अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापार संबंधों में लचीलापन वही दिखा सकता है, जिसके पास अपनी नीतियों को समय के साथ परिवर्तित करने की क्षमता हो। बीते कुछ महीनों में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संबंध सामान्य रूप से कठोर बयानबाजी, शुल्क विवाद और तकनीकी प्रतिबंधों से गुजरते रहे। किंतु हाल में हुई उच्चस्तरीय चर्चाओं और प्रतिनिधि मंडल की बैठकों के बाद स्थिति एक नए और सकारात्मक मोड़ पर पहुंच गई है। यह मोड़ केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी बड़े परिवर्तन की शुरुआत माना जा रहा है।

अमेरिकी प्रशासन का पिछले समय में यह रुख रहा कि भारत जैसे उभरते देशों को व्यापार छूट तभी मिले जब वह अपने बाजारों में अमेरिका को व्यापक प्रवेश दे। दूसरी ओर, भारत अपने कृषि और घरेलू उद्योगों की सुरक्षा को प्राथमिकता देता आया है। लेकिन बदलते वैश्विक परिवेश ने दोनों देशों को इस स्थिति पर फिर विचार करने के लिए प्रेरित किया।
वैश्विक व्यापारिक ढांचे में यह दौर संक्रमण का है, जहां चीन पर निर्भरता कम करने हेतु कई बड़े देश वैकल्पिक साझेदारों की तलाश में हैं। अमेरिका भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। दक्षिण एशिया को अगली आर्थिक रणनीति के रूप में देखना इसी उद्देश्य की उपज है। भारत का विशाल उपभोक्ता बाजार, बढ़ती ऊर्जा जरूरतें, तकनीकी नवाचारों के बढ़ते क्षेत्र और कृषि उत्पादों का संतुलित प्रबंधन अमेरिका के लिए एक आकर्षक संभावना हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि हाल के प्रस्ताव में भारत ने अमेरिकी कृषि उत्पादों के सीमित प्रवेश को स्वीकार करने का संकेत दिया है। इनमें मुख्य रूप से ज्वार, सोयाबीन और उनसे निर्मित बायोफ्यूल आधारित सामग्री शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सामान्य प्रस्ताव नहीं बल्कि व्यापक मूल्यांकन और विचार-विमर्श का तरीका है। क्योंकि किसी भी प्रकार के विदेशी कृषि उत्पाद को प्रवेश देने से पहले भारत को अपनी कृषि अर्थव्यवस्था का समुचित संरक्षण सुनिश्चित करना होता है।
इसके अतिरिक्त अमेरिकी पक्ष ने यह संकेत दिया है कि भारत में एथेनॉल बाजार आने वाले वर्षों में ऊर्जा उन्नयन का अहम स्तंभ हो सकता है। अमेरिका अपनी कॉर्न बेस्ड बायोफ्यूल उत्पादन क्षमता को वैश्विक बाज़ारों में साझा करना चाहता है और भारत उसके लिए उपयुक्त भूमि बन सकता है। अमेरिका यूरोप के बड़े समूहों के साथ ऊर्जा व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर कर चुका है। इस तरह भारत के सामने यह अवसर है कि वह एक दीर्घकालिक ऊर्जा-आधारित व्यावसायिक साझेदारी स्थापित करे।
कृषि व्यापार समझौते के इस दौर में भारत ने स्पष्ट किया है कि सभी श्रेणियों के आयात एक साथ न होकर चरणबद्ध प्रणाली के अंतर्गत स्वीकार किए जाएंगे। भारतीय बाजार सीधे रूप से संवेदनशील श्रेणियों को प्रभावित न करे, इसलिए खास सुरक्षा शर्तों पर बातचीत चल रही है। ऐसी स्थिति में यह वार्ता केवल व्यापार नहीं, नियमों, निरीक्षणों, पोषण गुणवत्ता, जैविक सुरक्षा और स्थानीय हितों के संरक्षण की व्यापक व्यवस्था है।
महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि भारत का यह प्रस्ताव केवल कृषि उत्पादों पर आधारित नहीं है। बातचीत में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, संवेदनशील शुल्क वर्गों का न्यूनिकरण, विशेष व्यापार सुरक्षा नियमों में ढील और बैलेंस ट्रे़ड सिस्टम की चर्चा समानांतर रूप से चल रही है।
पिछले वर्षों में अमेरिका द्वारा लगाए गए उच्च शुल्क ने भारत के निर्यात पर प्रभाव डाला। इस स्थिति में यदि शुल्क में राहत आती है, तो भारत के टेक्सटाइल, मैन्युफैक्चरिंग और प्रोसेस्ड फूड क्षेत्र को बड़ा फायदा पहुंच सकता है। भारत के विनिर्माण क्षेत्र की निर्यात क्षमता वैश्विक स्तर पर पहले से मजबूत है, और शुल्क कटौती से प्रतिस्पर्धात्मकता और बढ़ेगी।
भारत की रणनीति का दूसरा पक्ष यह भी है कि वह विदेशी उत्पादों को तब तक ही स्वीकार करता है जब तक वह उसके हितों के लिए खतरा न बनें। उदाहरण के तौर पर भारत ने बायो सुरक्षा मानकों को कठोर रूप से रखा है। किसी भी उत्पाद के प्रवेश से पहले उसकी लैब परीक्षण प्रणाली सक्रिय होती है। समझौते की प्रक्रिया में इन्हीं मानकों की बातचीत समय लेती है।
वैश्विक विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत को कृषि-आधारित निर्यात बढ़ाने, ऊर्जा आयात विकल्प स्थिर करने, और समानांतर शुल्क सुधारों की दिशा में एक प्रमुख अवसर दे सकता है। इसके अलावा यह वार्ता भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक संबंधों का संकेत भी माना जा रहा है। दक्षिण एशिया में बदलते सुरक्षा समीकरण, ऊर्जा मार्गों की संरचना और आर्थिक संतुलन इस वार्ता की दिशा निर्धारित करते हैं।
भविष्य में होने वाले विस्तार की दृष्टि से भारत के उद्योग समूह भी इस समझौते को उत्सुकता से देख रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि यदि अमेरिका अपने शुल्क ढांचे पर पुनर्विचार करता है, तो वित्तीय, स्वास्थ्य उपकरण, जैव प्रौद्योगिकी, आईटी आधारित सेवाओं और ऑटो पार्ट्स जैसे क्षेत्रों को विशाल व्यापारिक स्पेस मिलेगा।
कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञ इस वार्ता को दो तरह से देख रहे हैं। एक पक्ष चाहता है कि विदेशी उत्पादों का प्रवेश सीमित रखा जाए। दूसरा पक्ष मानता है कि वैश्विक उत्पादों से प्रतिस्पर्धा भारतीय किसानों को नए विकल्प और अधिक समर्थन मूल्य दिला सकती है। इसके अतिरिक्त किसानों को ऊर्जा आधारित फसल प्रणाली जोड़ने का विकल्प भी मजबूत हो सकता है।
भारत की ऊर्जा जरूरतों के संदर्भ में एथेनॉल आधारित भविष्य विशेष महत्व रखता है। अभी भारत धीरे-धीरे पेट्रोल मिश्रण में जैव ईंधन की मात्रा बढ़ा रहा है। यदि इस लक्ष्यों तक पहुंचना है, तो आधुनिक बायोफ्यूल क्षमता की आवश्यकता होगी। इस क्रम में अमेरिका का प्रस्ताव भारत की विकास गति से मेल खाता है।
संक्षेप में कहा जाए तो वार्ता का स्वर आज अपेक्षाकृत सकारात्मक है। दोनों देशों के प्रतिनिधि यह संकेत दे रहे हैं कि समझौते की आधारशिला तैयार हो चुकी है। प्रक्रिया अब नीतिगत पुष्टि, सुरक्षा समझौते और शुल्क समायोजन के चरण में पहुंचने वाली है। कुछ समय बाद इसका परिणाम आर्थिक सुधार के रूप में सामने आने की संभावना है।
