भारत और रूस के बीच दशकों से कायम रणनीतिक साझेदारी एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। हाल ही में यह पुष्टि हो चुकी है कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दिसंबर के पहले सप्ताह में भारत की औपचारिक यात्रा पर आ रहे हैं, जो केवल एक प्रोटोकॉल विजिट नहीं, बल्कि दूरगामी सुरक्षा, ऊर्जा और सामरिक हितों से जुड़ा ऐतिहासिक पड़ाव माना जा रहा है। इस यात्रा की तिथियां अब पूर्ण रूप से स्पष्ट हैं। पुतिन चार और पांच दिसंबर को भारत में रहेंगे और इन दो दिनों के दौरान दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहन बातचीत तय मानी जा रही है। खासतौर पर रक्षा क्षेत्र में हो रहे बदलावों, उभरते वैश्विक समीकरणों और भारत-रूस के बीच बढ़ती आवश्यकताओं के मद्देनजर यह दौरा और भी महत्वपूर्ण हो उठता है।

इस यात्रा को और अधिक निर्णायक बनाने वाली घटना यह है कि रूस में लंबित पड़े एक बहुत महत्वपूर्ण सैन्य लॉजिस्टिक समझौते की मंजूरी प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुकी है। यह समझौता है RELOS, जिसे भारत और रूस के बीच लॉजिस्टिक सपोर्ट और सैन्य गतिविधियों को सुव्यवस्थित करने के लिए डिजाइन किया गया है। लगभग दस महीने पहले इस समझौते को दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने मॉस्को में हस्ताक्षरित किया था, लेकिन रूस की विधायी औपचारिकताओं के कारण यह अभी तक लागू नहीं हो सका था। अब, जब पुतिन खुद भारत आने वाले हैं, तो रूसी संसद का यह कदम भारत-रूस साझेदारी को फिर से उच्चतम स्तर पर ले जाने की मंशा का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है।
रूस की निचली संसद, स्टेट डूमा, इस समझौते को मंजूरी देने की औपचारिकताएं तेज गति से पूरी कर रही है। रूस की ओर से यह संकेत दिया गया है कि पुतिन की भारत यात्रा से पहले इसे अंतिम रूप दे दिया जाएगा। इस पहल ने भारत की रणनीतिक योजनाओं में नई ऊर्जा भर दी है, क्योंकि यह समझौता भारत के सैन्य अभियानों और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता को नई दिशा देगा।
RELOS, यानी Reciprocal Exchange of Logistics Agreement, एक ऐसा तंत्र है जिसके माध्यम से भारत और रूस की सेनाएं एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों, बंदरगाहों और एयरबेस का शांतिपूर्ण और रक्षा-संबंधी उद्देश्यों के लिए उपयोग कर सकेंगी। इस समझौते का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब भी दोनों देशों की सेनाएं संयुक्त अभ्यासों या सहयोगात्मक अभियानों में शामिल हों, तो ईंधन, मरम्मत, भोजन, उपकरणों की पुनःपूर्ति जैसी आवश्यकताएं सरलता से पूरी हो सकें।
यह समझौता केवल एक तकनीकी दस्तावेज नहीं, बल्कि बदलते विश्व में उन देशों की रणनीति है जो बेहद जटिल भू-राजनीतिक परिस्थितियों में अपने हितों को मजबूती देना चाहते हैं। भारत और रूस के संबंध कई दशकों से विश्वास और परस्पर सहायता पर आधारित रहे हैं। चाहे वह रक्षा उपकरणों की आपूर्ति हो, ऊर्जा सहयोग हो, या वैश्विक मंचों पर एक-दूसरे का समर्थन, दोनों देशों ने समय-समय पर एक-दूसरे के साथ मजबूती से खड़े होने का इतिहास रचा है। अब RELOS उस संबंध को और भी ऊंचाई देने की दिशा में अगला कदम है।
भारत के दृष्टिकोण से यह समझौता कई मायनों में लाभदायक सिद्ध होने जा रहा है। भारत की नौसेना हिंद महासागर क्षेत्र में लगातार बढ़ती चुनौतियों का सामना कर रही है। चीन की बढ़ती उपस्थिति, समुद्री मार्गों पर बढ़ते तनाव और वैश्विक शक्तियों की गतिविधियां भारत के लिए नए प्रश्न खड़े करती हैं। ऐसे में रूस जैसे पुराने और भरोसेमंद साझेदार के साथ नौसैनिक सहयोग बढ़ाना भारत को रणनीतिक बढ़त दिला सकता है। RELOS के लागू होने के बाद भारतीय नौसेना के बड़े जहाज आर्कटिक क्षेत्र में स्थित रूस के उत्तरी ठिकानों तक पहुंच पाएंगे, जहां सर्दियों में मौसम बेहद कठोर होता है और समुद्री बर्फ चुनौतियां पैदा करती है। भारत के जहाजों को इन ठिकानों तक पहुंच मिलना केवल प्रतीकात्मक नहीं होगा, बल्कि यह दिखाएगा कि भारत अब वैश्विक समुद्री पटल पर अधिक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार है।
दूसरी ओर, रूस के लिए भी यह समझौता उतना ही लाभकारी है। रूस चाहता है कि हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी नौसैनिक उपस्थिति लगातार बनी रहे। भारत के समुद्री ठिकानों तक पहुंच मिलने से रूस अपनी रणनीतिक गतिविधियों को सहज तरीके से विस्तारित कर सकेगा। इस प्रकार दोनों देशों की नौसेनाएं एक-दूसरे की क्षमताओं को बढ़ाते हुए संयुक्त अभियानों को अधिक प्रभावी बना पाएंगी।
RELOS की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह आर्कटिक क्षेत्र में भारत और रूस के संभावित संयुक्त अभ्यासों को भी आसान बना देगा। आर्कटिक दुनिया के सबसे संवेदनशील और संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों में से एक है। भारत की LNG आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा रूस के यमाल प्रायद्वीप से आता है। ऐसे में इस क्षेत्र में सहज लॉजिस्टिक पहुंच भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए निर्णायक महत्व रखती है। ऊर्जा आज केवल आर्थिक विषय नहीं रही, बल्कि विश्व की राजनीति में शक्ति का केंद्र बन चुकी है। इसलिए आर्कटिक में सहयोग से भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान कर सकता है।
पुतिन की इस यात्रा के दौरान दोनों देश 23वें सालाना भारत-रूस सम्मेलन में हिस्सा लेंगे, जहां रक्षा, व्यापार, ऊर्जा, स्पेस, विज्ञान और भू-राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। यह सम्मेलन ऐसे समय पर हो रहा है जब दुनिया नई वैश्विक धुरी की ओर बढ़ रही है। अमेरिका और चीन की नीतियां दुनिया में नए तनाव और दबाव पैदा कर रही हैं। इस माहौल में भारत और रूस का एक-दूसरे के साथ खड़ा होना केवल द्विपक्षीय हितों का मामला नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्थिरता के लिए भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
भारत और रूस के बीच यह समझौता उन देशों के लिए भी एक संकेत है जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। भारत समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा परिवहन और रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। रूस इस यात्रा को एक अवसर के रूप में देख रहा है कि वह भारत के उभरते बाजार और सामरिक दृष्टिकोण में अपनी भूमिका को और पुख्ता कर सके।
भारत में इस समझौते को सिर्फ सैन्य सहयोग के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। यह एक ऐसा कदम है जो दो देशों के रिश्तों की मजबूती और बदलते हुए वैश्विक मानचित्र में उनकी सामूहिक रणनीति को दर्शाता है। पुतिन की यात्रा ऐसे समय हो रही है जब दुनिया में राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक अनिश्चितता और सुरक्षा से जुड़ी कई चुनौतियां सामने हैं। इनके समाधान के लिए भारत और रूस का सहयोग महत्वपूर्ण बन जाता है।
सूत्रों के अनुसार, पुतिन इस यात्रा में भारत के शीर्ष नेतृत्व के साथ लंबे समय तक द्विपक्षीय वार्तालाप करेंगे। इन चर्चाओं में ऊर्जा कॉरिडोर, नई रक्षा तकनीकों, अंतरिक्ष सहयोग और व्यापार बढ़ाने के नए मार्गों पर भी विस्तार से बात होगी। भारत इस यात्रा को अपने विविध राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित और सशक्त बनाने के अवसर के रूप में देख रहा है।
RELOS समझौते की मंजूरी और पुतिन की यात्रा भारत और रूस के संबंधों में एक नए युग की शुरुआत का संकेत देती है। यह दोनों देशों के लिए सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और वैश्विक रणनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। आने वाले दिनों में इस समझौते के प्रभाव और दोनों देशों के रिश्तों की नई दिशा को पूरा विश्व ध्यान से देखेगा।
