॉमिक सर्वे को आमतौर पर आर्थिक आंकड़ों, विकास दर और नीतिगत संकेतों का दस्तावेज माना जाता है। लेकिन 2026 के सर्वे में मोटापे को लेकर जो चिंता जताई गई है, वह बताती है कि सरकार अब इस समस्या को केवल स्वास्थ्य मंत्रालय तक सीमित नहीं मान रही।
सर्वे में स्पष्ट किया गया है कि 2000 से 2025 के बीच भारत में मोटापे का ग्राफ लगातार ऊपर गया है। यह वृद्धि केवल शहरी वयस्कों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बच्चों और किशोरों में भी तेजी से देखी गई है। यह संकेत भविष्य की श्रमशक्ति के लिए बेहद चिंताजनक है।
मोटापा क्यों बन गया है ‘साइलेंट हेल्थ इमरजेंसी’
मोटापा किसी महामारी की तरह अचानक नहीं फैलता। यह धीरे-धीरे शरीर में जगह बनाता है और वर्षों बाद गंभीर बीमारियों के रूप में सामने आता है। यही कारण है कि इसे साइलेंट हेल्थ इमरजेंसी कहा जा रहा है।
जब बड़ी संख्या में लोग मोटापे से ग्रस्त होते हैं, तो उनके साथ मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और जोड़ों की समस्याएं भी बढ़ती हैं। इन बीमारियों का सीधा असर व्यक्ति की काम करने की क्षमता पर पड़ता है। इकोनॉमिक सर्वे ने इसी बिंदु पर जोर देते हुए कहा है कि अगर इस प्रवृत्ति को रोका नहीं गया, तो भारत की उत्पादकता पर इसका गहरा असर पड़ेगा।
उत्पादकता और श्रमशक्ति पर मोटापे का प्रभाव
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी मानी जाती है। लेकिन यदि यही युवा आबादी अस्वस्थ होगी, तो जनसांख्यिकीय लाभ बोझ में बदल सकता है। मोटापे से ग्रस्त व्यक्ति जल्दी थकता है, बार-बार बीमार पड़ता है और लंबे समय तक काम करने में कठिनाई महसूस करता है।
इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, कार्यस्थलों पर अनुपस्थिति, चिकित्सा खर्च और समय से पहले सेवानिवृत्ति जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इससे न केवल कंपनियों की लागत बढ़ेगी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर उत्पादन क्षमता भी प्रभावित होगी।
बच्चों और किशोरों में बढ़ता मोटापा: भविष्य की चेतावनी
सर्वे में बच्चों और किशोरों में मोटापे के बढ़ते मामलों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। यह स्थिति इसलिए चिंताजनक है क्योंकि बचपन में विकसित हुई जीवनशैली आगे चलकर स्थायी बन जाती है।
मोबाइल, स्क्रीन टाइम, ऑनलाइन मनोरंजन और शारीरिक गतिविधियों की कमी ने बच्चों को पहले से कहीं अधिक निष्क्रिय बना दिया है। इसके साथ ही जंक फूड और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन की आसान उपलब्धता ने समस्या को और गहरा किया है।
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड और बदलती भोजन संस्कृति
भारत की पारंपरिक भोजन संस्कृति संतुलित आहार पर आधारित थी। लेकिन शहरीकरण, तेज जीवनशैली और मार्केटिंग के प्रभाव में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड तेजी से लोकप्रिय हुआ है।
इकोनॉमिक सर्वे ने साफ कहा है कि अधिक चीनी, नमक और वसा वाले खाद्य पदार्थ मोटापे की मुख्य वजहों में शामिल हैं। ये खाद्य पदार्थ सस्ते, आकर्षक और आसानी से उपलब्ध हैं, जिससे हर उम्र के लोग इनके आदी होते जा रहे हैं।
शारीरिक गतिविधि की कमी: अदृश्य दुश्मन
मोटापे की दूसरी बड़ी वजह शारीरिक गतिविधि की कमी है। शहरी जीवन में पैदल चलना, साइकिल चलाना और खेलकूद लगभग खत्म होता जा रहा है। ऑफिस का काम बैठकर होता है और घर में भी मनोरंजन स्क्रीन तक सीमित रह गया है।
सर्वे के मुताबिक, यदि यह प्रवृत्ति जारी रही तो आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य खर्च तेजी से बढ़ेगा, जिसका बोझ अंततः अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।
कुपोषण और मोटापे का दोहरा बोझ
भारत की एक अनोखी और गंभीर समस्या यह है कि यहां कुपोषण और मोटापा दोनों साथ-साथ मौजूद हैं। एक ओर देश का एक हिस्सा पर्याप्त पोषण से वंचित है, वहीं दूसरा हिस्सा अत्यधिक कैलोरी का सेवन कर रहा है।
इकोनॉमिक सर्वे ने इसे ‘डबल बर्डन’ बताया है। यह स्थिति नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि एक ही समय में दो विपरीत समस्याओं से निपटना आसान नहीं होता।
अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक असर
मोटापा केवल इलाज का खर्च नहीं बढ़ाता, बल्कि दीर्घकाल में यह आर्थिक विकास की रफ्तार को भी धीमा कर सकता है। बीमार श्रमशक्ति, बढ़ता स्वास्थ्य बजट और घटती उत्पादकता मिलकर आर्थिक दबाव पैदा करते हैं।
सर्वे में संकेत दिया गया है कि यदि अभी हस्तक्षेप नहीं किया गया, तो आने वाले दशकों में मोटापे से जुड़ी बीमारियां भारत की विकास कहानी में बाधा बन सकती हैं।
नीतिगत हस्तक्षेप की जरूरत क्यों
इकोनॉमिक सर्वे 2026 केवल समस्या बताकर नहीं रुकता, बल्कि यह भी संकेत देता है कि अब मोटापे से निपटने के लिए समन्वित नीति की जरूरत है। स्वास्थ्य, शिक्षा, शहरी विकास और खाद्य नीति को एक साथ जोड़कर समाधान खोजने की आवश्यकता है।
स्कूलों में शारीरिक शिक्षा, खाद्य लेबलिंग, जागरूकता अभियान और सक्रिय जीवनशैली को बढ़ावा देना समय की मांग बन चुका है।
समाज और व्यक्ति की भूमिका
नीतियों के साथ-साथ समाज और व्यक्ति की भूमिका भी बेहद अहम है। खानपान की आदतों में बदलाव, नियमित व्यायाम और संतुलित जीवनशैली ही इस समस्या का स्थायी समाधान हो सकती है।
इकोनॉमिक सर्वे का संदेश साफ है कि यदि भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है, तो नागरिकों को शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाना अनिवार्य है।
निष्कर्ष
इकोनॉमिक सर्वे 2026 की चेतावनी केवल आंकड़ों का विश्लेषण नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय की तस्वीर भी दिखाती है। मोटापा अब व्यक्तिगत समस्या नहीं रहा, बल्कि यह राष्ट्रीय चुनौती बन चुका है।
अगर समय रहते इस साइलेंट हेल्थ इमरजेंसी पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका असर अस्पतालों से निकलकर फैक्ट्रियों, दफ्तरों और अंततः देश की अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है।
