भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चल रही व्यापार वार्ताओं ने आखिरकार एक अंतरिम समझौते का रूप ले लिया है। यह समझौता न केवल दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों को नई दिशा देता है, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और कृषि व्यापार जैसे संवेदनशील मुद्दों को भी सीधे तौर पर प्रभावित करता है। इस डील के सामने आने के बाद भारत में राजनीतिक, आर्थिक और किसान संगठनों के स्तर पर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है।

भारत सरकार का दावा है कि इस समझौते में देश के किसानों, डेयरी सेक्टर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हितों से कोई समझौता नहीं किया गया है। वहीं अमेरिका ने इस डील को अपने लिए ऊर्जा, रक्षा और तकनीकी सहयोग के लिहाज से अहम बताया है।
अंतरिम ट्रेड डील की पृष्ठभूमि
भारत और अमेरिका के बीच बीते एक वर्ष से अधिक समय से व्यापार समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव, रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और अमेरिका की बदलती व्यापार नीति ने इस डील को और जटिल बना दिया था। अंततः दोनों देशों ने एक अंतरिम फ्रेमवर्क पर सहमति जताई, जिसे भविष्य में पूर्ण व्यापार समझौते की दिशा में पहला कदम माना जा रहा है।
रूसी तेल पर अमेरिका की सख्त शर्त
इस व्यापार समझौते का सबसे विवादास्पद और चर्चित पहलू रूस से तेल आयात को लेकर अमेरिका की शर्त है। अमेरिकी प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यदि भारत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रूस से तेल खरीदता है, तो भारत से अमेरिका जाने वाले उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ़ दोबारा लगाया जा सकता है।
अमेरिकी कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि वाणिज्य, विदेश और वित्त विभाग संयुक्त रूप से यह निगरानी करेंगे कि भारत रूस से तेल आयात दोबारा शुरू करता है या नहीं। यदि ऐसा पाया गया, तो अमेरिका भारत के खिलाफ अतिरिक्त व्यापारिक कार्रवाई करने पर विचार करेगा, जिसमें 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ़ फिर से लागू करना भी शामिल हो सकता है।
यह शर्त केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक दबाव के रूप में भी देखी जा रही है, क्योंकि भारत लंबे समय से अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूसी तेल पर निर्भर रहा है।
टैरिफ़ कटौती और उसका प्रभाव
इस अंतरिम समझौते के तहत अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले उत्पादों पर लगाए जाने वाले रेसिप्रोकल टैरिफ़ में बड़ी कटौती की घोषणा की है। पहले जो टैरिफ़ दर 50 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, उसे घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है। यह फैसला तय तारीख से प्रभावी हो चुका है।
इस कटौती से भारत के निर्यातकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है, खासकर उन क्षेत्रों में जो लंबे समय से अमेरिकी बाजार में ऊंचे शुल्क से प्रभावित थे।
भारतीय कृषि उत्पादों को राहत
भारत सरकार के अनुसार इस डील में भारतीय कृषि क्षेत्र के लिए कई सकारात्मक प्रावधान शामिल हैं। अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले अनेक कृषि उत्पादों पर अब कोई टैरिफ़ नहीं लगेगा। इनमें मसाले, चाय, कॉफी, नारियल, नारियल तेल, सुपारी, काजू, ब्राज़ील नट, चेस्टनट, वनस्पति मोम और कई फल-सब्जियां शामिल हैं।
सरकार का कहना है कि यह कदम भारत के पारंपरिक कृषि निर्यात को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाएगा और किसानों की आय बढ़ाने में सहायक होगा।
डेयरी सेक्टर को लेकर सरकार का दावा
भारत में डेयरी सेक्टर बेहद संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि इससे करोड़ों छोटे और सीमांत किसान जुड़े हुए हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि इस समझौते में दूध, चीज़ और अन्य डेयरी उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। इन उत्पादों पर अमेरिकी आयात को अनुमति नहीं दी गई है, जिससे घरेलू बाजार पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
किन अमेरिकी उत्पादों के लिए भारत ने बाजार खोला
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारत ने अमेरिका के लिए कुछ सीमित उत्पादों पर ही अपने बाजार खोले हैं। इनमें डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स, वाइन और स्पिरिट्स जैसे उत्पाद शामिल हैं। इन पर भी न्यूनतम आयात मूल्य तय किया गया है, ताकि घरेलू उत्पादकों को नुकसान न पहुंचे।
500 अरब डॉलर के व्यापार का लक्ष्य
भारत और अमेरिका ने अगले कुछ वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य के तहत भारत अमेरिका से ऊर्जा उत्पाद, विमान, विमान पुर्जे, तकनीकी उपकरण, कीमती धातुएं और कोयला आयात करेगा।
सरकार का मानना है कि इस समझौते से निवेशकों के लिए नए अवसर खुलेंगे और भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत स्थिति मिलेगी।
टेक्नोलॉजी और डिजिटल व्यापार का विस्तार
इस डील में टेक्नोलॉजी और डिजिटल व्यापार को भी अहम स्थान दिया गया है। दोनों देश डेटा सेंटरों, उन्नत चिप्स और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी से जुड़े उत्पादों के व्यापार को बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। इसके अलावा, डिजिटल व्यापार नियमों को लेकर भी एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करने की बात कही गई है।
फार्मा, टेक्सटाइल और अन्य उद्योगों पर असर
हालांकि टैरिफ़ कटौती से कई क्षेत्रों को लाभ मिलेगा, लेकिन टेक्सटाइल, लेदर, फुटवियर, प्लास्टिक, रबर, ऑर्गेनिक केमिकल्स और होम डेकोर जैसे उत्पादों पर अभी भी 18 प्रतिशत टैरिफ़ लागू रहेगा। फार्मा सेक्टर को लेकर कहा गया है कि आगे चलकर जेनेरिक दवाओं और उनके कच्चे माल पर शुल्क में राहत दी जा सकती है, लेकिन यह कुछ जांचों और शर्तों पर निर्भर करेगा।
निवेश समझौते को लेकर अस्पष्टता
इस अंतरिम डील के बावजूद भारत-अमेरिका निवेश समझौते को लेकर अभी भी कई सवाल बने हुए हैं। 500 अरब डॉलर की खरीद अगले पांच वर्षों में होगी, लेकिन इसमें किन परियोजनाओं को शामिल किया जाएगा, इसे लेकर पूरी स्पष्टता नहीं है।
विपक्ष और किसान संगठनों की आपत्तियां
भारत में विपक्षी दलों और किसान संगठनों ने इस समझौते को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि लंबे समय में यह डील भारतीय कृषि और खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। हालांकि सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए कह रही है कि संवेदनशील कृषि उत्पादों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।
रणनीतिक और भू-राजनीतिक संकेत
यह ट्रेड डील केवल आर्थिक समझौता नहीं है, बल्कि इसमें रणनीतिक संकेत भी छिपे हैं। रूस से तेल आयात पर शर्त, रक्षा सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता और तकनीकी साझेदारी इस बात का संकेत है कि अमेरिका भारत को अपने रणनीतिक साझेदार के रूप में और मजबूत करना चाहता है।
निष्कर्ष
भारत-अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील एक जटिल लेकिन महत्वपूर्ण समझौता है। इसमें जहां एक ओर भारतीय निर्यातकों और कुछ कृषि उत्पादों को राहत मिली है, वहीं दूसरी ओर रूस से तेल आयात जैसी शर्तें भारत की विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां भी खड़ी करती हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह अंतरिम समझौता पूर्ण व्यापार समझौते का रूप लेता है या नहीं और इसका वास्तविक असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर कैसे पड़ता है।
