वर्ष 2025 का अंतिम दिन भारत के आर्थिक इतिहास में एक विशेष अध्याय के रूप में दर्ज हो गया। जिस दिन दुनिया नए वर्ष की दहलीज़ पर खड़ी थी, उसी दिन अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिदृश्य में भारत की स्थिति को लेकर एक बड़ा और प्रतीकात्मक संदेश सामने आया। भारत ने जापान को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में निर्णायक बढ़त हासिल कर ली। यह उपलब्धि न केवल भारत के लिए गर्व का विषय बनी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति में भी इसका असर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।

इस ऐतिहासिक घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि भारत की इस आर्थिक छलांग पर चीन ने सार्वजनिक रूप से खुशी जताई और खुलकर तारीफ की। आमतौर पर भारत-चीन संबंधों में प्रतिस्पर्धा, अविश्वास और रणनीतिक तनाव की खबरें अधिक देखने को मिलती हैं, लेकिन वर्ष के आखिरी दिन चीन की ओर से भारत के लिए सकारात्मक और सम्मानजनक शब्द सुनाई देना अपने आप में एक दुर्लभ कूटनीतिक क्षण बन गया।
चीन की प्रतिक्रिया और बदला हुआ लहजा
बीजिंग से जारी बयान में चीन ने यह स्वीकार किया कि भारत जापान को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। चीनी दूतावास की ओर से यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई, जब वैश्विक शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है और एशिया आर्थिक विकास का केंद्र बनता जा रहा है।
चीन की इस प्रतिक्रिया ने यह संकेत दिया कि वह भारत की आर्थिक प्रगति को केवल एक आंकड़े के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक ऐतिहासिक बदलाव के रूप में देख रहा है। बयान में कहा गया कि भारत का यह उदय इस बात का प्रमाण है कि सच्ची ताकत केवल वर्तमान उपलब्धियों से नहीं आती, बल्कि इतिहास का ईमानदारी से सामना करने, उससे सीखने और भविष्य की जिम्मेदारी उठाने से पैदा होती है।
यह भाषा सामान्य कूटनीतिक औपचारिकता से कहीं आगे जाती दिखी। इसमें भारत के विकास मॉडल, उसकी दीर्घकालिक सोच और वैश्विक भूमिका की ओर इशारा था।
भारतीय अर्थव्यवस्था के आंकड़े और मजबूती
सरकारी अनुमानों के अनुसार भारत की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी अब लगभग 4.18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुकी है। यह आंकड़ा भारत को औपचारिक रूप से जापान से आगे ले जाता है, जिसकी अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों से स्थिरता और धीमी वृद्धि की चुनौती से जूझ रही है।
भारत की यह वृद्धि अचानक नहीं हुई है। पिछले एक दशक में किए गए संरचनात्मक सुधार, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार, बुनियादी ढांचे में भारी निवेश और घरेलू खपत में निरंतर वृद्धि ने इस उपलब्धि की नींव रखी है। सेवा क्षेत्र, विनिर्माण, स्टार्टअप इकोसिस्टम और तकनीक आधारित उद्योगों ने भारत की आर्थिक गति को नई दिशा दी है।
निरंतर बढ़ती जीडीपी वृद्धि दर
आधार वर्ष 2011-12 के अनुसार गणना की गई जीडीपी वृद्धि दर ने हाल की तिमाहियों में लगातार मजबूती दिखाई है। वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर 8.2 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो वैश्विक स्तर पर एक उल्लेखनीय आंकड़ा है।
इस तेज विकास के साथ-साथ खुदरा मुद्रास्फीति में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष के अंत तक खुदरा महंगाई दर भारतीय रिजर्व बैंक की निचली सीमा दो प्रतिशत से नीचे आ गई, जिसने मौद्रिक नीति को स्थिर बनाए रखने में मदद की और निवेशकों के विश्वास को मजबूत किया।
जीडीपी गणना पद्धति में बदलाव की तैयारी
सरकार अब राष्ट्रीय खातों के लिए आधार वर्ष को 2011-12 से बदलकर 2022-23 करने की दिशा में काम कर रही है। इसका उद्देश्य न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था की वर्तमान संरचना को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करना है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा उठाई गई चिंताओं का समाधान भी करना है।
इस बदलाव से जीडीपी गणना अधिक आधुनिक, वास्तविक और वैश्विक मानकों के अनुरूप हो सकेगी। यह कदम दर्शाता है कि भारत केवल आंकड़ों में ही नहीं, बल्कि आर्थिक पारदर्शिता और विश्वसनीयता के स्तर पर भी आगे बढ़ना चाहता है।
2030 की ओर बढ़ता भारत
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मौजूदा रफ्तार बनी रहती है, तो भारत वर्ष 2030 तक जर्मनी को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। यह परिदृश्य भारत को अमेरिका और चीन के बाद वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित कर देगा।
इस संभावित उपलब्धि का महत्व केवल आर्थिक नहीं होगा। यह भारत को वैश्विक निर्णय-निर्माण प्रक्रियाओं में अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाने का अवसर देगा, चाहे वह अंतरराष्ट्रीय व्यापार हो, जलवायु नीति हो या वैश्विक शासन संरचनाएं।
चीन-जापान तनाव और भारत का संदर्भ
भारत की आर्थिक प्रगति पर चीन की सकारात्मक प्रतिक्रिया का एक रणनीतिक संदर्भ भी है। वर्तमान समय में चीन और जापान के संबंध गंभीर तनाव के दौर से गुजर रहे हैं। दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में दोनों देशों के बीच लंबे समय से क्षेत्रीय विवाद चले आ रहे हैं।
हाल ही में चीन ने चेतावनी दी थी कि यदि जापान ने ताइवान के मुद्दे पर सैन्य शक्ति का इस्तेमाल किया, तो उसे कड़े प्रतिकार के लिए तैयार रहना चाहिए। चीनी सरकारी मीडिया में भी जापानी नेतृत्व को लेकर तीखे बयान सामने आए थे। जापान के प्रधानमंत्री के ताइवान संबंधी वक्तव्यों ने दोनों देशों के बीच राजनीतिक तनाव को और बढ़ा दिया है।
एशिया में शक्ति संतुलन का बदलता स्वरूप
ऐसे समय में भारत का जापान को पीछे छोड़ना केवल आर्थिक आंकड़ों का खेल नहीं रह जाता। यह एशिया में शक्ति संतुलन के बदलते स्वरूप को भी दर्शाता है। चीन का भारत के उदय को खुले तौर पर स्वीकार करना यह संकेत देता है कि वह भारत को अब केवल एक क्षेत्रीय खिलाड़ी के रूप में नहीं, बल्कि एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में देख रहा है।
यह भी संभव है कि चीन भारत की आर्थिक मजबूती को एशिया में स्थिरता और विकास के एक नए स्तंभ के रूप में प्रस्तुत करना चाहता हो, खासकर ऐसे समय में जब उसके जापान के साथ संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं।
भारत-चीन संबंधों का नया संकेत
हालांकि भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक मतभेद अभी भी मौजूद हैं, लेकिन इस बयान ने यह दिखाया कि दोनों देशों के बीच संबंध केवल टकराव तक सीमित नहीं हैं। आर्थिक स्तर पर परस्पर सम्मान और स्वीकार्यता की गुंजाइश अब भी बनी हुई है।
भारत की विकास गाथा पर चीन की यह प्रतिक्रिया भविष्य में आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय व्यापार और बहुपक्षीय मंचों पर संवाद के नए रास्ते खोल सकती है।
भारत का उदय और वैश्विक संदेश
भारत की इस उपलब्धि ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि विकासशील अर्थव्यवस्थाएं भी दीर्घकालिक नीति, स्थिर लोकतांत्रिक ढांचे और नवाचार के बल पर वैश्विक मंच पर अग्रणी भूमिका निभा सकती हैं।
यह उदय केवल भारत की सरकार या नीतियों का परिणाम नहीं है, बल्कि करोड़ों भारतीयों की मेहनत, उद्यमिता और आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है। कृषि से लेकर अंतरिक्ष तक, स्टार्टअप से लेकर बुनियादी ढांचे तक, भारत ने हर क्षेत्र में अपनी क्षमता का विस्तार किया है।
निष्कर्ष: आर्थिक उपलब्धि से आगे की कहानी
भारत का जापान को पीछे छोड़ना और चीन द्वारा इसे भारत का उदय बताया जाना केवल एक समाचार नहीं है। यह एक ऐसे दौर की शुरुआत का संकेत है, जहां भारत वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक विमर्श में अधिक आत्मविश्वास और प्रभाव के साथ अपनी बात रखेगा।
वर्ष 2025 का यह अंतिम दिन भारत के लिए केवल कैलेंडर का पन्ना पलटने का दिन नहीं था, बल्कि एक नए वैश्विक अध्याय की शुरुआत भी था, जिसमें भारत की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होने जा रही है।
