भारतीय रुपया और अमेरिकी डॉलर के बीच संबंध सदियों पुराना है। 1925 में भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और रुपया ब्रिटिश पाउंड से जुड़ा हुआ था। उस समय 1 रुपया लगभग 10 अमेरिकी डॉलर के बराबर था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 1947 में 1 डॉलर की कीमत 3.3 रुपये थी। इसके बाद भारत की आर्थिक स्थिति और वैश्विक मुद्रा परिवर्तनों के अनुसार रुपये का मूल्य धीरे-धीरे बदलता रहा।

1950 में एक डॉलर की कीमत बढ़कर 4.76 रुपये हो गई। 1966 में यह 7.5 रुपये के स्तर तक पहुंच गया। 1980 में यह 7.86 रुपये और 1990 में 17.5 रुपये पर था। 2000 में 1 डॉलर 44.94 रुपये के बराबर था, जबकि 2010 में यह 45.73 रुपये और 2020 में 76.38 रुपये तक पहुंच चुका था। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि रुपये की मूल्यवृद्धि और गिरावट विश्व आर्थिक परिवर्तनों और भारत की घरेलू नीति के प्रभाव में रही है।
रुपया कमजोर क्यों हुआ?
वर्तमान वित्तीय वर्ष में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले ऑल टाइम लो पर पहुंच गया है। दिसंबर 2025 में यह पहली बार 91.08 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंचा। इसके पीछे कई आर्थिक और भू-राजनीतिक कारण हैं। सबसे प्रमुख कारण बढ़ता व्यापार घाटा और अमेरिका के साथ लंबित व्यापार समझौते में अनिश्चितता है।
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। डॉलर की तुलना में रुपये का कमजोर होना तेल और उससे बने उत्पादों की कीमतों पर सीधा असर डालता है। इसके अलावा, खाद्य उत्पादों और अन्य आवश्यक वस्तुओं पर भी आयात लागत बढ़ जाती है। विदेशों से कर्ज लेना महंगा हो जाता है और हेजिंग लागत में भी वृद्धि होती है।
विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकालकर अन्य देशों में निवेश कर रहे हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है। इस साल विदेशी निवेशकों ने 17 अरब डॉलर से अधिक राशि भारत से बाहर भेजी है। व्यापार घाटा अक्टूबर में बढ़कर 41.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले महीने 32.2 अरब डॉलर था। यह अंतर रुपये की मांग को प्रभावित करता है और मुद्रा की गिरावट को बढ़ावा देता है।
रुपया कमजोर होने के नकारात्मक प्रभाव
रुपये की कमजोरी से कई क्षेत्रों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। तेल कंपनियों की लागत बढ़ती है और पेट्रोलियम सब्सिडी सरकार के लिए महंगी हो जाती है। आयातित खाद्य उत्पाद महंगे हो जाते हैं, जिससे कृषि क्षेत्र और उपभोक्ताओं पर दबाव बढ़ता है। विदेशी कर्ज चुकाना महंगा हो जाता है और एयरलाइंस कंपनियों की लागत भी बढ़ती है, जिससे हवाई यात्रा महंगी हो सकती है।
महंगी कारों और इलेक्ट्रिक वाहनों के पुर्जों की कीमतें बढ़ जाती हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ती है और ग्राहक को महंगा माल खरीदना पड़ता है। स्मार्टफोन, टीवी, एसी जैसी व्हाइट गुड्स की कीमतें भी बढ़ सकती हैं, और इससे उपभोक्ताओं को मिलने वाला GST लाभ कम हो सकता है। सोना और चांदी जैसी कीमती धातुओं की कीमतों में भी वृद्धि देखने को मिलती है, क्योंकि भारत इनका अधिकतर आयात करता है।
विदेशों में शिक्षा लेने वाले छात्रों के लिए भी रुपये की कमजोरी परेशानी का कारण बनती है। विदेशी शिक्षा की कीमत डॉलर में स्थिर रहती है, लेकिन रुपये के कमजोर होने से भारतीय छात्रों को अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इससे एजुकेशन लोन और EMI बढ़ सकते हैं।
रुपया कमजोर होने के सकारात्मक पहलू
रुपये की कमजोरी हमेशा नुकसान नहीं देती। निर्यातक उद्योगों को इसका लाभ मिलता है क्योंकि उनका माल विदेशों में सस्ता हो जाता है। IT और फार्मा कंपनियों के लिए डॉलर में होने वाली कमाई रुपये में अधिक मूल्यवान बन जाती है। इससे उनकी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत होती है और विदेशी बाजार में उनकी कमाई बढ़ती है।
विदेशों में रहने वाले भारतीय नागरिक भारत को अधिक पैसे भेज सकते हैं। वित्त वर्ष 2025 में विदेशों से भेजी गई रकम रिकॉर्ड 135.5 अरब डॉलर रही, जो व्यापार घाटे को कम करने में मदद करती है। रुपये की गिरावट से निर्यात सस्ता होता है और अमेरिका द्वारा लगाए गए उच्च टैरिफ का असर कुछ हद तक कम हो जाता है।
डॉलर से मजबूत दुनिया की मुद्राएँ
हालांकि डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्रा है, लेकिन कुछ मुद्राएँ इससे भी मजबूत हैं। कुवैती दीनार, बहरीनी दीनार, ओमानी रियाल, जॉर्डन दीनार, ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग, स्विस फ्रैंक और यूरो अमेरिकी डॉलर से मजबूत मुद्राएँ हैं। इन मुद्राओं की मजबूती उनकी अर्थव्यवस्था, विदेशी मुद्रा भंडार और वैश्विक मान्यता से तय होती है।
भविष्य के दृष्टिकोण
विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये की कमजोरी का रुख कुछ समय तक बना रह सकता है, क्योंकि व्यापार घाटा बढ़ रहा है और अमेरिका के साथ व्यापार समझौते में अनिश्चितता बनी हुई है। इसके अलावा, वैश्विक भू-राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरताएँ भी रुपये पर दबाव डाल रही हैं। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक और घरेलू नीतियों के माध्यम से मुद्रा को स्थिर करने के प्रयास जारी हैं।
निष्कर्ष
रुपया और डॉलर का संबंध सिर्फ संख्या का मामला नहीं है, बल्कि यह भारत की वैश्विक आर्थिक स्थिति और घरेलू नीतियों का दर्पण है। 100 साल के इतिहास में रुपये की यात्रा ने दिखाया है कि वैश्विक और घरेलू परिस्थितियाँ मुद्रा के मूल्य को प्रभावित करती हैं। कमजोर रुपया कुछ उद्योगों के लिए चुनौती बन सकता है, जबकि निर्यातक और विदेशी धन प्रवाह के लिए अवसर भी पैदा करता है। इसलिए, निवेशक, व्यवसाय और आम नागरिकों को रुपये की चाल पर सतर्क नजर रखनी चाहिए।
