भारत और रूस के बीच व्यापारिक संबंध दशकों पुरानी रणनीति और आर्थिक मजबूरियों पर आधारित हैं। इस समय भारत अपने निर्यातकों के लिए नए अवसर खोलने और आर्थिक रूप से फंसे हुए 50-55 अरब डॉलर के रूबल का इस्तेमाल करने के लिए रूसी अधिकारियों से बातचीत कर रहा है। यह रकम मुख्य रूप से रूस से खरीदे गए कच्चे तेल के भुगतान के दौरान उनके बैंकों में जमा हुई थी।

भारत की कोशिश है कि रूसी बाजार में इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग उत्पाद, खाने-पीने के सामान और मछली के निर्यात पर लगी रोक और अन्य व्यापारिक बाधाओं को हटाया जाए। इसका मकसद न केवल भारतीय निर्यातकों को सुविधा देना है बल्कि फंसे हुए रूबल का उपयोग करके रूस से तेल और अन्य जरूरी सामान की खरीदारी को भी आसान बनाना है।
व्यापारिक बाधाओं की प्रकृति
भारतीय निर्यातकों को रूस के बाजार में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में रूस की तरफ से सॉफ्टवेयर और तकनीकी मानकों की जटिल मांगें निर्यात को कठिन बना रही हैं। इंजीनियरिंग उत्पादों के निर्यात में भी कठोर मानक और गुणवत्ता नियंत्रण प्रक्रिया लंबा समय ले रही है। इसके अलावा कुछ उत्पादों के लिए स्थानीय भाषा और तकनीकी दस्तावेज़ीकरण की आवश्यकता भी एक चुनौती बनी हुई है।
रूस के बाजार में व्यापार के इन पैमानों के कारण भारतीय निर्यातकों को समय पर माल पहुंचाने में परेशानी होती है। इसके बावजूद, रूसी रिटेल कंपनियां भारतीय खाने-पीने के सामान और अन्य उत्पादों में रुचि दिखा रही हैं।
सरकार का उच्च स्तर पर हस्तक्षेप
यह मामला सरकार के सर्वोच्च स्तर पर उठाया गया है। भारत ने रूसी अधिकारियों के साथ व्यापार बाधाओं को हटाने के मुद्दे को सीधे उच्च कूटनीतिक स्तर पर उठाया है। यह बातचीत अगले महीने होने वाली महत्वपूर्ण बैठक से पहले की जा रही है, जिसमें यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते पर चर्चा होगी। इस यूनियन में रूस के अलावा आर्मेनिया, बेलारूस, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान शामिल हैं।
व्यापार घाटा और आर्थिक दबाव
भारत और रूस के बीच व्यापार घाटा इस समय काफी अधिक है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के पहले सात महीनों में यह घाटा लगभग 25 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इसका मुख्य कारण रूस से खरीदा गया कच्चा तेल है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण कुछ रूसी तेल कंपनियों के लेन-देन में कठिनाई रही, जिससे भारतीय रिफाइनरियों ने तेल की खरीदारी कम कर दी। हालांकि, नई कंपनियां तेल की सप्लाई कर रही हैं, जिससे व्यापार घाटा कम होने की संभावना है।
फंसे हुए रूबल का महत्व
रूस के बैंकों में जमा यह फंसा हुआ रूबल भारत के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय साधन बन गया है। इस राशि का उपयोग केवल तेल या ऊर्जा खरीदारी में ही नहीं बल्कि अन्य आर्थिक लेन-देन और निवेश के लिए भी किया जा सकता है। भारत चाहता है कि व्यापारिक बाधाएं कम हों ताकि यह धन सीधे भारतीय निर्यातकों और उद्योगों के लिए लाभकारी हो।
निर्यातकों के सामने कठिनाइयाँ
भारतीय निर्यातकों के लिए मुख्य चुनौती रूस के कड़े मानक और नियम हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में विशेष सॉफ़्टवेयर और तकनीकी मांगें निर्यात प्रक्रिया को धीमा कर रही हैं। इंजीनियरिंग और खाद्य उत्पादों के लिए स्थानीय भाषा और पैकेजिंग की आवश्यकता निर्यातकों के लिए अतिरिक्त बोझ बन रही है।
एक अधिकारी ने बताया कि सरकार ने इस मुद्दे को रूसी अधिकारियों के साथ सबसे उच्च स्तर पर उठाया है और इसे हल करने का प्रयास जारी है। इससे उम्मीद जताई जा रही है कि अगले महीने की बैठक में इन बाधाओं को कम करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश मिलेंगे।
अगले महीने की बैठक और रणनीति
भारत अगले महीने पांच देशों के साथ बैठक करेगा, जिसमें यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन की सदस्य देशों के साथ व्यापारिक समझौते पर चर्चा होगी। इस बैठक का उद्देश्य है कि व्यापार बाधाओं को हटाकर भारत अपने निर्यातकों और निवेशकों के लिए नए अवसर खोले। बैठक में रूस के अलावा आर्मेनिया, बेलारूस, कजाकिस्तान और किर्गिस्तान शामिल होंगे।
भारत की यह पहल सिर्फ व्यापारिक हितों को नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिति और रणनीतिक सहयोग को भी ध्यान में रखते हुए की जा रही है। यह कदम रूस और भारत के बीच आर्थिक सहयोग को मजबूत करने के साथ-साथ रूबल के उपयोग को आसान बनाने में मदद करेगा।
निष्कर्ष
भारत ने रूस से व्यापारिक बाधाओं को कम करने और अपने निर्यातकों को नए अवसर देने के लिए उच्च स्तर पर बातचीत शुरू कर दी है। अगले महीने प्रस्तावित बैठक में व्यापार समझौते और नीति सुधार पर चर्चा होगी। इससे न केवल भारतीय निर्यातकों को रूस में अपनी उपस्थिति मजबूत करने का अवसर मिलेगा बल्कि फंसे हुए रूबल का भी प्रभावी उपयोग संभव होगा।
भारत की यह रणनीति दिखाती है कि आर्थिक सहयोग और व्यापारिक नीतियों में सुरक्षित और दीर्घकालिक योजना कितनी महत्वपूर्ण है।
