हिंद महासागर केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह आज की वैश्विक राजनीति, व्यापार और सैन्य रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। सदियों तक जिस समुद्री क्षेत्र पर भारत का सांस्कृतिक, व्यापारिक और रणनीतिक प्रभाव रहा, अब उसी क्षेत्र में नई शक्तियां अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में जुटी हैं। चीन, पाकिस्तान और तुर्की के बीच बनता नया समीकरण हिंद महासागर के पावर बैलेंस को तेजी से बदल रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव धीरे-धीरे नहीं, बल्कि योजनाबद्ध और रणनीतिक तरीके से हो रहा है। भारत के सामने चुनौती यह नहीं है कि कोई एक देश उसके प्रभाव क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है, बल्कि असली चुनौती उस गठजोड़ से है जो लंबे समय में भारत की समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और रणनीतिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।
इंडो-पैसिफिक: 21वीं सदी का सबसे अहम भू-राजनीतिक क्षेत्र
पिछले कुछ वर्षों में इंडो-पैसिफिक शब्द केवल कूटनीतिक दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह विश्व राजनीति का केंद्र बन चुका है। इंडो-पैसिफिक, हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाला वह विशाल क्षेत्र है, जहां से वैश्विक व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। आने वाले 15 से 20 वर्षों में दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच सहयोग, प्रतिस्पर्धा और टकराव की अधिकांश घटनाएं इसी क्षेत्र में घटित होने की संभावना है।
इस पावर गेम में तीन देश सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। अमेरिका, चीन और भारत। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले एक-दो दशकों में चीन सैन्य और आर्थिक शक्ति के मामले में अमेरिका को भी चुनौती दे सकता है। ऐसे में भारत के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह हर कदम बेहद सतर्कता के साथ उठाए।
चीन की हिंद महासागर में एंट्री की कहानी
चीन की हिंद महासागर में मौजूदगी कोई अचानक हुई घटना नहीं है। 21वीं सदी के पहले दशक में जब सोमालिया के समुद्री लुटेरों का खतरा बढ़ा, तब चीन ने पहली बार अपने दो युद्धपोत सोमालिया के तट के पास भेजे थे। उस समय इसे केवल समुद्री सुरक्षा के नाम पर उठाया गया कदम बताया गया, लेकिन इसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने पूरी तस्वीर बदल दी।
धीरे-धीरे चीनी जहाजों की आवाजाही हिंद महासागर में बढ़ती चली गई। शुरुआत में यह सब व्यापारिक और सुरक्षा सहयोग के नाम पर हुआ, लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट होने लगा कि चीन इस क्षेत्र को एक रणनीतिक प्रयोगशाला के रूप में इस्तेमाल कर रहा है।
भारत को चुनौती देने की बहुस्तरीय रणनीति
हिंद महासागर पर ऐतिहासिक रूप से भारत का प्रभाव रहा है। इसी प्रभाव को कमजोर करने के लिए चीन ने प्रत्यक्ष टकराव की बजाय अप्रत्यक्ष रणनीति अपनाई। उसने क्षेत्र के तटीय देशों के साथ अपने राजनीतिक और आर्थिक संबंध मजबूत किए।
चीन ने दोहरे उपयोग की क्षमता वाले रिसर्च जहाज हिंद महासागर में भेजे, जिन्हें औपचारिक रूप से वैज्ञानिक शोध के लिए बताया गया, लेकिन जिनकी जासूसी क्षमता पर सवाल उठते रहे हैं। इसके साथ ही उसने क्षेत्रीय मंचों के जरिए अपनी मौजूदगी को वैध बनाने की कोशिश की। चीन-हिंद महासागर फोरम जैसे मंचों के जरिए वह क्षेत्रीय सहयोग की बात करता है, लेकिन इसके पीछे रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने की मंशा साफ दिखाई देती है।
पाकिस्तान: चीन की समुद्री रणनीति का अहम मोहरा
चीन की इस पूरी रणनीति में पाकिस्तान सबसे अहम कड़ी बनकर उभरा है। दोनों देशों के रिश्ते केवल जमीन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समुद्र में भी यह साझेदारी लगातार गहरी हो रही है।
पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को चीन ने न केवल आर्थिक परियोजना के रूप में विकसित किया, बल्कि यह हिंद महासागर में उसकी मौजूदगी का स्थायी आधार भी बनता जा रहा है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इन बंदरगाहों को व्यावसायिक बताया जाता है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि संकट के समय इनका सैन्य उपयोग भी किया जा सकता है।
तुर्की की एंट्री और नया समीकरण
हाल के वर्षों में तुर्की की हिंद महासागर में बढ़ती दिलचस्पी ने इस पूरे समीकरण को और जटिल बना दिया है। दक्षिण एशिया में भारत विरोधी रुख रखने वाले देशों के साथ तुर्की के संबंध किसी से छिपे नहीं हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की की एंट्री ने हिंद महासागर को एक नए अखाड़े में बदलने की संभावना पैदा कर दी है। यदि चीन और पाकिस्तान के साथ तुर्की भी सक्रिय रूप से इस क्षेत्र में कदम बढ़ाता है, तो यह भारत के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकती है।
छोटे देश और बड़ी शक्तियों का खेल
मालदीव, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देश इस बड़े खेल में अक्सर मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं। आर्थिक सहायता, बुनियादी ढांचा परियोजनाएं और कूटनीतिक समर्थन के जरिए बड़ी शक्तियां इन देशों में अपनी पकड़ मजबूत करती हैं।
हंबनटोटा, सोनाडिया और क्यौकप्यू जैसे बंदरगाह केवल व्यापारिक परियोजनाएं नहीं रह गए हैं, बल्कि वे इस बात का संकेत हैं कि हिंद महासागर में भविष्य की रणनीति किस दिशा में जा रही है।
मलक्का स्ट्रेट और चीन की सबसे बड़ी चिंता
चीन की हिंद महासागर में दिलचस्पी का एक बड़ा कारण उसकी ऊर्जा सुरक्षा है। चीन अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है और यह आपूर्ति हिंद महासागर और मलक्का स्ट्रेट के जरिए होती है।
युद्ध जैसी स्थिति में यदि मलक्का स्ट्रेट बाधित होता है, तो चीन के 80 प्रतिशत से अधिक कच्चे तेल आयात पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की यह क्षमता कि वह इस मार्ग को प्रभावित कर सकता है, चीन की सबसे बड़ी रणनीतिक चिंता है।
भारतीय नौसेना और AIP पनडुब्बियों की चुनौती
जहां चीन और पाकिस्तान अपनी नौसैनिक क्षमताओं को तेजी से बढ़ा रहे हैं, वहीं भारत के सामने कुछ अहम चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। चीन ने पाकिस्तान को AIP तकनीक से लैस पनडुब्बियां उपलब्ध कराई हैं, जिनमें से कई ट्रेनिंग मिशन पर हैं और जल्द ही सक्रिय सेवा में शामिल हो सकती हैं।
इसके विपरीत भारतीय नौसेना अब तक ऐसी किसी पनडुब्बी डील को अंतिम रूप नहीं दे पाई है। फ्रांस के साथ वर्षों तक चली बातचीत सफल नहीं हो सकी और अब उम्मीद जर्मनी से जुड़ी है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस दिशा में देरी भारत के लिए रणनीतिक नुकसान बन सकती है।
बजट और संरचनात्मक समस्या
भारतीय नौसेना की क्षमताओं पर चर्चा करते हुए विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि संसाधनों की कमी एक बड़ी समस्या है। पारंपरिक रूप से रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा थल सेना और वायुसेना को चला जाता है, जबकि नौसेना के हिस्से अपेक्षाकृत कम बजट आता है।
जब तक इस संरचना में बदलाव नहीं किया जाता, तब तक हिंद महासागर जैसी विशाल और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीमा की सुरक्षा एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी।
क्या खतरा तुरंत है या भविष्य की चेतावनी
विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि फिलहाल स्थिति नियंत्रण से बाहर नहीं है, लेकिन खतरे के संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं। इसे एक ऐसे अलार्म की तरह देखा जा सकता है, जिसकी आवाज अभी तेज नहीं है, लेकिन जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
भारत को अपनी समुद्री रणनीति, कूटनीतिक संबंधों और सैन्य क्षमताओं पर एक साथ काम करने की जरूरत है, ताकि हिंद महासागर में उसका ऐतिहासिक और रणनीतिक प्रभाव बना रहे।
निष्कर्ष: समय रहते कदम उठाने की जरूरत
हिंद महासागर में बदलता शक्ति संतुलन केवल एक सैन्य चुनौती नहीं है, बल्कि यह भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा है। चीन, पाकिस्तान और तुर्की का उभरता गठजोड़ आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र की तस्वीर बदल सकता है।
भारत के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह इस बदलाव को केवल देखे नहीं, बल्कि समय रहते ठोस और दूरदर्शी कदम उठाए। इतिहास गवाह है कि समुद्री शक्ति ही वैश्विक नेतृत्व की कुंजी होती है, और हिंद महासागर में अपनी स्थिति मजबूत रखना भारत की प्राथमिकता होनी चाहिए।
