इंदौर और दाहोद को जोड़ने वाली नई रेल लाइन का सपना जब पहली बार सार्वजनिक हुआ था, तब इसे मालवा और आदिवासी अंचल के लिए विकास की नई धुरी माना गया था। 8 फरवरी 2008 का दिन इस परियोजना के इतिहास में मील का पत्थर बना, जब झाबुआ में इसका शिलान्यास किया गया। उस समय यह दावा किया गया था कि तीन वर्षों में यह रेल लाइन बनकर तैयार हो जाएगी और इंदौर से गुजरात के दाहोद तक सीधा रेल संपर्क स्थापित हो जाएगा। लेकिन समय बीतता गया, सरकारें बदलीं, प्राथमिकताएं बदलीं और आज 18 साल बाद भी यह परियोजना अधूरी है। मौजूदा स्थिति यह है कि अब भी 65 प्रतिशत से अधिक काम बाकी बताया जा रहा है, जिससे यह सवाल फिर खड़ा हो गया है कि आखिर इस परियोजना की मंजिल कब आएगी।

इंदौर-दाहोद रेल लाइन केवल दो शहरों को जोड़ने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह मध्य प्रदेश और गुजरात के बीच सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संपर्क को मजबूत करने की क्षमता रखती है। इस रेल मार्ग से झाबुआ, अलीराजपुर जैसे आदिवासी बहुल जिलों को सीधा लाभ मिलना था। इन इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और व्यापार के नए अवसर खुलने की उम्मीद जताई गई थी। शुरुआती वर्षों में स्थानीय लोगों ने इस परियोजना को लेकर उत्साह दिखाया था, क्योंकि उन्हें लगा था कि इससे क्षेत्र की तस्वीर बदलेगी।
शिलान्यास के समय यह परियोजना अपेक्षाकृत आसान मानी जा रही थी। अनुमान था कि भू-भाग की चुनौतियों के बावजूद समय पर काम पूरा हो जाएगा। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अलग निकली। परियोजना के शुरुआती चरण में ही भूमि अधिग्रहण, वन क्षेत्र की अनुमति और स्थानीय स्तर पर समन्वय की समस्याएं सामने आने लगीं। इन अड़चनों ने काम की रफ्तार को धीमा कर दिया।
समय के साथ लागत बढ़ती गई और परियोजना की समय-सीमा बार-बार बदली जाती रही। जिन तीन वर्षों में काम पूरा होना था, वह अवधि कब 18 साल में बदल गई, इसका स्पष्ट जवाब आज तक नहीं मिल पाया है। रेलवे प्रशासन और संबंधित विभाग समय-समय पर काम की प्रगति को लेकर बयान देते रहे, लेकिन जमीनी हकीकत अलग ही कहानी बयां करती रही।
स्थानीय लोगों के लिए यह परियोजना अब उम्मीद और निराशा के बीच झूलती हुई प्रतीत होती है। कई ग्रामीणों ने अपनी जमीन इस विश्वास के साथ दी थी कि रेल लाइन बनने से उनके गांव का विकास होगा। लेकिन सालों बाद भी जब पटरियां अधूरी दिखती हैं और स्टेशन सिर्फ कागजों में मौजूद रहते हैं, तो भरोसा टूटता है। कुछ स्थानों पर अधूरे पुल, अधूरी सुरंगें और बिखरा हुआ निर्माण कार्य इस लंबी देरी की गवाही देते हैं।
इस परियोजना की देरी के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। एक बड़ा कारण वन क्षेत्र से गुजरने वाले हिस्सों में पर्यावरणीय मंजूरी का लंबित रहना रहा है। आदिवासी इलाकों में वन भूमि का उपयोग संवेदनशील मुद्दा होता है, जहां नियमों और प्रक्रियाओं का पालन जरूरी होता है। इसके अलावा ठेकेदारों में बदलाव, बजट की कमी और प्रशासनिक स्तर पर समन्वय की कमी भी समय-समय पर सामने आती रही है।
इंदौर-दाहोद रेल लाइन का महत्व केवल यात्री सुविधा तक सीमित नहीं है। यह मार्ग औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों के लिए भी अहम माना जाता है। इंदौर एक बड़ा औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र है, जबकि दाहोद और आसपास के क्षेत्र गुजरात के औद्योगिक नेटवर्क से जुड़े हुए हैं। इस रेल लाइन के माध्यम से माल परिवहन को गति मिल सकती थी, जिससे दोनों राज्यों की अर्थव्यवस्था को फायदा होता।
राजनीतिक स्तर पर भी यह परियोजना कई बार चर्चा में रही है। अलग-अलग समय पर नेताओं ने इसके जल्द पूरा होने के आश्वासन दिए, लेकिन ठोस नतीजे सामने नहीं आए। हर चुनावी मौसम में इस रेल लाइन का जिक्र जरूर होता है, लेकिन चुनाव बीतते ही मामला फिर ठंडे बस्ते में चला जाता है। इससे जनता में यह धारणा बनी है कि परियोजना का इस्तेमाल केवल राजनीतिक वादों के लिए किया जा रहा है।
वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो यह साफ होता है कि अभी लंबा सफर तय करना बाकी है। कई खंडों में निर्माण कार्य शुरू ही नहीं हो पाया है, जबकि कुछ हिस्सों में आंशिक काम हुआ है। रेलवे अधिकारियों के अनुसार तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के चलते काम अपेक्षा से अधिक समय ले रहा है। हालांकि अब यह भी कहा जा रहा है कि परियोजना को प्राथमिकता सूची में रखा गया है और आने वाले वर्षों में काम में तेजी लाई जाएगी।
आदिवासी अंचल के सामाजिक संगठनों का कहना है कि इस देरी का सबसे ज्यादा नुकसान स्थानीय युवाओं को हुआ है। अगर रेल लाइन समय पर बन जाती, तो रोजगार के नए अवसर पैदा होते और लोगों को बड़े शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ता। इसके अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच भी आसान होती।
इंदौर-दाहोद रेल लाइन की कहानी भारत में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की जटिलताओं का प्रतीक बन गई है। यह दिखाती है कि योजना और क्रियान्वयन के बीच कितना बड़ा अंतर हो सकता है। कागजों पर तैयार की गई योजनाएं जब जमीनी हकीकत से टकराती हैं, तो ऐसे ही हालात पैदा होते हैं।
आज, जब परियोजना की नींव रखे 18 साल पूरे हो चुके हैं, तब यह सवाल पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो गया है कि क्या यह रेल लाइन कभी पूरी हो पाएगी। क्या वह दिन आएगा जब इंदौर से दाहोद तक सीधी ट्रेन चलेगी और आदिवासी अंचल विकास की मुख्यधारा से जुड़ेगा। फिलहाल तो स्थिति यही है कि दाहोद अभी दूर है और रेल की पटरी पर विकास की रफ्तार धीमी पड़ी हुई है।
