दुनिया जिस दौर से गुजर रही है, उसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दे किसी एक देश तक सीमित नहीं रह गए हैं। वैश्विक राजनीति में उथल-पुथल, क्षेत्रीय अस्थिरता और सीमा पार से होने वाले खतरों के बीच भारत ने अपने रुख को पहले से कहीं अधिक स्पष्ट और मुखर किया है। इसी कड़ी में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर का हालिया बयान न केवल पड़ोसी देशों के लिए एक कड़ा संदेश है, बल्कि यह भारत की विदेश नीति और सुरक्षा रणनीति की साफ झलक भी देता है।

आईआईटी मद्रास से दिया गया स्पष्ट संदेश
चेन्नई स्थित आईआईटी मद्रास में आयोजित ‘शस्त्र 2026’ नामक टेक्नो-एंटरटेनमेंट फेस्ट के उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान विदेश मंत्री जयशंकर ने जब मंच से अपनी बात रखी, तो वह सिर्फ एक औपचारिक भाषण नहीं था। उनके शब्दों में अनुभव, कूटनीति और स्पष्टता झलक रही थी। भारत की विदेश नीति को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने बिना किसी देश का नाम लिए सीधे तौर पर पाकिस्तान की आतंकवाद-समर्थक नीति पर प्रहार किया।
जयशंकर ने कहा कि दुनिया में हर देश को आत्मरक्षा का अधिकार है और भारत भी इससे अलग नहीं है। अगर कोई पड़ोसी देश जानबूझकर और लगातार आतंकवाद को बढ़ावा देता है, तो वह अच्छा पड़ोसी नहीं हो सकता। ऐसे हालात में भारत को अपने नागरिकों और अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए जो भी कदम उठाने की जरूरत होगी, वह उठाएगा।
आत्मरक्षा के अधिकार पर कोई बाहरी आदेश नहीं
अपने संबोधन में जयशंकर ने यह बात बेहद स्पष्ट शब्दों में कही कि भारत कैसे और कब अपनी आत्मरक्षा करेगा, यह तय करने का अधिकार केवल भारत के पास है। कोई दूसरा देश यह नहीं बता सकता कि भारत को अपने बचाव में क्या करना चाहिए और क्या नहीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की सुरक्षा सर्वोपरि है और उसके लिए जो भी आवश्यक होगा, वह किया जाएगा।
यह बयान ऐसे समय आया है जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि भारत आतंकवाद के खिलाफ किस हद तक कार्रवाई कर सकता है। जयशंकर का यह संदेश उन सभी के लिए था, जो भारत की सुरक्षा नीति पर सवाल उठाते हैं या उसे सीमित करने की कोशिश करते हैं।
“बुरे पड़ोसी” की अवधारणा और पश्चिमी सीमा का संकेत
जयशंकर ने अपने भाषण में पड़ोसियों की भूमिका पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि हर देश के पड़ोसी अच्छे हों, यह जरूरी नहीं है। भारत के संदर्भ में अगर पश्चिम की ओर देखा जाए, तो दुर्भाग्य से स्थिति हमेशा अनुकूल नहीं रही है। उनका इशारा साफ तौर पर पाकिस्तान की ओर था, जो दशकों से आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के लिए चुनौती बना हुआ है।
उन्होंने कहा कि अगर कोई देश लगातार आतंकवाद को एक नीति के रूप में अपनाता है, तो उसे अच्छे पड़ोसी की तरह व्यवहार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। अच्छे पड़ोसी को मिलने वाले लाभ और सहूलियतें उसी को मिलती हैं, जो शांति और सहयोग में विश्वास रखता हो।
पानी और आतंकवाद एक साथ नहीं चल सकते
विदेश मंत्री के बयान का एक अहम हिस्सा जल बंटवारे से जुड़ा था। उन्होंने याद दिलाया कि भारत ने कई दशक पहले पड़ोसी देश के साथ जल बंटवारे को लेकर एक समझौता किया था। यह समझौता आपसी विश्वास और सहयोग की भावना पर आधारित था।
लेकिन जयशंकर ने दो टूक कहा कि अगर कोई देश दशकों तक आतंकवाद फैलाता रहे, तो वह यह उम्मीद नहीं कर सकता कि उसके साथ वही व्यवहार किया जाएगा, जो एक जिम्मेदार और शांतिप्रिय पड़ोसी के साथ किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह संभव नहीं है कि कोई देश एक तरफ आतंकवाद जारी रखे और दूसरी तरफ यह कहे कि उसके साथ पानी साझा किया जाए। इस बयान को भारत की बदली हुई कूटनीतिक सोच के रूप में देखा जा रहा है।
भारत की पड़ोसी-प्रथम नीति की झलक
जयशंकर ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की नीति किसी एक देश के खिलाफ नहीं, बल्कि सहयोग और विकास के पक्ष में है। उन्होंने कहा कि जो भी देश भारत के अच्छे पड़ोसी हैं, भारत उनके साथ निवेश करता है, उनकी मदद करता है और संकट के समय उनके साथ खड़ा रहता है।
उन्होंने कोरोना महामारी का उदाहरण देते हुए कहा कि जब पूरी दुनिया अपने-अपने हितों में उलझी थी, तब भारत ने अपने पड़ोसी देशों को सबसे पहले वैक्सीन की मदद पहुंचाई। यह भारत की जिम्मेदार वैश्विक भूमिका को दर्शाता है।
श्रीलंका संकट में भारत की भूमिका
अपने भाषण में जयशंकर ने श्रीलंका के आर्थिक संकट का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जब श्रीलंका गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब भारत ने बिना किसी शर्त के उसकी मदद की। भारत ने श्रीलंका को करीब चार अरब डॉलर की आर्थिक सहायता दी, ताकि वह अपने हालात से उबर सके।
यह उदाहरण देते हुए जयशंकर ने यह संदेश दिया कि भारत का विकास केवल भारत तक सीमित नहीं है। जब भारत आगे बढ़ता है, तो उसके साथ-साथ उसके पड़ोसी देशों के लिए भी विकास के रास्ते खुलते हैं।
बांग्लादेश को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण
विदेश मंत्री ने बांग्लादेश का भी जिक्र किया और कहा कि भारत अपने पड़ोसियों को साझेदार के रूप में देखता है। उन्होंने कहा कि भारत का विकास बांग्लादेश जैसे देशों के लिए भी फायदेमंद है। दोनों देशों की प्रगति एक-दूसरे से जुड़ी हुई है।
जयशंकर ने यह भी कहा कि भारत का मानना है कि क्षेत्रीय सहयोग और आपसी विश्वास से ही स्थिरता और समृद्धि संभव है। यही वजह है कि भारत अपने पड़ोसियों के साथ सकारात्मक संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है।
आतंकवाद पर शून्य सहनशीलता की नीति
जयशंकर के पूरे भाषण का सार यही था कि आतंकवाद के मुद्दे पर भारत कोई समझौता नहीं करेगा। चाहे अंतरराष्ट्रीय दबाव हो या कूटनीतिक आलोचना, भारत अपनी सुरक्षा से जुड़े फैसले खुद लेगा।
उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले देशों के लिए अब पुरानी सहूलियतें और समझौते स्वतः लागू नहीं रह सकते। समय के साथ नीतियां बदलती हैं और भारत ने भी अपनी नीति को यथार्थ के अनुसार ढाल लिया है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए संकेत
जयशंकर का यह बयान केवल पड़ोसी देशों के लिए नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए भी एक संकेत है। भारत अब अपनी सुरक्षा और संप्रभुता के मुद्दे पर किसी भी तरह की अस्पष्टता नहीं चाहता। वह साफ शब्दों में अपनी बात कहने और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई करने के लिए तैयार है।
निष्कर्ष: स्पष्ट, सख़्त और आत्मविश्वासी भारत
आईआईटी मद्रास के मंच से दिया गया जयशंकर का यह संदेश भारत की नई कूटनीतिक पहचान को दर्शाता है। यह एक ऐसा भारत है, जो सहयोग में विश्वास रखता है, लेकिन अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं करता। जो अच्छे पड़ोसियों का साथ देता है, लेकिन आतंकवाद को पालने वालों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने से पीछे नहीं हटता।
यह बयान आने वाले समय में भारत की विदेश नीति और क्षेत्रीय राजनीति में एक अहम संदर्भ के रूप में देखा जाएगा।
