भारतीय अर्थव्यवस्था इन दिनों एक अजीब विरोधाभास से गुजर रही है। एक ओर शेयर बाजार लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा है और निवेशकों में तेजी का उत्साह दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी ओर भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होता जा रहा है। यह वह दौर है जब बाज़ार की चमक रुपये की धुंधली होती स्थिति को ढक नहीं पा रही। वैश्विक बाजारों की गतिविधियाँ, विदेशी फंड का बहाव, आयातकों की मांग और अंतरराष्ट्रीय सौदों की अनिश्चितता—ये सभी कारक मिलकर भारतीय मुद्रा को लगातार दबाव में रखे हुए हैं।

शुक्रवार के शुरुआती कारोबारी सत्र में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 24 पैसे लुढ़ककर नए ऑल-टाइम लो 90.56 पर पहुंच गया। यह गिरावट गुरुवार के उस रिकॉर्ड के बाद आई जब रुपया 38 पैसे टूटकर 90.32 के स्तर पर बंद हुआ था। यह लगातार चौथे कारोबारी सत्र में गिरावट का संकेत है। इंटरबैंक फॉरेन एक्सचेंज के आंकड़े बताते हैं कि रुपया आज 90.43 पर खुला, लेकिन विदेशी फंडों की निकासी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मजबूती ने इसे नीचे धकेल दिया।
भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर अनिश्चितता का असर
इस गिरावट के पीछे एक प्रमुख वजह भारत-अमेरिका ट्रेड डील से जुड़े अनिश्चित कारक हैं। वैश्विक व्यापारिक समीकरणों में अमेरिकी नीतियों का प्रभाव लंबे समय से अहम रहा है। जब किसी भी देश के साथ अमेरिका की संभावित डील अनिश्चितता में फंसती है, तो निवेशक जोखिम कम करने के लिए सुरक्षित मुद्राओं में पैसा लगाने लगते हैं। डॉलर उसी सुरक्षित मुद्रा की श्रेणी में आता है। यही कारण है कि रुपए पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।
इसके अलावा वैश्विक फॉरेक्स बाजार में डॉलर इंडेक्स भी मजबूती की ओर बढ़ रहा है। शुक्रवार सुबह यह 98.37 पर था, जो इसकी बढ़ती ताकत को दर्शाता है। यह इंडेक्स डॉलर की मजबूती को छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले मापता है, और जब यह ऊपर जाता है तो उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएँ कमजोर हो जाती हैं, जैसा कि भारतीय रुपये के साथ हो रहा है।
आयातकों की आक्रामक डॉलर खरीद से बढ़ी चुनौती
भारत अपनी जरूरतों के अनुसार दुनिया के सबसे बड़े आयातक देशों में गिना जाता है। चाहे ऊर्जा हो, कच्चा तेल, कीमती धातुएँ, औद्योगिक धातुएँ या मशीनरी—इन सब में डॉलर में भुगतान किया जाता है। हाल के दिनों में वैश्विक कीमतों में उछाल ने आयातकों को आक्रामक रूप से डॉलर खरीदने पर मजबूर कर दिया है। जब बाजार में मांग बढ़ती है, तो मुद्रा का मूल्य गिरने लगता है। भारतीय रुपये पर यही दबाव इस समय बढ़ रहा है।
कीमती धातुओं में उछाल ने भी इस स्थिति को और तीखा कर दिया है। सोना और चांदी की अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊपर जाने से खरीददार और आयातक दोनों डॉलर की ओर भागते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये का मूल्य नीचे चला जाता है।
रुपये का सालभर का प्रदर्शन: एशिया की सबसे कमजोर करेंसी में शामिल
यह साल रुपया निवेशकों के लिए निराशाजनक साबित हो रहा है। वर्ष 2025 के दौरान अब तक रुपये में 5 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। यह प्रदर्शन इसे विश्व की सबसे खराब परफॉर्म करने वाली प्रमुख मुद्राओं में शामिल करता है। टर्किश लीरा और अर्जेंटीना पेसो के बाद भारतीय रुपया तीसरी सबसे कमजोर मुद्रा रहा है।
भारत जैसे बड़े और उभरते बाज़ार के लिए यह स्थिति चिंता का विषय है। यह निवेशकों के मनोबल को भी प्रभावित करता है और भविष्य की आर्थिक नीतियों पर भी दबाव बढ़ाता है। सरकार और रिजर्व बैंक को ऐसे समय में न सिर्फ मुद्रा स्थिरता सुनिश्चित करनी होती है, बल्कि यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि वैश्विक निवेशकों का भरोसा बना रहे।
शेयर बाजार में तेजी, लेकिन रुपये पर असर नहीं
भारतीय शेयर बाज़ार इस समय लगातार तेजी में है। सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन सेंसेक्स सुबह 10:10 बजे तक 288.69 अंक चढ़कर 85,106.82 पर था। शुरुआती घंटे में इसमें 400 अंक से ज्यादा की तेजी देखी गई। निफ्टी50 भी 77.75 अंकों की बढ़त के साथ 25,976.30 पर ट्रेड कर रहा था।
लेकिन यह तेजी रुपये को सहारा देने में नाकाम रही। इसका मुख्य कारण यह है कि शेयर बाजार में तेजी घरेलू निवेशकों के उत्साह से जुड़ी है, जबकि रुपये की मजबूती या कमजोरी अंतरराष्ट्रीय फॉरेक्स बाजार से निर्धारित होती है।
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने पिछले कुछ महीनों में भारतीय बाजार से काफी धन निकाला है। जब विदेशी निवेशक अपना पैसा निकालते हैं, तो वे डॉलर खरीदकर बाहर भेजते हैं, और इसी प्रक्रिया में रुपये पर नकारात्मक दबाव बनता है।
सोने-चांदी की कीमतों का उतार-चढ़ाव और रुपये का संबंध
रुपये की कमजोरी और कीमती धातुओं के भाव का गहरा संबंध है। शुक्रवार को सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। एमसीएक्स पर फरवरी डिलीवरी वाला सोना लगभग 200 रुपए टूट गया। पिछले सत्र में यह 1,32,469 प्रति 10 ग्राम के स्तर पर बंद हुआ था, और आज यह लगभग 1,32,442 पर खुला। शुरुआती समय में सोना 1,32,776 तक गया और फिर 1,32,275 तक नीचे आया।
चांदी के भाव में भी भारी उतार-चढ़ाव देखा गया। मार्च डिलीवरी वाली चांदी 1,98,942 रुपये किलो के भाव पर बंद हुई थी और आज यह करीब 2,000 रुपये नीचे खुली। शुरुआती कारोबार में 1,98,444 का हाई और 1,96,957 का लो दर्ज किया गया।
कीमती धातुओं की मांग बढ़ने से डॉलर की मांग भी बढ़ती है, और यही कारण है कि कीमतों की यह हलचल रुपए की गिरावट को तेज करती है।
क्या रुपये का गिरना चिंता का कारण है?
भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए मुद्रा कमजोर होना अर्थव्यवस्था की कई परतों को प्रभावित करता है। आयात महंगा होता है, जिससे ईंधन, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, गाड़ियों और औद्योगिक उपकरणों की लागत बढ़ती है। इससे महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
लेकिन कुछ सकारात्मक पहलू भी हैं। रुपये की कमजोरी से निर्यात करने वाली भारतीय कंपनियों को फायदा होता है। आईटी सेवाएं, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल और धातु उद्योगों जैसे क्षेत्रों को इससे प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलता है।
आगे का रास्ता: क्या रुपया और टूटेगा?
फॉरेक्स विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां इसी तरह बनी रहीं, तो रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। यदि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों से जुड़ा कोई अप्रत्याशित निर्णय लिया या अंतरराष्ट्रीय व्यापार तनाव बढ़ा, तो डॉलर और मजबूत होगा। इससे उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएँ और कमजोर होंगी।
भारत के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण जरूर है, लेकिन संभालने योग्य भी है। रिजर्व बैंक के पास पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है और वह आवश्यक होने पर बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है। लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए व्यापार संतुलन और निवेश प्रवाह में सुधार आवश्यक है।
