दिल्ली में हाल ही में हुए धमाके ने भारत की सुरक्षा एजेंसियों को एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि देश के खिलाफ छिपा नेटवर्क किस हद तक विस्तारित और आधुनिक हो चुका है। जांच में सामने आई नई जानकारियों ने न केवल सुरक्षा व्यवस्था में मौजूद चुनौतियों को उजागर किया है, बल्कि यह भी बताया है कि भारत को तुर्की की भूमिका को लेकर अब और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।

दिल्ली धमाका: जांच में चौंकाने वाली परतें खुलीं
जांच एजेंसियों ने पाया कि धमाके के लिए जिम्मेदार आतंकी किसी पारंपरिक मॉड्यूल के जरिए नहीं, बल्कि एक अत्याधुनिक डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से विदेश में मौजूद आकाओं से जुड़े हुए थे। आतंकियों ने ‘सेशन’ नाम के एक एन्क्रिप्टेड ऐप का इस्तेमाल किया, जिससे वे सीधे अंकारा में बैठे अपने हैंडलरों से निर्देश प्राप्त कर रहे थे। इस तकनीक का इस्तेमाल यह संकेत देता है कि मॉड्यूल बेहद संगठित, प्रशिक्षित और आधुनिक तकनीक की समझ रखने वाला था।
जांच अधिकारियों के अनुसार, इस धमाके की योजना को कई सप्ताह पहले तैयार किया गया था। इसके लिए न केवल फंडिंग की गई, बल्कि इसे अंजाम देने वालों को सुरक्षित मार्ग, डिजिटल निर्देश, लोकेशन शिफ्टिंग और एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन की विस्तृत रणनीति भी प्रदान की गई।
तुर्की की भूमिका पर गंभीर सवाल
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे से जुड़े विशेषज्ञ पिछले कई वर्षों से तुर्की की बदलती नीतियों को लेकर चिंतित रहे हैं। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार कश्मीर मुद्दे को उठाकर भारत के खिलाफ एक राजनीतिक कथा बनाने की कोशिश की है। उनका यह रुख पाकिस्तान की नीति से मेल खाता है।
कश्मीर मुद्दे पर तुर्की द्वारा लगातार दखल देने और भारत-विरोधी तत्वों को सार्वजनिक मंचों पर समर्थन देने से यह आशंका गहराती जा रही है कि तुर्की धीरे-धीरे पाकिस्तान की तरह भारत-विरोधी गतिविधियों का केंद्र बनता जा रहा है।
एन्क्रिप्टेड ऐप ‘सेशन’ की भूमिका
सेशन ऐप एक ऐसा एन्क्रिप्टेड मैसेंजर है, जो यूजर की पहचान, लोकेशन और मैसेजिंग डिटेल छुपाने की क्षमता देता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह ऐप हाल के वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों द्वारा प्रयोग किया जाने लगा है।
भारत में सक्रिय मॉड्यूल ने इस ऐप के जरिए अंकारा में मौजूद हैंडलरों से मिनट-दर-मिनट निर्देश लिए। इसमें शामिल थे:
- लोकेशन चेंज करने के निर्देश
- संभावित लक्ष्य सूची
- धमाके की तकनीकी गाइडेंस
- सुरक्षा एजेंसियों की ट्रैकिंग से बचने के उपाय
- फंडिंग प्राप्त करने और उसे छुपाने की रणनीतियाँ
जांचकर्ताओं ने बताया कि धमाका करने वाले मॉड्यूल ने तुर्की में मौजूद अपने हैंडलरों से लगभग हर महत्वपूर्ण कदम पर मार्गदर्शन प्राप्त किया।
दिल्ली धमाके के बाद कश्मीर व अन्य राज्यों में छापेमारी
दिल्ली धमाके के बाद कश्मीर में 500 से अधिक ठिकानों पर छापेमारी की गई और 600 से ज्यादा संदिग्धों को हिरासत में लिया गया। यह जांच ऑपरेशन अब तक के सबसे बड़े कोऑर्डिनेटेड रैकेट-बस्टिंग एक्शनों में से एक माना जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों की प्राथमिक चिंता यह है कि क्या दिल्ली धमाके जैसा मॉड्यूल देश के अन्य हिस्सों में भी सक्रीय है, जो डिजिटल तरीके से संचालित हो रहा हो।
शहद से लिपटा जहर: तुर्की और भारत के बीच संबंधों का दोहरा चेहरा
तुर्की आधिकारिक बयान में भारत से बेहतर संबंधों की बात करता है, लेकिन जमीन पर तुर्की की नीतियां और कूटनीतिक रुख इसके बिल्कुल विपरीत दिखते हैं। तुर्की का पाकिस्तान के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग, भारत-विरोधी संगठनों को मंच उपलब्ध कराना, और दक्षिण एशिया में कट्टरपंथी तत्वों को समर्थन देने की कथित कोशिशें भारत के लिए लंबे समय तक चुनौती बन सकती हैं।
कश्मीर मामले में तुर्की की दखलअंदाजी
एर्दोगन कई बार संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर का मुद्दा उठाते रहे हैं। उनकी तुलना पाकिस्तान के तत्कालीन नेताओं से की जाती है, जो दुनिया के सामने बार-बार कश्मीर का एकतरफा और तथ्यहीन चित्रण करने की कोशिश करते रहे हैं।
भारत ने हर बार तुर्की के इस रवैये पर कड़ा रुख अपनाया है और स्पष्ट किया है कि कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है। बावजूद इसके, तुर्की का रुख लगातार आक्रामक रहा है।
दिल्ली धमाके का मॉड्यूल: फंडिंग, प्रशिक्षण और नेटवर्क
जांच में पता चला है कि इस मॉड्यूल ने 20 लाख रुपये का फंड जुटाया था। यह फंड छोटी रकमों में, अलग-अलग डिजिटल वॉलेट्स और कुछ क्रिप्टोकरेंसी के जरिए ट्रांसफर किया गया। इसके साथ ही, यह भी पता चला कि 20 क्विंटल NPK खाद खरीदकर धमाका करने की तैयारी की गई, जो बताता है कि आतंकी मॉड्यूल अपने लक्ष्य को लेकर कितना सुसंगठित और खतरनाक था।
जांच में यह भी सामने आया है कि अल-फलाह यूनिवर्सिटी का एक कमरा इस पूरी योजना के लिए मीटिंग पॉइंट के रूप में उपयोग किया जा रहा था, जहां पर फंडिंग, प्लानिंग और तकनीकी सेटअप पर काम किया गया।
तुर्की के हैंडलरों की पहचान
एजेंसियों ने इस नेटवर्क से जुड़े दो प्रमुख हैंडलरों की पहचान की है, जिन्हें कोडनेम ‘उकासा’ और ‘हफीज’ से जाना जाता है। ये दोनों अंकारा में बैठे हुए भारत के भीतर सक्रिय मॉड्यूल्स को निर्देश भेज रहे थे। उनके बारे में माना जाता है कि वह ऐसे संगठनों से जुड़े हो सकते हैं, जो वैश्विक स्तर पर कट्टरपंथी एजेंडा चला रहे हैं।
क्या तुर्की भारत के लिए नया पाकिस्तान बन रहा है?
यह सवाल अचानक पैदा नहीं हुआ है। इसके पीछे पिछले कुछ वर्षों के कई घटनाक्रम हैं:
- तुर्की द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान का खुलकर समर्थन
- कश्मीर को लेकर लगातार टिप्पणी
- भारत-विरोधी संगठनों को तुर्की में शरण
- तुर्की-पाकिस्तान-आजर्बाइजान त्रिकोण का उभरना
- कट्टरपंथी थिंक टैंकों को मिल रहा समर्थन
विशेषज्ञों के अनुसार, तुर्की की विदेश नीति पिछले दशक में नाटकीय रूप से बदली है। एर्दोगन ने एक नए इस्लामी नेतृत्व मॉडल की ओर कदम बढ़ाए हैं, जिसका प्रभाव दक्षिण एशिया में भी देखा जा रहा है।
भारत की सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि तुर्की भविष्य में भारत के खिलाफ नई भू-राजनीतिक चुनौतियों को जन्म दे सकता है, जिनकी प्रकृति पाकिस्तान से भी अधिक आधुनिक और जटिल हो सकती है।
भारत की अगली रणनीति
भारत तुर्की के साथ संबंधों को सामान्य रखने की कोशिश करता रहा है, लेकिन अब दिल्ली धमाके ने नई बहस छेड़ दी है। भारत को संभवतः इन कदमों पर विचार करना पड़ सकता है:
- तुर्की से जुड़े डिजिटल नेटवर्क की गहन जांच
- तुर्की-पाकिस्तान आतंकी गठजोड़ की निगरानी
- वैश्विक मंचों पर तुर्की की भूमिका को उजागर करना
- भारतीय छात्रों और प्रवासियों को सावधानी बरतने की सलाह
- कूटनीतिक स्तर पर तुर्की को संदेश भेजना कि भारत के आंतरिक मामलों में दखल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा
निष्कर्ष
दिल्ली धमाका सिर्फ एक आतंकी घटना नहीं है। यह भारत को यह बताने वाला एक गंभीर संकेत है कि दुश्मन अब सिर्फ सरहद पार नहीं बैठे हैं। वे डिजिटल नेटवर्क के जरिए हजारों किलोमीटर दूर से आतंक को नियंत्रित कर रहे हैं। तुर्की की बदलती नीतियां भारत के लिए दीर्घकालिक चुनौती बनती जा रही हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत इस चुनौती का सामना कैसे करता है और तुर्की के साथ कूटनीति को किस रूप में आगे बढ़ाता है।
