मध्य प्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर जहां एक ओर स्वच्छता, स्मार्ट सिटी और शिक्षा के क्षेत्र में देशभर में मिसाल बन चुका है, वहीं अब साइबर अपराधों की नई राजधानी भी बनता जा रहा है। शहर में इंटरनेट के बढ़ते उपयोग और डिजिटल लेन-देन की सुविधा ने जहां नागरिकों का जीवन आसान बनाया है, वहीं ऑनलाइन ठगों को भी नया अवसर दे दिया है।

ताजा आंकड़े बताते हैं कि साल 2025 में अब तक करीब 45,000 लोग साइबर ठगी के शिकार बने हैं। ठगों ने अलग-अलग तरीकों से इन लोगों से करीब 90 करोड़ रुपये की राशि हड़प ली है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें बड़ी संख्या में शिक्षित, तकनीकी रूप से समझदार और प्रोफेशनल लोग शामिल हैं — जिनमें सॉफ्टवेयर इंजीनियर, वैज्ञानिक, और रिटायर्ड अधिकारी तक फंस गए हैं।
जागरूकता के बावजूद नहीं थम रही ठगी
पुलिस, साइबर सेल और प्रशासन लगातार जागरूकता अभियान चला रहे हैं। हर बैंक और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर चेतावनी संदेश प्रसारित किए जा रहे हैं, फिर भी ठगों के तरीके इतने चालाक और तकनीकी हो गए हैं कि आम आदमी ही नहीं, बल्कि शिक्षित वर्ग भी उनके झांसे में आ रहा है।
इंदौर की साइबर सेल के अनुसार, सिर्फ निवेश योजनाओं के नाम पर 41 करोड़ रुपये की ठगी की गई है। इसके अलावा नौकरी के नाम पर ठगी, केवाईसी अपडेट, और सोशल मीडिया फ्रॉड के मामले भी तेजी से बढ़े हैं।
पुलिस की चिंता बढ़ी – ठगी के जाल में हर वर्ग
एडिशनल डीसीपी राजेश दंडोतिया ने बताया कि इंदौर में साइबर अपराध के मामले चिंताजनक गति से बढ़ रहे हैं। पुलिस ने अब तक लगभग 13 करोड़ रुपये की राशि पीड़ितों को वापस दिलवाई है, लेकिन यह कुल ठगी राशि का एक छोटा हिस्सा मात्र है।
पुलिस ने 6,000 से अधिक बैंक खाते फ्रीज करवाए, 1,000 से अधिक संदिग्ध आईडी ब्लॉक कीं और दो हजार से अधिक सोशल मीडिया अकाउंट्स से डेटा रिकवर करवाया। फिर भी ठगों का नेटवर्क राज्यों की सीमाओं से परे फैल चुका है।
रिटायर्ड डीएसपी भी नहीं बचे – सरकारी लोगो का दुरुपयोग
65 वर्षीय ध्यानूराव आपाजी बच्चन, जो डीएसपी पद से रिटायर हुए हैं, ठगों के जाल में फंस गए। 13 अक्टूबर को उन्हें एक कॉल आया जिसमें व्यक्ति ने खुद को भोपाल ट्रेजरी कार्यालय का कर्मचारी बताया। उसने ध्यानूराव को पेंशन प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी दी और आधार-पैन की कॉपी मांगी।
फिर एक फर्जी लिंक भेजकर उनसे एक ऐप इंस्टॉल करवाया गया। ऐप इंस्टॉल करते ही उनका मोबाइल हैक हो गया। कुछ ही मिनटों में उनके खाते से ₹1,97,000 और ₹36,031 दो ट्रांजेक्शन में निकाल लिए गए। बाद में जांच में पाया गया कि ठगों ने अपने व्हाट्सएप डीपी पर “मध्य प्रदेश शासन” का लोगो लगा रखा था ताकि कॉल विश्वसनीय लगे।
भोपाल क्राइम ब्रांच ने इस गिरोह को गिरफ्तार कर लिया है, जो पूरे प्रदेश में वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बना रहा था।
इंदौर में बढ़ते साइबर फ्राॅड के प्रमुख तरीके
- इन्वेस्टमेंट ठगी: झूठे ऐप्स या वेबसाइट्स पर “उच्च रिटर्न” का वादा कर लोगों से पैसा ठगना।
- वीडियो लाइक स्कीम: व्हाट्सएप या टेलीग्राम पर लिंक भेजकर “वीडियो लाइक करने पर पैसा कमाने” का झांसा देना।
- केवाईसी अपडेट: बैंक, सिम कार्ड या पेंशन अपडेट के नाम पर फर्जी कॉल्स और लिंक भेजना।
- सोशल मीडिया हैकिंग: इंस्टाग्राम, फेसबुक या ईमेल अकाउंट हैक कर दोस्तों से पैसे मांगना।
- डिजिटल अरेस्ट: वीडियो कॉल पर पुलिस या अधिकारी बनकर धमकाना और पैसे ट्रांसफर करवाना।
कुछ हैरान करने वाले केस
केस-1: 30 वर्षीय महिला सॉफ्टवेयर इंजीनियर को व्हाट्सएप पर लिंक मिली। उसे बताया गया कि वीडियो लाइक करने से पैसे मिलेंगे। उसने कुछ कार्य पूरे किए और ऐप में 18 लाख रुपये की वर्चुअल कमाई दिखाई गई। आगे के कार्य के लिए पैसे जमा करने को कहा गया। धीरे-धीरे उसने 16.64 लाख रुपये गंवा दिए।
केस-2: मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले 28 वर्षीय इलेक्ट्रिकल इंजीनियर को “एक्स्ट्रा इनकम” के नाम पर झांसा दिया गया। वह कई बार ट्रांजेक्शन करता गया और अंत में 30 लाख रुपये गवां बैठा।
केस-3: आरआर कैट में पदस्थ वरिष्ठ वैज्ञानिक को “डिजिटल अरेस्ट” का शिकार बनाया गया। अपराधियों ने उन्हें झूठे अपराध का डर दिखाकर 71 लाख रुपये निकलवा लिए। वैज्ञानिक दो दिन तक डर के मारे किसी को बता नहीं सके।
साइबर सुरक्षा के उपाय (पुलिस द्वारा जारी गाइडलाइन)
- अपरिचित प्रोफाइल या ग्रुप की लिंक पर क्लिक न करें।
- क्रिप्टोकरेंसी, निवेश या शॉपिंग के नाम पर पैसा ट्रांसफर न करें।
- किसी अंजान वेबसाइट पर अपनी निजी जानकारी दर्ज न करें।
- अपने अकाउंट में टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन जरूर चालू रखें।
- अपने मोबाइल में स्क्रीन लॉक और स्ट्रॉन्ग पासवर्ड का उपयोग करें।
- संदिग्ध कॉल या केवाईसी लिंक पर भरोसा न करें।
- अज्ञात व्यक्ति के निर्देशों का पालन न करें।
- ग्राहक सेवा के नंबर गूगल पर नहीं, आधिकारिक वेबसाइट से ही प्राप्त करें।
- किसी को ओटीपी या बैंक डिटेल साझा न करें।
- ठगी की शिकायत तुरंत www.cybercrime.gov.in या हेल्पलाइन 1930 पर करें।
विशेषज्ञों की राय
साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ प्रो. अमित व्यास का कहना है कि अब अपराधी AI और डीपफेक तकनीक का उपयोग करने लगे हैं। वे आवाज और वीडियो तक नकली बना लेते हैं। “लोगों को किसी भी संदिग्ध कॉल या लिंक पर बिना जांचे विश्वास नहीं करना चाहिए,” उन्होंने कहा।
इंदौर के साइबर थाने के अधिकारी मानते हैं कि ठग अब बॉट्स और ऑटोमेशन का प्रयोग कर रहे हैं। “वे एक साथ हजारों नंबरों पर मैसेज भेजते हैं, जिससे कुछ लोग फंस ही जाते हैं।”
नागरिकों की अपील
इंदौर के कई पीड़ितों ने सोशल मीडिया पर अपनी कहानी साझा की है। कई ने कहा कि “हमें लगा हम समझदार हैं, हमें कोई नहीं ठग सकता,” लेकिन फिर भी वो फंस गए। अब वे चाहते हैं कि पुलिस अधिक सख्त एक्शन ले और बैंकिंग सिस्टम में भी सिक्योरिटी बढ़ाई जाए।
सरकार की पहल
मध्य प्रदेश सरकार ने हाल ही में साइबर अपराध रोकने के लिए “डिजिटल कवच योजना” शुरू की है, जिसके तहत हर जिले में साइबर हेल्प डेस्क बनाई जा रही है। इसके अलावा साइबर प्रशिक्षण स्कूल में युवाओं को “एथिकल हैकिंग” की ट्रेनिंग दी जा रही है ताकि वे भविष्य में साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट बन सकें।
निष्कर्ष
इंदौर में बढ़ते साइबर अपराध यह दर्शाते हैं कि डिजिटल इंडिया के युग में सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है जितनी सुविधा। अब वक्त है जब नागरिकों को सतर्क रहना होगा। थोड़ी सावधानी, सही जानकारी और समय पर रिपोर्टिंग से बड़ी से बड़ी ठगी को भी रोका जा सकता है।
