भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर एक बार फिर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस बार विवाद की जड़ अमेरिका के भीतर ही दिखाई दे रही है। अमेरिका के रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज़ के एक दावे ने दोनों देशों के संबंधों पर चल रही चर्चाओं को नया मोड़ दे दिया है। क्रूज़ का कहना है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के रुकने के पीछे ट्रंप प्रशासन के शीर्ष नेता जिम्मेदार हैं। उनके अनुसार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और व्हाइट हाउस के आर्थिक सलाहकार पीटर नवारो इस समझौते का विरोध कर रहे हैं।

यह दावा ऐसे समय सामने आया है, जब भारत और अमेरिका दोनों ही देशों के नेता सार्वजनिक मंचों पर आपसी संबंधों को ऐतिहासिक और रणनीतिक बता रहे हैं। इसके बावजूद व्यापार समझौते पर ठोस प्रगति न होना कई सवाल खड़े कर रहा है।
निजी बैठकों में टेड क्रूज़ का खुलासा
अमेरिकी मीडिया में सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, टेड क्रूज़ ने निजी बैठकों में अपने समर्थकों और दानदाताओं के सामने यह बात रखी। रिपोर्ट में कहा गया है कि क्रूज़ ने स्पष्ट रूप से बताया कि वह भारत के साथ व्यापार समझौते को आगे बढ़ाने के लिए व्हाइट हाउस के भीतर लगातार संघर्ष कर रहे हैं।
उनके मुताबिक, प्रशासन के भीतर इस समझौते को लेकर एक राय नहीं है। जब एक दानदाता ने उनसे सीधे पूछा कि इस समझौते का विरोध कौन कर रहा है, तो क्रूज़ ने पीटर नवारो, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और कभी-कभी स्वयं राष्ट्रपति ट्रंप का नाम लिया। यह बातचीत कथित तौर पर 2025 की शुरुआत और मध्य के बीच हुई थी।
ऑडियो रिकॉर्डिंग और अंदरूनी राजनीति
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि इन बैठकों की ऑडियो रिकॉर्डिंग मौजूद हैं, जिन्हें एक रिपब्लिकन सूत्र के जरिए साझा किया गया। बताया गया कि ये रिकॉर्डिंग करीब दस मिनट लंबी हैं और इनमें अमेरिका की आंतरिक राजनीति की झलक साफ दिखाई देती है।
इन रिकॉर्डिंग्स से यह संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन के भीतर व्यापार नीति को लेकर गहरे मतभेद हैं। खास तौर पर भारत जैसे रणनीतिक साझेदार के साथ समझौते को लेकर असहमति होना अमेरिका की विदेश और आर्थिक नीति पर भी सवाल खड़े करता है।
गणतंत्र दिवस पर दोस्ती का संदेश, पीछे तनाव की परछाई
दिलचस्प बात यह है कि इसी दौरान भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को शुभकामनाएं भी दीं। उन्होंने कहा कि अमेरिका और भारत दुनिया के सबसे पुराने और सबसे बड़े लोकतंत्र हैं और दोनों देशों के बीच एक ऐतिहासिक रिश्ता है।
अपने संदेश में ट्रंप ने अमेरिका की जनता की ओर से भारत सरकार और भारतीय नागरिकों को गणतंत्र दिवस की बधाई दी। यह संदेश नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास के माध्यम से सोशल मीडिया पर साझा किया गया। हालांकि, सार्वजनिक तौर पर दिए गए इस दोस्ताना संदेश के बावजूद, अंदरखाने व्यापार समझौते को लेकर खींचतान जारी रहने की खबरें सामने आ रही हैं।
टेड क्रूज़ की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और चेतावनी
टेक्सस से आने वाले रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज़ को अमेरिका की राजनीति में एक महत्वाकांक्षी नेता माना जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वह 2028 के राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी में भी जुटे हुए हैं। ऐसे में भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर उनका खुलकर बोलना सियासी नजरिए से भी अहम माना जा रहा है।
क्रूज़ ने चेतावनी दी है कि राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा लगाए गए ऊंचे टैरिफ अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर हालात बिगड़े, तो इससे राजनीतिक संकट और यहां तक कि महाभियोग जैसी स्थिति भी बन सकती है।
टैरिफ पर ट्रंप से तीखी बातचीत का दावा
क्रूज़ ने यह भी बताया कि अप्रैल 2025 की शुरुआत में जब ट्रंप प्रशासन ने नए टैरिफ लागू किए थे, तब उन्होंने और कुछ अन्य सीनेटरों ने राष्ट्रपति से फोन पर बात की थी। इस बातचीत का मकसद टैरिफ नीति पर पुनर्विचार करने का आग्रह करना था।
क्रूज़ के अनुसार, यह फोन कॉल आधी रात के बाद तक चली, लेकिन माहौल काफी तनावपूर्ण रहा। उन्होंने दावा किया कि बातचीत के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप काफी नाराज थे, चिल्ला रहे थे और अभद्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे थे। हालांकि, इस दावे पर ट्रंप प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
भारत-अमेरिका संबंधों में बढ़ता तनाव
पिछले कुछ महीनों में भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव साफ नजर आया है। इसकी सबसे बड़ी वजह ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए ऊंचे टैरिफ बताए जा रहे हैं। इनमें रूस से तेल खरीदने पर भारत पर लगाया गया 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क भी शामिल है, जिससे कुल टैरिफ दर 50 प्रतिशत तक पहुंच गई।
इन फैसलों ने न सिर्फ व्यापारिक रिश्तों को प्रभावित किया है, बल्कि रणनीतिक साझेदारी पर भी असर डाला है। भारत ने कई मौकों पर यह स्पष्ट किया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर फैसले करता है।
ऑपरेशन सिंदूर और ट्रंप का दावा
राष्ट्रपति ट्रंप लगातार यह दावा करते रहे हैं कि उन्होंने पिछले साल मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम कराने में अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि, भारत सरकार ने इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है और स्पष्ट किया है कि यह फैसला दोनों देशों के सैन्य स्तर पर हुई बातचीत का नतीजा था।
इस मुद्दे ने भी दोनों देशों के बीच बयानबाजी को हवा दी है और विश्वास के स्तर पर सवाल खड़े किए हैं।
व्यापार समझौते पर फोन कॉल विवाद
इसी महीने अमेरिका के वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने यह बयान दिया था कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता इसलिए आगे नहीं बढ़ पाया, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप से फोन पर बात नहीं की। इस बयान ने भी राजनीतिक हलकों में चर्चा को तेज कर दिया था।
भारत की ओर से इस पर कोई सीधी प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि बातचीत विभिन्न स्तरों पर जारी है और रिश्तों को सुधारने की कोशिशें हो रही हैं।
रिश्ते सुधारने की नई पहल
इन तमाम तनावों के बीच हाल के दिनों में दोनों देशों के रिश्तों को पटरी पर लाने की कोशिशें भी तेज हुई हैं। अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर के दौरे के बाद व्यापार वार्ताकारों के बीच बातचीत हुई है।
भारत को अमेरिका की रणनीतिक पहल ‘पैक्स सिलिका’ में शामिल होने का निमंत्रण भी दिया गया है, जो अहम खनिजों से जुड़ी योजना मानी जा रही है। इसके अलावा, तीन सदस्यीय द्विदलीय अमेरिकी कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की है।
अमेरिकी नेतृत्व की ओर से सकारात्मक संकेत
गणतंत्र दिवस के अवसर पर अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी भारत को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच ऐतिहासिक संबंध हैं और आने वाले वर्ष में साझा लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए वह भारत के साथ मिलकर काम करने को लेकर आशान्वित हैं।
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी गणतंत्र दिवस समारोह में शामिल होने के बाद भारत को शुभकामनाएं दीं और दोनों देशों के रिश्तों की मजबूती पर जोर दिया।
निष्कर्ष
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर सामने आए टेड क्रूज़ के दावे यह दिखाते हैं कि अमेरिका के भीतर इस मुद्दे पर मतभेद गहरे हैं। सार्वजनिक मंचों पर दोस्ती और साझेदारी की बात करने के बावजूद, अंदरूनी राजनीति और नीतिगत असहमति इस समझौते की राह में बड़ी बाधा बनी हुई है।
आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों देश इन मतभेदों को दूर कर किसी ठोस समझौते तक पहुंच पाते हैं या यह मुद्दा लंबे समय तक कूटनीतिक तनाव का कारण बना रहेगा।
