भारत की कृषि व्यवस्था एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ आत्मनिर्भरता सबसे बड़ा लक्ष्य बन चुकी है। इसी सोच को मजबूत आधार देते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के अमलाहा में आयोजित राष्ट्रीय दलहन उत्पादक सम्मेलन से देश को एक स्पष्ट संदेश दिया कि अब भारत दालों के लिए विदेशों पर निर्भर नहीं रहेगा। इस सम्मेलन में उन्होंने न सिर्फ किसानों के हितों को केंद्र में रखा, बल्कि नीति, शोध, बाजार और प्रसंस्करण को एक सूत्र में जोड़ने का रोडमैप भी सामने रखा।

अमलाहा की धरती पर आयोजित यह सम्मेलन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह भारत की कृषि नीति के भविष्य की झलक था। देश के नौ प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों के कृषि मंत्री, कृषि वैज्ञानिक, शोध संस्थानों के प्रतिनिधि और किसान संगठनों के लोग इसमें शामिल हुए। शिवराज सिंह चौहान ने अपने संबोधन की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित और आत्मनिर्भर भारत के विजन से करते हुए कहा कि दालों का आयात किसी भी दृष्टि से गर्व की बात नहीं हो सकता। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब हमारे किसान सक्षम हैं, हमारी मिट्टी उपजाऊ है और हमारे वैज्ञानिक नई तकनीक विकसित कर रहे हैं, तो विदेशों से दाल मंगाने की मजबूरी चिंता का विषय है।
उन्होंने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक मंच पर 27 देशों के साथ समझौते किए, लेकिन किसानों के हितों के साथ कभी समझौता नहीं होने दिया। अब समय आ गया है कि भारत अपनी जरूरत की दाल खुद पैदा करे और किसानों को इसका पूरा लाभ मिले। शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार की मंशा केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों को बीज से लेकर बाजार तक हर स्तर पर सहयोग देना है।
अपने संबोधन में उन्होंने फसल विविधीकरण पर विशेष जोर दिया। उन्होंने समझाया कि लगातार एक ही फसल बोने से जमीन की उर्वरता घटती है और कीटों का प्रकोप बढ़ता है। इसके समाधान के रूप में उन्होंने चना, मसूर, उड़द और तुअर जैसी दलहन फसलों को खेती के चक्र में शामिल करने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि दलहन फसलें न सिर्फ मिट्टी की सेहत सुधारती हैं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
मध्य प्रदेश की भूमिका पर बोलते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि दलहन उत्पादन में यह राज्य देश में नंबर वन है, लेकिन क्षेत्रफल में आई कमी चिंता का विषय है। इसे दूर करने के लिए राज्य और केंद्र मिलकर ठोस प्रयास करेंगे। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान संस्थानों सहित अन्य वैज्ञानिक संस्थाओं के सहयोग से ऐसे उन्नत बीज विकसित किए जा रहे हैं जो मौसम के बदलाव और बीमारियों के प्रति अधिक सहनशील होंगे।
बीज वितरण को लेकर भी शिवराज सिंह चौहान ने विस्तृत योजना साझा की। उन्होंने कहा कि बीज वितरण के लिए क्लस्टर विकसित किए जाएंगे ताकि किसानों को समय पर और गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध हो सके। इसके साथ ही आदर्श खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रति हेक्टेयर 10 हजार रुपये की सहायता भी दी जाएगी, जिससे किसान आधुनिक तकनीक और बेहतर खेती पद्धतियों को अपना सकें।
सम्मेलन के दौरान एक बड़ी घोषणा करते हुए केंद्रीय कृषि मंत्री ने बताया कि देशभर में 1000 नई दाल मिलें स्थापित की जाएंगी। इनमें से 55 दाल मिलें अकेले मध्य प्रदेश में लगेंगी। इस कदम का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं है, बल्कि स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण को बढ़ावा देना भी है, ताकि किसानों को उनकी फसल का बेहतर मूल्य मिल सके और रोजगार के नए अवसर पैदा हों।
न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद को लेकर भी सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि तुअर 8000 रुपये प्रति क्विंटल, उड़द 7800 रुपये, चना 5875 रुपये और मसूर 7000 रुपये प्रति क्विंटल की दर से खरीदी जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार किसानों की फसल खरीदेगी और बाजार तक पहुंचाने की पूरी जिम्मेदारी निभाएगी।
उन्होंने यह भी बताया कि सम्मेलन के बाद सभी राज्यों के कृषि मंत्रियों के साथ विस्तृत मंथन किया जाएगा, जिसके आधार पर दलहन उत्पादन बढ़ाने का राष्ट्रीय रोडमैप तैयार होगा। इस मिशन के तहत मध्य प्रदेश को 354 करोड़ रुपये की सहायता राशि दी जाएगी, जिससे राज्य में दलहन उत्पादन को नई गति मिलेगी।
अपने संबोधन के अंत में शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि उन्हें असली आनंद खेत, किसान और मिट्टी से जुड़कर काम करने में मिलता है। उन्होंने विश्वास जताया कि यदि किसान, वैज्ञानिक और सरकार मिलकर काम करें, तो भारत न सिर्फ दालों में आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि दुनिया के लिए एक मिसाल भी बनेगा।
सम्मेलन के दौरान केंद्रीय मंत्री और नौ राज्यों के कृषि मंत्रियों ने अमलाहा क्षेत्र में उन्नत किस्म की चना और मसूर की फसलों का अवलोकन भी किया। कृषि वैज्ञानिकों ने उन्हें आधुनिक तकनीक, उन्नत बीज और बेहतर उत्पादन पद्धतियों की जानकारी दी। इस अवसर पर दलहन क्षेत्र की वर्तमान चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर भी गहन चर्चा हुई।
यह सम्मेलन स्पष्ट संकेत देता है कि आने वाले वर्षों में भारत की कृषि नीति में दलहन को केंद्रीय स्थान मिलने वाला है। सरकार का फोकस अब केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने, जमीन की सेहत सुधारने और देश को आत्मनिर्भर बनाने पर है। अमलाहा से दिया गया यह संदेश आने वाले समय में भारत की कृषि दिशा और दशा दोनों को बदल सकता है।
